मध्य प्रदेश के बड़वानी और छिंदवाड़ा से; राजस्थान के चित्तौड़गढ़ से – कोरोना रिपोर्ट

सुखलाल तरोले; बड़वानी, मध्य प्रदेश:

अब ग्रामीण क्षेत्र में भी कोविड-19 तेज़ी से फैल रहा है। जब तक यह वायरस बड़े-बड़े शहरों में था, तब तक गाँव के लोग यह सोच रहे थे कि हर वर्ष कोई न कोई वायरस आता है, जिससे हमारी फसलें प्रभावित होती हैं। लेकिन यह ऐसा-कैसा वायरस आया हुआ है, जिससे लोग चलते-फिरते मर रहे हैं? इस वायरस की जानकारी उन्हें मोबाइल से मिल रही है। वे अब अपने शब्दों में इसे कह रहे हैं- “मानसोण रूग आय रोयो कोहे” जिस प्रकार मुर्गी, व अन्य पशु-पक्षियों में रोग आता है उसी प्रकार मनुष्यों पर यह रोग आया हुआ है। 

इस रोग के बारे में रूखमाबाई (उम्र लगभग 100 वर्ष) कहती हैं – “शहर के लोग हमें किसी न किसी रूप में लूटते आ रहे हैं, इस कारण यह बीमारी शहरों में पहले आई। भगवान सब देखता है। पहले अकाल के बारे में सुना और देखा है लेकिन मेरी जिंदगी में मैंने पहली बार सुना कि मनुष्य का भी कोई रोग होता है।” शायद उन्हें इस वायरस का अंदाज़ा नहीं था जो इतना भयानक है। जब मैंने रूखमाबाई से पूछा – “थाली, घंटी बजाने और दिये जलाने से यह रोग खत्म हो जाएगा क्या?” तब उनका पलटवार अजीब सा था। उन्होंने कहा – “अगर बीमारी थाली बजाने से खत्म हो जाएगी तो अस्पताल क्यों बने हैं? हम दिये जलाकर उल्टा बीमारी का स्वागत कर रहे हैं।”

आजकल सुबह-शाम, खेतों में, हैंडपंप पर, घरों में महिला-पुरुष, बच्चे सभी लोग इस बीमारी के बारे में चर्चा कर रहें हैं कि यह क्या हो रहा है? टीवी, मोबाइलों पर समाचारों आदि से मिलने वाली तरह-तरह की सूचनाओं से लोग डरे हुए हैं। टीवी और मोबाइलों से आने वाली यह खबरें, लोगों का मनोबल प्रतिदिन घटा रही हैं।         

फाग के माह में पश्चिम मध्य प्रदेश के आदिवासी क्षेत्रों में भंगोरिया हाट लगते हैं, जो गाँव के लोगों के लिए महत्वपूर्ण होते हैं। इस भंगोरिया हाट में लोग बड़े उत्साह के साथ जाते हैं और हाट- मेले का आनंद लेते हैं।  पर इस बार कोरोना वायरस के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए स्थानीय सामाजिक संगठनों ने मिलकर इन भंगोरिया हाटों में प्रतिबंध लगाने हेतु कलेक्टर को आवेदन भेजा था। सामाजिक संगठनों का कहना था कि यहां के अधिकतर आदिवासी समाज के लोग मज़दूरी के लिए पड़ोसी राज्य गुजरात व महाराष्ट्र गए हुए हैं और कोरोना वायरस इन राज्यों में अधिक फैला हुआ है। यदि वे सब एक साथ आएंगे तो कोरोना अधिक से अधिक फैल सकता है। परंतु यहां के राजनीतिक लोगों ने अपनी राजनीतिक रोटी सेंकते हुए अपना दबाव कलेक्टर पर बनाया जिसके कारण कलेक्टर ने दो बार अपना निर्णय बदला। बाद में गाँव के लोगों ने आपस में निर्णय लिया कि इस बार भंगोरिया हाट में हम लोग नहीं जाएंगे, क्योंकि जो बीमारी आई हुई है वह बहुत खतरनाक है। हम  किसी पुलिस के डर से नहीं बल्कि अपने जीवन को बचाने के लिए भंगोरिया हाट देखने नहीं जाएंगे।  

कोरोना को रोकने के लिए ग्रामीणों द्वारा किए गए प्रयास

देसी ईलाज- अधिकतर लोग देशी ईलाज भी कर रहे हैं जिसमें वे हल्दी वाला दूध, अदरक व अन्य जड़ी-बूटियों का काढ़ा का सेवन कर रह रहे हैं।

