मंजूलता मिरी:
ग्रामीण और आदिवासी समुदायों में महिलाओं के पास भूमि स्वामित्व न होना उनकी सबसे बड़ी असुरक्षा रही है। न मायके में ज़मीन, न ससुराल में अधिकार ऐसी स्थिति में महिलाएँ आजीविका, निर्णय और सुरक्षा के लिए दूसरों पर निर्भर रहती थीं।
मकाम से जुड़ने के बाद इस स्थिति को बदलने के लिए एक ठोस पहल की गई। वन अधिकार क़ानून के तहत महिलाओं के नाम पर व्यक्तिगत अधिकार दिलाने की प्रक्रिया शुरू की गई। इसके अंतर्गत 80 महिलाओं के नाम से दावे भरे गए। पूरी प्रक्रिया में महिलाओं को क़ानून की जानकारी दी गई, दस्तावेज़ीकरण कराया गया और ग्राम सभा की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित की गई।
यह अधिकार आसान नहीं मिला। महिलाओं को कई स्तरों पर संघर्ष करना पड़ा। कई बार फ़ॉर्म ख़ारिज कर दिए गए, दस्तावेज़ों पर सवाल उठे और अधिकारियों द्वारा प्रक्रिया को हटाने की कोशिश की गई। इसके बावजूद महिलाओं ने हार नहीं मानी।
महिलाएँ समूह बनाकर SDM कार्यालय गईं, अपनी मांग रखी और बार-बार फ़ॉलो-अप किया। जब वहां भी सुनवाई नहीं हुई तो महिलाओं ने कलेक्टर कार्यालय तक पहुंचकर ज्ञापन सौंपा। महिलाओं ने रैली, धरना-प्रदर्शन और सामूहिक बैठकों के माध्यम से अपनी आवाज़ बुलंद की। पहली बार गाँव की महिलाएँ खुले तौर पर प्रशासन के सामने खड़ी हुईं और अपने अधिकारों की बात कही। इस संघर्ष ने महिलाओं में एकता, आत्मविश्वास और नेतृत्व को जन्म दिया।
इन प्रयासों के परिणामस्वरूप 80 महिलाओं के नाम पर वन भूमि का पट्टा मिला। यह केवल काग़ज़ी अधिकार नहीं था, बल्कि महिलाओं के जीवन में एक बड़ा बदलाव था। पट्टा मिलने के बाद महिलाओं ने पहली बार महसूस किया कि अब उनके पास अपनी ज़मीन है। अब वे बेदखली के डर से मुक्त हैं और खेती, फसल, वन उपज और आय से जुड़े निर्णय लेने लगी हैं। पहले खेती तो करती थीं, लेकिन निर्णय पुरुषों के हाथ में होते थे। अब स्थिति बदली है।
हालांकि महिलाओं पर हिंसा पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है, लेकिन अब महिलाओं को घर से निकाल देना आसान नहीं रहा क्योंकि उनके पास क़ानूनी अधिकार और भूमि स्वामित्व है। इससे महिलाओं का आत्मविश्वास, सम्मान और समाज में स्थिति मज़बूत हुई है। महिलाओं को वन धन केंद्र से भी सहयोग मिला, जिससे लघु वनोपज और आजीविका के अवसर बढ़े।
व्यक्तिगत अधिकारों के साथ-साथ एक अत्यंत महत्वपूर्ण परिणाम यह रहा कि 30 ग्राम सभाओं को सामुदायिक अधिकार प्राप्त हुआ। अब जंगल वन विभाग का नहीं, बल्कि ग्राम सभा का सुशासन स्थापित हुआ है।
पहले वन प्रबंधन समिति में अधिकतर पुरुष होते थे और वन विभाग के कर्मचारी सचिव की भूमिका निभाते थे। महिलाएँ केवल मज़दूर या उपभोक्ता बनकर रह जाती थीं। सामुदायिक अधिकार मिलने के बाद ग्राम सभा की भूमिका मज़बूत हुई और महिलाओं की भागीदारी निर्णायक बनी।
आज वन प्रबंधन समितियों में महिलाएँ अध्यक्ष और सचिव की भूमिका निभा रही हैं। महिलाएँ बैठकों में खुलकर अपनी बात रखती हैं और फ़ैसले लेती हैं। महिलाओं ने जंगल का नक़्शा तैयार किया, सीमाओं का निर्धारण किया और GPS सर्वे की ज़िम्मेदारी संभाली।
उनकी पहल से जंगल को अलग-अलग हिस्सों में विभाजित किया गया चारागाह के लिए अलग क्षेत्र, लघु वनोपज संग्रह के लिए सुरक्षित क्षेत्र, ईंधन, पत्ता और लकड़ी के लिए निर्धारित क्षेत्र। इससे जंगल का अंधाधुंध दोहन रुका और संसाधनों का संरक्षण हुआ।
सामुदायिक अधिकार मिलने से लघु वनोपज पर गाँव का नियंत्रण बढ़ा। बाहरी हस्तक्षेप और वन अपराधों पर निगरानी मज़बूत हुई। महिलाएँ जंगल को केवल संसाधन नहीं, बल्कि भविष्य की विरासत मानकर उसका संरक्षण कर रही हैं।
सामुदायिक वन अधिकार केवल जंगल का अधिकार नहीं है, बल्कि यह महिला नेतृत्व, लोकतांत्रिक निर्णय प्रक्रिया, वन प्रबंधन और सामाजिक न्याय की मज़बूत नींव है। जब महिलाओं को अधिकारों के केंद्र में रखा जाता है तो न केवल महिलाएँ सशक्त होती हैं, बल्कि जंगल सुरक्षित होते हैं और समुदाय मज़बूत बनता है।

Leave a Reply