उत्तर प्रदेश के फ़ैज़ाबाद और जौनपुर से; उत्तराखंड के अल्मोड़ा से – कोरोना रिपोर्ट

गुफ़रान सिद्दीकी; फ़ैज़ाबाद, उत्तर प्रदेश:

पिछले वर्ष कोविड महामारी का पहला हमला जब देश पर हुआ तब लगा कि देश इससे उबर नहीं पाएगा। सरकार की गलत नीतियों की वजह से हालात बद से बदतर हो गए और आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्गों के सामने जीवन और मरण का सवाल खड़ा हो गया। लेकिन धीरे-धीरे आम जनता ने इस विपत्ति से अपने आपको बाहर निकलना शुरू कर दिया।

इसको लेकर सरकारें अपनी पीठ थपथपा ही रही थी कि देश मे कोरोना महामारी की दूसरी वेव आ गई। यह पहले से बिलकुल अलग है। इस बार, सीधे मेडिकल इमरजेंसी जैसे हालात हैं। लोग बदहवास हैं, डरे हुए हैं। हालात, स्वास्थ्य सुविधाओं के न मिलने से दिन पर दिन और ज़्यादा खराब हो गए हैं।

उत्तर प्रदेश में सबसे बुरा हाल राजधानी लखनऊ, बनारस, इलाहाबाद, गोरखपुर, नोएडा और कानपुर के हैं, जहां बड़ी संख्या में मज़दूर वर्ग रहता है। अगर ख़बरों पर नज़र डालें तो रोज़ शमशान घाट और कब्रिस्तानों में लाइन लग रही है। शमशान घाट से लगातार 24-24 घंटे उठने वाला धुआँ, हालात को बयां कर रहा है।

ऐसे में सूबे के मुखिया (प्रदेश के मुख्यमंत्री) ने फ़रमान जारी किया है कि उत्तर प्रदेश में ऑक्सीजन, बेड, रेमिडिसिवर और जीवन रक्षक दवाओं की कोई कमी नहीं है। अगर कोई सोशल मीडिया पर यह लिखता है तो उसके खिलाफ़ एनएसए के तहत कार्रवाही होगी और उसकी संपत्ति ज़ब्त कर ली जाएगी। ऑक्सीजन संबंधित किसी की मदद के लिए ट्वीट करने पर, द वायर की पत्रकार आरफा खानम शेरवानी पर रायबरेली पुलिस ने इसी आधार पर मुकदमा दर्ज़ किया है।

छोटे शहरों के हालात और भी भयावह हैं, यहाँ हॉस्पिटल कम हैं। ऑक्सीजन रिफिल नहीं हो रही, ऑक्सीजन आम लोगों तक उपलब्ध नहीं हो रही है। पुलिस का कहना है कि सिर्फ डॉक्टर्स और हॉस्पिटल्स के कहने पर ही उपलब्ध होंगे, जबकि डॉक्टर लिखने को तैयार नहीं है। ऐसे में सिर्फ ऑक्सीजन कि कमी से लोगों की मौत हो जा रही है। कई सरकारी डॉक्टरों का कहना है कि लोग कोविड से नहीं, बल्कि ऑक्सीजन न मिलने की वजह से मर जा रहे हैं और हम कुछ कर नहीं पा रहे हैं। जबकि निजी अस्पताल एक हज़ार से लेकर पांच हज़ार तक प्रति घंटा ऑक्सीजन का चार्ज कर रहे हैं, वो भी नॉन कोविड मरीज़ों के लिए।

फैज़ाबाद (अयोध्या) में भी देखें तो यही हाल है। रोज़ लोगों को ऑक्सीजन और दवाओं के लिए भागते देखा जा सकता है। जब तक आप क्रिटिकल केस नहीं हैं, तब तक न भर्ती किए जा रहे हैं और न ही कोई सुविधा मिल रही है। टेस्ट कराने के लिए लंबी-लंबी लाइन लगी है और कोई भी प्रोटोकॉल फॉलो नहीं हो रहा है। रोज़ 4-5 लोग आधिकारिक तौर पर मर रहे हैं जबकि असल आंकड़ा इससे और अधिक है।