कावड़ यात्रा यह कावड़ यात्रा एक अनोखी प्रकार की होती है। जब गाँव में कई सारी बीमारियां या विपरीत परिस्थितियां आ जाती हैं जैसे किसी महामारी का फैलना, पशु-पक्षी अधिक मात्रा में मरने लगते हैं तब ग्रामीण लोग मिलकर उनके देवी-देवताओं की पूजा कर कावड़ यात्रा निकालते हैं। इस कावड़ यात्रा में गाँव के प्रत्येक घर से अनुपयोगी सामाग्री जिसमें पुरानी झाड़ू, सिका, जूते-चप्पल, पुराने कपड़े आदि को एक बड़ी लकड़ी पर बांध कर एक गाँव से दूसरे गाँव ले जाते हैं। साथ में कावड़ आवे कावड़ आवे कुररय का नारा लगाते हैं। 

गाँव के देवी-देवताओं की पूजा – गाँव के लोग उनके देवी- देवता जिसमें बाब देव, रानी काजल, हड़मत बाबा, राजु पान्टु, गाडु ठाकुर की पूजा कर उनसे विनती करते हैं कि इस बीमारी से हमारे गाँव की रक्षा करें। 

कोविड वैक्सीन पर भरोसा नहीं– गाँवों में नर्सों व आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं द्वारा वैक्सीन के टीके लगाए जा रहे हैं, परंतु ग्रामीणों को भ्रम है कि टीके से लोग मर रहे हैं, इसलिए अधिकतर लोग टीका नहीं लगवा रहे हैं। 

ग्रामीण क्षेत्रों में कोरोना वायरस पूरी तरह से अपने पैर पसार चुका हैं। रोज ही गाँव में 1 या 2 लोगों की मौत हो रही हैं। कई सारे लोग बीमार हैं। अधिकतर लोग बड़े अस्पतालों में जाने से डर रहे हैं। घर पर ही आसपास के झोला-छाप डॉक्टरों से मुंह-मांगी कीमत पर अपना इलाज करवा रहे हैं। गाँव के लोग अस्पताल इसलिए नहीं जा रहे हैं क्योंकि उन्हें डर है कि वहां, उन्हें जबरन कोरोना पॉज़िटिव बनाकर किसी अन्य जगह भेज दिया जाएगा। जहां पर हमारे जैसे गरीब लोगों को कौन देखेगा? वहां पर तो पैसा चलता है। जितना ज्यादा पैसा फेंकोगे उतना अच्छा इलाज होगा, अन्यथा वहां से मरकर ही आना है। साधारण बीमारी होने पर भी सरकारी अस्पताल के कर्मचारी हमसे सही व्यवहार नहीं करते हैं तो इस महामारी में हमारा क्या हाल होगा? इस डर से लोग अस्पताल नहीं जाना चाहते हैं। 

ग्रामीण क्षेत्रों में मौसम परिवर्तन के साथ ही सामान्य बुखार, सर्दी-खांसी हो रही हैं। उसे भी लोग कोरोना समझकर मन में डर बिठा लिए हैं। अधिकतर बुजुर्ग व्यक्ति की ही मौत हो रही है। टी.वी., मोबाइलों पर कोरोना की खबरें सुन-सुन कर लोग डरे हुए हैं कि अब क्या होगा?


शिव; बड़वानी, मध्य प्रदेश: 

हमारे मध्यप्रदेश के बड़वानी जिले में कोरोना की स्थिति ठीक है। जितने पॉजिटिव मिल रहे है, उसी के अनुपात में लोग ठीक भी हो रहे हैं। परन्तु ग्रामीण इलाके में लोग अपना कोरोना टेस्ट नहीं करा रहे है और कई लोग वैक्सीन लगाने के लिए भी तैयार नहीं हैं। उनको भय है कि जो लोग वैक्सीन लगा रहे है, वही लोग बीमार और पॉजिटिव आ रहे है और उनकी मौत हो रही है। ऐसे कुछ मामले सुनने भी आए हैं और कई ग्रामीण इलाकों में सर्दी, खाँसी या अन्य बीमारी होने पर भी लोग बड़े हॉस्पिटल में नहीं जा रहे हैं। केवल झोलाछाप डॉक्टर से ही इलाज करा रहे हैं या लोकल डॉक्टर से इलाज करा रहे हैं। लोग ठीक भी हो रहे हैं परंतु कई गांवों में बीमारी से मौत का आंकड़ा भी बड़ा है।

अच्छी बात यह है कि अधिकांश ग्रामीणों में कोरोना को लेकर जागरूकता है। अभी सामाजिक कार्यक्रम (जैसे शादी, मौत आदि) में अधिक संख्या में लोग नहीं आ रहे हैं। अगर आ भी रहे हैं तो मास्क लगा कर और एक दूसरे से दूरी बनाए रखते हैं, लेकिन लोग काफी डरे हुए हैं।


मोना; छिंदवाड़ा, मध्य प्रदेश:

