डा. गणेश माँझी:

‘जोहार’ – मुख्यतः झारखण्ड के छोटानागपुर और संताल परगना में प्रचलित अभिवादन है। जो बचपन से अभी तक समझ में आया है वो है – हमारा अभिवादन स्वीकार करें, और कहिए क्या सेवा करें। मुंडारी में ‘जोआर’, या संताल में ‘डोबोक् जोहार’, छोटानागपुर और संतालपरगना क्षेत्र में ‘जोहार’ का ही समानांतर रूप है। मध्य भारत में ‘जय सेवा’ और ‘सेवा-सेवा’ मुख्यतः प्रचलित है, खासकर गोंड समुदाय के बीच। ‘जय सेवा’ का प्रत्युत्तर ‘सेवा-सेवा’ होता है, मुख्यतः ये कह रहा है – हमारा अभिवादन स्वीकार करें, और कहिए क्या सेवा करें। कुल मिलाकर, ‘जोहार’ और ‘जय-सेवा’ के अभिवादन का एक ही मतलब है और इसका मतलब काफी प्राकृतिक भी है। इसमें कोई धर्म, ईश्वर और समुदाय का बोध नहीं हो रहा है। कुल मिलाकर ये अभिवादन, समुदायों को जोड़ने वाले अभिवादन हैं।

समय के साथ देश के बदलते राजनीतिक और सामाजिक परिदृश्य के साथ, ‘जोहार’ का इस्तेमाल व्यापक होने लगा है। मध्य और पश्चिम भारत के काफी सारे आदिवासी समुदायों में ‘जय जोहार’ और ‘सेवा जोहार’ ज़्यादा प्रचलित हो रहा है। ‘जय’ को ‘जोहार’ के उपसर्ग की तरह इस्तेमाल करना, शब्द को ज़बरदस्ती समायोजित करने जैसे लगता है, क्योंकि ‘जय जोहार’, यानि ‘हमारा अभिवादन स्वीकार करें और कहिए क्या सेवा करें’ की जयकार करने जैसी बात है, जो उचित नहीं लगता है। दूसरी ओर ‘सेवा जोहार’ का इस्तेमाल काफ़ी व्यापक हो चला है, जिसमे ‘जय-सेवा’ से निकले शब्द ‘सेवा’ की ‘जोहार’ के साथ सन्धि हो रही है। ‘सेवा जोहार’ शब्द का प्रादुर्भाव, लगता है पूरब-पश्चिम, उत्तर और दक्षिण के आदिवासियों को मिलाने के लिए हो रहा है, जो काफ़ी सटीक और उपयुक्त प्रतीत होता है। ‘सेवा जोहार’ शब्द तात्कालिक आदिवासी राजनीति और सामाजिक परिदृश्य में क्रमशः संख्या के हिसाब से प्रजातान्त्रिक मज़बूती और सामंजस्य का एक नमूना है, जिसमें धर्म, ईश्वर और समुदाय का प्रभाव नजर नहीं आता है, बल्कि इसकी व्यापकता समस्त आदिवासी समुदायों की एकता का प्रतिनिधित्व करती है।

काल-खण्ड में धर्म रूपी साम्राज्यवाद जब आदिवासियों के बीच घुसता है तो “जोहार” का धार्मिक और ईश्वरीय रूपांतरण होने लगता है। हिन्दू और ईसाई धर्म मानने वालों के बीच में प्रचलित शब्द ‘राम-राम’ और जययेशु/ यीशु सहाय/ प्रेज द लार्ड हैं। धार्मिक समुदायों के बीच में प्रचलित ये अभिवादन उनके अपने मतावलम्बियों (धर्म मानने वालों) को पहचानने और समरसता को प्रगाढ़ करने का अच्छा ज़रिया हैं। झारखण्ड, छत्तीसगढ़, ओडिशा जैसे राज्यों में आदिवासी समुदाय बहुलता में हैं। इन धार्मिक मतावलम्बियों द्वारा अपने गढ़े गए शब्दों का इन राज्यों के आदिवासी समुदायों में धड़ल्ले से प्रवेश (पेनीट्रेशन) हो रहा है, जो काफ़ी हद तक आदिवासी समुदायों को अपने पक्ष में करने का संघर्ष प्रतीत होता है।

‘जोहार’ या ‘सेवा-जोहार’ किसी की बपौती नहीं है और ना ही इस पर किसी का कॉपीराइट है। जब एक समुदाय, दूसरे समुदाय से धर्म और ईश्वर के लाग-लपेट के बिना मिलता है तो एक बृहत् ‘जोहार’ या ‘सेवा जोहार’ समुदाय का निर्माण होता है, जिसका परिणाम बेहतर आदिवासी भविष्य के लिए सार्थक प्रतीत होता है। हालाँकि, बीच-बीच में ‘जोहार’ का इस्तेमाल ‘धार्मिक’ और ‘ईश्वरीय’ स्वीकृति के लिए पेश किया जाता रहा है, ताकि जहाँ पर धार्मिक व्यापार का खेत उर्वर हो, वहां अपनी व्यापकता बढ़ायी जा सके, जैसे – ‘मसीह जोहार’। इन सबके अलावा, स्कूल के नाम जैसे – ‘जीशु जाहेर हाई स्कूल’, ‘बिरसा शिशु विद्या मंदिर स्कूल’ भी अपने मत वाले धार्मिक और ईश्वरीय प्रभुत्व बढ़ाने के प्रयास के ही नमूने हैं।

‘जोहार’ एक शब्द मात्र के इतर, आदिवासी समरसता, एकता और प्रजातान्त्रिक राजनीति को एक व्यापक रूप देता है। इसकी व्यापकता और भी महत्वपूर्ण हो जाएगी अगर इसे बिना धर्म, समुदाय, जाति, ईश्वर का रंग लगाए इस्तेमाल किए जाए। मेरे ख़याल से, ‘जोहार’, ‘डोबोक् जोहार’ तथा ‘सेवा जोहार’ का प्रयोग काफ़ी उपयुक्त लगते हैं। मेरे दृष्टिकोण से धर्म के धंधे वाले शब्द, सिर्फ़ आदिवासी समूहों में सेंधमारी करके तोड़ने वाले रहे हैं।

Author

  • डॉ गणेश मांझी, झारखण्ड के सिमडेगा जिले के युवा स्कॉलर हैं। वे अभी गार्गी कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर (अर्थशास्त्र) के रूप में कार्यरत हैं।

    उन्हे आप इस ईमेल आईडी पर संपर्क कर सकते हैं : gmanjhidse@gmail.com

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