कई जानकारों का कहना है कि अभी 15 मई तक यह महामारी अपने पीक पर पहुंचेगी। हम सभी ने देखा कि सरकारों द्वारा कोई तैयारी न किए जाने के कारण हज़ारों लोग अपनी जान से हाथ धो बैठे हैं। अब जबकि मौतों के आंकड़े रोज़ ब रोज़ बढ़ रहे हैं, तब सरकारें सिर्फ़ अपनी उपलब्धि गिनाने और इस अव्यवस्था के खिलाफ़ लिखने-बोलने वालों के दमन तक सीमित हो गई हैं। जबकि होना यह चाहिए कि कम से कम इस स्थिति के लिए देश के स्वास्थ्यमंत्री को तुरंत बर्खास्त कर देना चाहिए था। इतना ही नहीं केंद्र सरकार को पूरे देश से माफ़ी मांगनी चाहिए। ऐसा लगता है कि सरकार ने अपने हाथ खड़े कर दिए हैं और जिसके पास संसाधन हैं वो अपने आप को बचा पा रहा है, बाकी आम नागरिकों को मरने के लिए छोड़ दिया गया है।

इस वक़्त एक और समस्या बड़ी है। आर्थिक रूप से सम्पन्न लोगों द्वारा ऑक्सीजन सिलेंडर को स्टॉक कर लिया गया है। ज़रूरी दवाएं और इंजेक्शन का भी यही हाल है, जबकि उनको अभी ज़रूरत भी नहीं पड़ी है, लेकिन फिर भी वो सब भविष्य के लिए स्टोर कर चुके हैं। इस वजह से इन चीजों की शॉर्टेज हो गयी है व यह शॉर्टेज तेज़ी से बढ़ती जा रही है। ऑक्सीजन सिलेंडर मार्केट में आपको अब न के बराबर मिलेंगे और जो मिलेंगे भी उनकी कीमतें, मूल कीमत के चार से दस गुना दाम तक वसूली जा रही हैं। यही हाल रेमिडीसीवर इंजेक्शन और फेबिफ्लू जैसी दवाओं का भी है।

इन हालात में अवध पीपुल्स फोरम फैज़ाबाद, समुदाय स्तर पर जान-जागरूकता संबंधी काम कर रहा है। लोगों को कोविड सिम्टम्स में इलाज, टेस्ट जैसे मुद्दों पर जानकारी साझा कर रहा है। सामुदायिक स्तर पर युवा साथी अपने आस-पड़ोस और मुहल्लों में लोगों को टेलिफ़ोनिक बात करके मानसिक तनाव से निकालने का काम कर रहे हैं।

फोरम, अवध यूथ कलेक्टिव के साथ मिलकर फैज़ाबाद, अम्बेडकरनगर, गोंडा और सुल्तानपुर में लोगों को आपात स्थिति में सही सूचनाएं पहुँचाने का काम कर रहा है। इसके साथ ही ऑक्सीजन सिलेंडर और दवाइयाँ, घरों में बंद गंभीर मरीज़ों तक पहुंचाने का कार्य भी कर रहा है।

प्रदेश स्तर पर कोविड हेल्प ग्रुप से जुड़कर प्रशासन से छोटे शहरों में बेड और अस्पताल बढ़ाने के लिए एडवोकेसी की जा रही है जिसके बाद फैज़ाबाद में दो निजी हस्पतालों में 50 बेड की सुविधा प्रशासन द्वारा बढ़ाई भी गई है।

ऐसे समय पर सरकार व प्रशासन को निम्न कुछ कदम तत्काल प्रभाव से उठाने चाहिए – 

1. सरकार को हर जिले में जिला चिकित्सालय, सीएचसी (सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र) और पीएचसी (प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र) पर ऑक्सीजन की कमी को देखते हुए ऑक्सीजन कंसंट्रेटर उपलब्ध कराना चाहिए। 

2. घरों में क्वारंटाइन हुए लोगों तक दवा और ज़रूरी सामग्री की पहुँच सुनिश्चित की जानी चाहिए।

