सविता:
मैं सविता हूँ। जब मैं पाँच साल की थी, तब मेरा दाख़िला प्राथमिक विद्यालय में कराया गया। मैंने पहली से पाँचवीं तक धौरामुदा स्कूल में पढ़ाई की। इसके बाद छठी कक्षा में गई। शुरुआत में मेरे गाँव की लड़कियों से दोस्ती थी, लेकिन कुछ समय बाद मेरी दोस्ती आठवीं कक्षा की दीदियों से हो गई।
इसी दौरान मेरे पिताजी ने मेरी बहुत बिनती के बाद मुझे एक नोकिया मोबाइल दिलाया। शुरुआत में मैं उस फोन को स्कूल लेकर नहीं जाती थी और उसे चलाना भी नहीं जानती थी। जब मैंने यह बात आठवीं की दीदियों को बताई, तो उन्होंने मुझसे फोन स्कूल लेकर आने को कहा। उसके बाद मैं फोन स्कूल ले जाने लगी और उन्हें दे देती थी। वे उससे बात करती थीं और जब बैलेंस खत्म हो जाता था, तो वे दस रुपये का टॉप-अप करवाकर फिर से बात करती थीं।
छठी कक्षा पास करने के बाद मैंने टी.सी. निकलवाकर देवर गाँव के स्कूल में दो साल तक पढ़ाई की। उस समय मुझे किसी चीज़ के लिए तरसना नहीं पड़ा। नौवीं और दसवीं कक्षा की पढ़ाई मैंने ज्योष्टि के हॉस्टल में रहकर की और मिश्री देवी स्कूल जाती थी, जो एक छोटे शहर में स्थित है। उस दौरान मैं अपने पिताजी से फोटो खिंचवाने के लिए काफी पैसे मांगती थी और इन दो वर्षों में इस पर काफी खर्च हुआ।
दसवीं कक्षा पास करने के बाद मुझे वापस गाँव के स्कूल में पढ़ाई करनी पड़ी, क्योंकि हॉस्टल केवल दो साल का था और गाँव से शहर तक आना-जाना कठिन था। इसलिए मैंने ग्यारहवीं और बारहवीं की पढ़ाई गाँव के ही स्कूल से पूरी की। इसके तुरंत बाद मेरी शादी कर दी गई और मैं अपनी आगे की पढ़ाई जारी नहीं रख पाई।
शादी के लगभग दो साल बाद मेरी बेटी का जन्म हुआ। वर्ष 2020 के आसपास मैं एक सामाजिक संस्थान से जुड़ी और गाँव के बच्चों को निःशुल्क पढ़ाने लगी। हालांकि, जब भी मैं बाहर काम के लिए जाती और घर लौटती, तो मुझे कई तरह के ताने सुनने पड़ते थे। एक बार स्कूल से संबंधित दो गाँवों की बैठक के दौरान रीना दीदी, चंद्रप्रताप और मेरे पति के बीच काफी बहस हुई। उस घटना के बाद मैंने कुछ समय के लिए काम करना बंद कर दिया और जीवन सामान्य दिनचर्या में चलता रहा।
कुछ समय बाद मेरे जीवन में एक और कठिन परिस्थिति आई। मेरे पति को दूसरी लड़की पसंद आ गई और उन्होंने उसे घर ले आए। उस समय मैं अपने मायके आ गई थी। बाद में वे मेरी बेटी को लेने आए, लेकिन मुझे साथ चलने के लिए नहीं कहा और बेटी को अपने साथ ले गए। बाद में सामाजिक स्तर पर समझौता हो गया और तब से मैं अपने मायके में ही रह रही हूँ।
साल 2023 से मैंने फिर से सामाजिक संस्थान के साथ जुड़कर काम शुरू किया। मेरे परिवार में मेरे दादाजी हैं, जिन्होंने दसवीं तक पढ़ाई की है। मेरे पिताजी पाँचवीं तक ही पढ़ पाए, क्योंकि दादी के निधन के बाद वे आगे पढ़ाई जारी नहीं रख सके। मेरे चाचा ने बारहवीं तक पढ़ाई की है और अब नई पीढ़ी के बच्चे पढ़ाई कर रहे हैं।
दादाजी के समय में परिवार में काफी गरीबी थी, लेकिन पिताजी के समय में परिस्थितियाँ काफी हद तक सुधरी हैं और अब हमें मूलभूत आवश्यकताओं के लिए संघर्ष नहीं करना पड़ता। हम तीन भाई-बहन हैं।
मेरा सपना है कि मैं दोबारा शादी नहीं करना चाहती। मैं चाहती हूँ कि समाज में समानता हो और मैं लोगों के लिए कुछ अच्छा कर सकूँ। यही मेरी जीवन की सबसे बड़ी इच्छा है।

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