जंग हिंदुस्तानी:
कतरनिया घाट में जंगल की सैर करने के लिए पालतू हथिनी सीताकली और चंपाकली एक साथ जाया करती थी। कभी उनका उपयोग वन विभाग के गश्त के के लिए होता था तो कभी साहब लोगों के घूमने के लिए। दोनों का इतना लंबा समय कतरनिया घाट में गुज़रा की अपने जन्म स्थान को भूल ही गईं। उन्हें तराई के इस जंगल में किसी प्रकार की कोई दिक्कत नहीं थी अलबत्ता उन्हें गेरुआ नदी के किनारे किनारे घूमने में बहुत मजा आता था। एक दिन अचानक सीताकली स्वर्ग सिधार गई। सीताकली के मर जाने के बाद वन विभाग की पालतू हथिनी चंपाकली अकेली हो गई थी। वह धीरे-धीरे अकेलेपन की छाया में अपनी यादों के सहारे जी रही थी। हर दिन उसके दिल में सीताकली की कमी गहरा रही थी, मानो उसने अपना सबसे प्यारा साथी खो दिया हो।
एक दिन, चंपाकली अपने महावत के साथ चारा लेने के लिए गेरुआ नदी के किनारे भवानीपुर घाट की ओर गई। नदी के किनारे की ठंडी हवा उसके चेहरे पर खेल रही थी, और वह आराम की तलाश में थी। तभी नेपाल की ओर से आया टस्कर हाथी गजराज ने उसे देखा। उनकी नज़रें मिलीं, और वे बिना शब्दों के ही एक-दूसरे की भावनाओं को समझ गए। संकेतों में हुई बातचीत में एक अस्पष्ट दोस्ती पल रही थी। अब जिधर जिधर चंपाकली जाती थी उधर उधर दूर-दूर रहकर गजराज उसे देखता रहता था।
रात गहराई, और गजराज चुपके से नाव घाट पहुँचा जहाँ चंपाकली रहती थी। उसके पैरों में लोहे की सख्त जंजीरें थी। चंपाकली भी गजराज के साथ जाना चाहती थी, पर जंजीरें उसके पैरों में ऐसी कसकर बंधी थीं कि वह आगे बढ़ नहीं सकती थी। गजराज ने अपनी पूरी ताकत लगाकर जंजीरें खींचीं, लेकिन जंजीरें खींचते ही चंपाकली के पैर में मोच आ गई, उसकी पीड़ा भरी चीख जंगल में गूंज उठी।
गजराज समझ गया कि वह उसे नेपाल के पहाड़ों पर ले जाकर उसकी ज़िन्दगी को खतरे में नहीं डाल सकता। उसने चंपाकली को हल्की-सी मुस्कान के साथ प्यार भरे गले लगाकर कहा, “मैं तुम्हारे लिए वही करूँगा जो सही है, चाहे कितनी भी दूर रहकर। हमारा प्यार जंजीरों में बंधा नहीं रह सकता, हम हर साल मिलने आएंगे” फिर उसने अलविदा कहकर वापस नेपाल की ओर रुख किया।
चंपाकली की आंखों में आंसू थे- दर्द, मोहब्बत और एक अनकहे वादे की झलक। वह जानती थी कि कभी भी फिर से वह गजराज से मिलने तक आज़ाद नहीं होगी, पर उसके दिल की आवाज़ में एक नई उम्मीद जगी थी। कुछ रिश्ते, भले अधूरे ही सही, हमेशा गहराई में जुड़ जाते हैं, जैसे चंपाकली और गजराज का बंधन।
कतरनियाघाट के जंगलों की रातें अब भी चंपाकली के दर्द को छुपाए हुए हैं, पर उसके दिल में गजराज की यादें एक उम्मीद की लौ की तरह जलती हैं- स्वतंत्रता की, प्यार की और फिर कभी मिलने की।
आज भी गजराज चंपाकली से मिलने के लिए साल में एक दो बार ज़रूर आता है लेकिन पुरानी बातें सोचकर फिर वापस चला जाता है। चंपाकली और गजराज के इस प्रेम को भांप करके उसे नाव घाट से हटाकर गिरजापुरी के पास सेंट्रल फॉर्म के विशाल गोदाम में शिफ्ट कर दिया गया है जहाँ गजराज के साथ चंपाकली की अब कभी मुलाकात नहीं हो सकती। इस प्रकार एक अधूरी प्रेम कहानी आज भी जंगल में मौजूद है।
(कहानी काल्पनिक है)
फीचर्ड फोटो आभार : आई स्टॉक

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