3. नॉन कोविड पेशेंट के लिए भी हेल्पलाइन शुरू करना चाहिए।

4. निजी अस्पतालों की मनमानी धन उगाही पर तत्काल रोक लगा कर उनको निर्धारित फीस में इलाज के लिए बाध्य किया जाना चाहिए।


लाल प्रकाश राही; जौनपुर, उत्तर प्रदेश:

कोविड – 19 महामारी दूसरे सत्र में अपने रौद्र रूप में पुनः प्रकट हुई है। इस बार का यह रूप पिछले साल की तुलना में ज़्यादा भयावह है पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव और उत्तर प्रदेश के पंचायत चुनाव ने भी इस महामारी को विस्तार देने में एक बड़ी भूमिका अदा की है। पिछले साल के लॉकडाउन और कोरोना महामारी के भय ने लोगों को काफी हद तक सुरक्षित रखा था। 

सरकार की बेफिक्री, सत्ता और चुनाव के प्रति मुहब्बत ने ना जाने कितने अपनों को हमेशा के लिए हमसे छीन लिया। ऐसा ही कुछ हाल उत्तर प्रदेश का भी है, सरकारें चाहे जो दावा करें पर हकीकत तो हकीकत ही होती है। लगातार मुख्यधारा की मीडिया से आ रही खबरों की मानें तो उत्तर प्रदेश, कोरोना महामारी की भयंकर चपेट में है यहाँ हर रोज सैकड़ों की संख्या में मौतें हो रही हैं। इन मरने वालों में कई हमारे अपने करीबी जानने वाले भी आज आज हमारे बीच नहीं है, जिनके नाम मुझे ज़ुबानी याद हैं। 

उत्तर प्रदेश का जौनपुर जिला भी कोविड -19 महामारी की चपेट से खुद को बचा नहीं पाया है, पंचायत चुनाव में मेरे कई साथी चुनाव ड्यूटी के समय संक्रमित हो गये थे, जिन्हे काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा। चुनाव ड्यूटी में लगे कई शिक्षकों की मृत्यु भी हो गई है। मेरे एक अज़ीज़ मित्र भारतीय स्टेट बैंक में शाखा प्रबंधक है जो चुनाव ड्यूटी में संक्रमित हुए और उन्हें काफी परेशानियों का सामना करना पड़ा। वहीं अमीनाबाद इंटर कॉलेज लखनऊ के हिंदी प्रवक्ता, मेरे प्रिय लेखक सुरेश पंजम जी की कोरोना से मृत्यु हो गई। ऐसे दर्जनों लोग है जिनकी मृत्यु कोरोना से हुई है, जिन्हें मैं व्यक्तिगत रूप से जनता हूँ। 

ऐसे सैकड़ों लोग रोज कोरोना के कारण समय से पहले ही मौत के मुंह में समाते जा रहे हैं, लेकिन देश और राज्य की सरकारें और उनके प्रतिनिधि सिर्फ एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाने के सिवाय और कुछ नहीं कर रहे हैं। अस्पतालों की हालत खस्ता है, ऑक्सीजन की कमी कारण बहुतों की मौत हो रही है। इस महामारी ने पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल खोल कर रख दी है। आईये कुछ जौनपुर की घटनाओं से आपको रूबरू करवाते हैं। 

24 अप्रैल को 10 बजे के करीब मेरे एक साथी कॉमरेड अशोक पांडे ने फोन कर बताया कि ग्राम गद्दोपुर थाना महाराजगंज बदलापुर, जौनपुर की सीता पांडे, पत्नी जय नारायण पांडे कोरोना बीमारी से संक्रमित थी। इलाज के लिए उन्हें एंबुलेंस से ले जाते समय रास्ते में ही उनकी मौत हो गई और एंबुलेंस कर्मी, मृतक महिला का शव सफेद कपड़ों में लपेटकर गद्दोपुर गाँव के बगीचे में ही छोड़ कर चले गए। इससे पूरा गाँव दहशत में आ गया, कोई बगीचे की तरफ जाने की हिम्मत नहीं कर पा रहा था। अशोक पांडे ने बताया कि एस.डी.एम. बदलापुर का फोन बंद जा रहा है, उन्होंने मुझसे मदद की अपील की तो मैंने तुरंत डी.एम. और एस.पी. को लिखा और फोन कर पूरी घटना की जानकारी दी। उधर से तुरंत कार्रवाही करवाने का आश्वासन भी मिला। अपने कई मीडियाकर्मी साथियों को भी मैंने इस पूरी घटना की जानकारी दी और न्यूज़ में घटना का कवरेज हुआ। आठ घंटे के बाद प्रशासन ने मृतक महिला के शव को गाँव के ही बगीचे में जे.सी.बी. से खुदवा कर शव को दफना दिया।