जिंदाबाद, मैं मोना भलावी एमपी के जिला छिंदवाड़ा से हूं। हमारे गाँव खुटिया झंझरिया में सभी लोगों की बहुत ही ज़्यादा तबियत खराब थी। मेरे गांव के ही आधे से ज़्यादा लोग बीमार थे, लेकिन अभी सभी लोग ठीक हैं। कई लोगों को सर्दी, खांसी, जुकाम, शरीर का लूज़ होना और कमज़ोरी की शिकायत हो रही है। डॉक्टर हमेशा टाइफाइड ही बताते थे, लेकिन कई लोगों को पीलिया था, इन लोगों ने पीलिया निकलवाया और साथ ही लोकल डॉक्टर से इलाज भी करवाया, सभी लोग अब स्वस्थ हैं। 

मेरे गांव से 8 किलोमीटर दूर एक गांव है, वहाँ रहने वाले मेरे दूर के रिश्ते के एक मामा जी ने कोरोना का टीका (वैक्सीन) लगवाया था तो उनकी डेथ हो गई है इसलिए गांव वालों ने सोचा है कि हम टीका नहीं लगवाएंगे। उस गाँव में कुछ और लोगों की भी टीका लगवाने के 4-5 दिन के अंदर-अंदर डेथ हो गई है। पहला लॉकडाउन में एक भी लोग ऐसे बीमार नहीं थे। लेकिन इस बार सेकंड वाले लॉकडाउन में सभी लोग बीमार हो गए हैं। इसलिए सभी लोग डरे हुए हैं, इस बार बीमारी है और हमें लापरवाही नहीं करनी चाहिए, ऐसा बोलते हैं। 

मेरे गांव में एक भी लोग बीमारी से नहीं मरे हैं। अभी तक कोई भी हॉस्पिटल नहीं गया है चेकअप कराने हमारे एरिया से। टेस्टिंग की सुविधा यहाँ हमारे गाँव में नहीं है, उसके लिए छिंदवाड़ा जाना पड़ेगा। बड़ा हॉस्पिटल भी वहीं है, ज़्यादा तबीयत खराब होती है तो वहीं जाते हैं लोग। छिंदवाड़ा हमारे यहाँ से 25 किलोमीटर दूर है।


नारायण; चित्तौड़गढ़, राजस्थान:

जिंदाबाद साथियों। चित्तौड़गढ़, राजस्थान से मैं नारायण। दक्षिणी राजस्थान के लगभग सभी जिलों में कोरोना के केस बढ़ते जा रहे हैं। कुछ लोग पॉजिटिव होने के बाद कोरोना से जंग जीत कर बाहर निकल आ चुके हैं, लेकिन अभी तक कोरोना अड़ा हुआ है।

लोगों का इसमें बहुत बड़ा योगदान रहा है कि कोरोना की कमर तोड़ने के लिए वह लॉकडाउन के नियमों का सही तरह से पालन कर रहे हैं। राज्य व केंद्र सरकार भी अपनी अहम भूमिका निभाते हुए समय-समय पर गाइडलाइन जारी कर रहे हैं एवं वैक्सीन के टीके भी लगा रहे हैं। पर लोगों में एक यह भय है कि टीके के कारण लोग पॉजिटिव एवं बीमार हो रहे हैं। 50 वर्ष से अधिक उम्र के लोग वैक्सीन-टीका नहीं लगा रहे हैं। दक्षिणी राजस्थान में अभी बहुत ज़्यादा स्थिति खराब है क्योंकि दिन-ब-दिन कोरोना केस बढ़ते जा रहे हैं। लोग अपनी अन्य बीमारियों से भी परेशान है। पर उसका भी चेकअप कराने के लिए हॉस्पिटल में नहीं जा रहे हैं क्योंकि उनके दिमाग में यह भरा हुआ है कि हम हॉस्पिटल जाएंगे और हमें कोरोना पॉजिटिव बता दिया जाएगा।

Authors

  • मोना भलावी, मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा ज़िले से हैं। गोंडवाना स्टूडेंट यूनियन (GSU) की जिला सदय्सा मोना, सामाजिक परिवर्तन शाला से भी जुड़ी हैं ।

  • नारायण, राजस्थान के चित्तौड़गढ़ ज़िले से हैं और सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़े हैं। वह खेतिहर खान मज़दूर संगठन से जुड़कर समुदायों के हक़ और अधिकार के लिए काम कर रहे हैं।

  • शिव, मध्य प्रदेश के बड़वानी ज़िले से हैं और सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़े हैं। वह वहाँ के स्थानीय मुद्दों और छात्र मुद्दों पर आदिवासी छात्र संगठन के साथ जुड़ कर काम कर रहे हैं।

  • सुखलाल, मध्य प्रदेश के बड़वानी ज़िले से हैं और सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़े हैं। वह वहाँ के स्थानीय मुद्दों और छात्र मुद्दों पर आदिवासी छात्र संगठन के साथ जुड़ कर काम कर रहे हैं।

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