लाएबा सिद्दीकी:

“कोई भी राष्ट्र केवल ज़मीन से नहीं बनता, बल्कि अपने लोगों की भावना और आत्मा से बनता है।” यह बात भारत जैसे विविधताओं से भरे देश पर बिल्कुल सही बैठती है। भारत के हर कोने में अलग-अलग भाषा, संस्कृति, खान-पान और परंपराएँ मिलती हैं। फिर भी इतनी विविधताओं के बीच भारत एक है। यही एकता भारत को एक राष्ट्र बनाती है। वंदे मातरम् केवल एक गीत नहीं है, बल्कि यह भारत की आत्मा की आवाज़ है। यह नारा देशभक्ति की भावना को जगाता है और हमें स्वतंत्रता संग्राम की याद दिलाता है। इस पंक्ति की रचना बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने अपने प्रसिद्ध उपन्यास आनंदमठ में की थी। “वंदे मातरम्” का अर्थ है – मैं अपनी माँ को नमन करता हूँ।

वंदे मातरम् पहली बार 1896 में कोलकाता में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में सार्वजनिक रूप से गाया गया था। इसे रवींद्रनाथ टैगोर ने गाया था। इस घटना के बाद यह गीत पूरे देश में लोकप्रिय हो गया और लोगों को एकता के सूत्र में बाँधने लगा। 1905 में बंगाल विभाजन के विरोध में शुरू हुए स्वदेशी आंदोलन के समय वंदे मातरम् जन-आंदोलन का हिस्सा बन गया। लोग ब्रिटिश सामान का बहिष्कार करते थे और जुलूसों में वंदे मातरम् गाते थे। इससे लोगों में देश के लिए त्याग और संघर्ष की भावना पैदा हुई। श्री अरविंदो ने अपने समाचार पत्र ‘वंदे मातरम्’ के माध्यम से इस आंदोलन को नई दिशा दी। ब्रिटिश सरकार को यह गीत अपने शासन के लिए खतरा लगने लगा।

महात्मा गांधी ने भी वंदे मातरम् के महत्व को स्वीकार किया, लेकिन उन्होंने सभी धर्मों और समुदायों को साथ लेकर चलने की बात कही। इसी कारण भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने इसके केवल पहले दो अंतरों को अपनाया और इसे भारत का राष्ट्रीय गीत घोषित किया गया। आज के समय में भी वंदे मातरम् उतना ही प्रासंगिक है। यह स्कूलों, राष्ट्रीय कार्यक्रमों और सरकारी आयोजनों में गाया जाता है। कोविड-19 महामारी के दौरान भी, जब डॉक्टर और स्वास्थ्यकर्मी देश की सेवा कर रहे थे, तब उन्हें सम्मान देने के लिए वंदे मातरम् जैसे शब्दों का प्रयोग किया गया। खेल प्रतियोगिताओं में भी यह गीत भारत की पहचान को दुनिया के सामने रखता है।

2025 में वंदे मातरम् की 150वीं वर्षगांठ मनाई गई। इस दौरान कुछ राजनीतिक बहसें भी हुईं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि वंदे मातरम् आज भी समाज और राजनीति में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यह दिखाता है कि हमारे राष्ट्रीय प्रतीक समय के साथ नए अर्थ ग्रहण करते रहते हैं। आज भारत 79 वर्षों की स्वतंत्रता पूरी कर चुका है। भारत एक मज़बूत लोकतंत्र है और दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है। इस संदर्भ में विचारक अर्नेस्ट रेनां की यह बात बिल्कुल सही लगती है कि राष्ट्र लोगों की एकता और साझा भावना से बनता है। वंदे मातरम् इसी भावना का प्रतीक है और हमेशा रहेगा।

Author

  • लाएबा सिद्दीकी उत्तर प्रदेश के वाराणसी की निवासी हैं। वह जामिया मिल्लिया इस्लामिया के ए.जे.के. मास कम्युनिकेशन रिसर्च सेंटर (AJK MCRC) से डेवलपमेंट कम्युनिकेशन में स्नातकोत्तर की पढ़ाई कर रही हैं। उन्हें प्रशासनिक क्षेत्र में कार्य करने में विशेष रुचि है तथा विकसित भारत 2047 के दृष्टिकोण को साकार करने में अपना योगदान देने की आकांक्षा रखती हैं।

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