कुछ इसी तरह की खबर जौनपुर के थाना कोतवाली मड़ियाहूं, ग्राम अम्बरपूर की प्रकाश में आई। तिलकधारी सिंह की 55 वर्षीय पत्नी की कोविड संक्रमण से मौत हो जाने के बाद गाँव वालों ने अंतिम संस्कार करने से मना कर दिया। बुज़ुर्ग तिलकधारी, अपनी पत्नी की लाश लेकर घूमते फिर रहे थे। अंत में थककर साइकिल छोड़ बैठ गए। उनकी तस्वीरें सोशल मीडिया पर काफी वायरल हुई, स्थानीय प्रशासन ने इस घटना की अधिकारिक तौर पर पुष्टि नहीं की, लेकिन स्थानीय लोगों के मुताबिक यह घटना सही है। 

इसके साथ ही आम जन मानस में कोरोना को लेकर पिछले साल की तरह इस बार कोई विशेष डर नहीं है और ना ही सरकारें इसे लेकर गंभीर हैं, जबकि इस बार मरने वालों की संख्या पिछली बार से कहीं ज़्यादा हैं। खबरें तो यह भी बता रही हैं कि शमशाम घाटों पर ना ही शवों को जलाने के जगह मिल पा रही है और न ही लकड़ियाँ। गांवों में तो कुछ और ही कहानियाँ चल रही हैं, लोग बुखार सर्दी या खांसी आने पर कोरोना टेस्ट करने से डर रहे है, लोगों के बीच यह अफवाह आम बड़े स्तर पर फ़ेल चुकी है कि जाँच कराएंगे तो कोरोना निकाल देगा और फिर पुलिस उठा ले जायेगी। कुछ लोगों का यह भी कहना है कि मामूली बुखार खांसी को भी डॉक्टर कोरोना बता दे रहे हैं। कुछ लोग सतर्कता बरत रहे हैं, लेकिन बहुत सारे लोग अभी भी लापरवाह हैं और उनका मानना है कि कोरोना कोई बीमारी नहीं है।


महिपाल सिंह; अल्मोड़ा, उत्तराखंड:

आज पूरा देश कोरोना महामारी के संकट से गुजर रहा है। हमारी देश की स्वाथ्य व्यवस्था पूरे तरीके से चरमरा गई है, ऐसे में हमारा पहाड़ कैसे इससे अछूता रह सकता है? पहाड़ जिसका नाम सुनते ही लोगों के मन में हरियाली, ठंडी हवा और कुदरती खूबसूरती के खयाल हिलोरे मारने लगते हैं, मन उनकी कल्पना से भर जाता है और जब हर कोई चाहता है कि उस ख्वाब को पूरा करेंl लेकिन क्या किसी ने कभी उस खूबसूरती के परे यहाँ की परेशानियों को समझने की कोशिश की है? क्या कभी किसी के मन में यह खयाल नहीं आया कि हमारे आस-पास भी बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं हो? लगता है इसकी चिंता ना आम जनता को है ना यहाँ के विधायकों और जनप्रतिनिधियों को।

आज जब देश के महानगरों, राजधानी और आस-पास के राज्यों में ये हालात हैं तो डर का माहौल हर किसी के ज़ेहन में उठना लाज़मी है। वो पहाड़ जहां किसी के घर की बकरी-मुर्गी की चोरी की ख़बर कोसों दूर तक अपने देश की मीडिया की ख़बरों से ज़्यादा तेज़ी से पहुँच जाती हैं, वहाँ आज के सोशल मीडिया के दौर में ये ख़बरें कैसे दबी रह सकती हैं?

हर किसी के मन में भय है, ख़ौफ़ है, लेकिन फिर भी लोग एकदम लापरवाह चले जा रहे हैं। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र सिर्फ और सिर्फ लोगों को वैक्सीन लगाने मात्र के लिए ही काम में लिए जा रहे हैं। हर कोई वैक्सीन लगाने के लिए अपने नज़दीकी स्वास्थ्य केंद भाग रहा है। कुछ एक कोरोना से हुई मौतों को छोड़ दिया जाए तो अभी फिलहाल यहाँ इस तरह का कोई संकट नही है, और जो भी मौतें कोरोना से हुई वो किसी शहर से ही यहाँ आए थे। आज जिस तरह प्रशासन आँखें मूँदे बैठा है, पता नहीं किस संकट को निमंत्रण दे रहा? 

कोरोना पूरे देश में फैल रहा है, जिसे पूरा समाज दिन-रात टीवी पर देख रहा है। पहाड़ी क्षेत्र में कई जगहों पर लोगों को खांसी-बुखार की शिकायतें लगातार आ रही हैं। हल्की सी भी तबीयत बिगड़ने पर आस-पास लोगों के अंदर भय और शंका पैदा हो जा रही है। कई गाँवों में बाहर से आए लोगों में कोरोना के लक्षण आने से, पूरा गांव भयभीत हो जा रहा है। गाँव के लोग तड़प रहे हैं, पर हॉस्पिटल नहीं जा रहे हैं। कई लोगों को हफ्तों से बुखार खाँसी और उल्टी की समस्याएं हो रही हैं, लेकिन अस्पताल का डर सबके मन में है। इस सबसे कैसे कोई लड़े, किसी के पास कोई उपाय नज़र नही आ रहा है।

गांव में किसी को बीमारी है और अगर कोई गलती से उनकी तीमारदारी करने चले गए तो लोग उन्हें भी शक की नज़र से देख रहे हैं, मानो वही पूरे देश का दुश्मन है। रानीखेत के एक अस्पताल पर अल्मोड़ा ज़िले के लगभग 200 गाँव निर्भर हैं, इस अस्पताल में वेंटिलेटर तो दूर एक अदद डॉक्टर तक नहीं है। ये सिलसिला पीछले बीस-तीस साल से चला आ रहा है, आस-पास के शहरों में निजी अस्पतालों का एक बड़ा बाज़ार जो तैयार हुआ है। 

किसी भी गंभीर स्थिति में या बड़े केस में अस्पताल हाथ खड़े कर देता है। बस हल्द्वानी के या बड़े शहरों के बड़े अस्पतालों में रेफर के अलावा कोई इलाज नहीं है तो कैसे इस महामारी से लड़ा जाए? यह सोचने वाले भी तो कोई नहीं, बस सब कुछ देश के सिस्टम की तरह चल रहा। पूरे क्षेत्र में दूसरा सबसे बड़ा अस्पताल अल्मोड़ा में है, जिसका हाल भी किसी से छिपा नहीं है। आज उसमें आईसीयू वॉर्ड शुरू किए जाने की बात की जा रही है, लेकिन उससे बड़ी परेशानी उसके संचालन को लेकर है जिसे लेकर अस्पताल प्रशासन में ही अभी तक मतभेद हैं। ऐसा लग रहा है मानो समूचा उत्तराखंड भूसे के ढेर पर बैठा है, जहाँ एक चिंगारी मात्र से त्राहिमाम मच सकता है।

Authors

  • गुफरान, फैज़ाबाद उत्तर प्रदेश से हैं और सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़े हैं। वह अवध पीपुल्स फोरम के साथ जुड़कर युवाओं के साथ उनके हक़-अधिकारों, आकांक्षाओ, और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दों पर काम करते हैं।

  • महीपाल, सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़े हैं और दिल्ली की संस्था श्रुति के साथ काम कर रहे हैं। 

  • लालप्रकाश राही, उत्तर प्रदेश के जौनपुर ज़िले से हैं और सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़े हैं। वह दिशा संगठन के साथ जुड़कर स्थानीय मुद्दों पर काम कर रहे हैं।

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