खिमा जेठी:

उत्तराखंड भारत का एक पहाड़ी राज्य है, जहाँ की प्राकृतिक सुंदरता जितनी आकर्षक है, जीवन उतना ही कठिन भी है। यहाँ की भौगोलिक परिस्थितियाँ, ऊँचे – नीचे पहाड़, दुर्गम रास्ते, सीमित संसाधन- मज़दूरों के जीवन को गहराई से प्रभावित करती है। 

भौगोलिक स्थिति और चुनौतियाँ: उत्तराखंड मुख्यत हिमालयी क्षेत्र में स्थित है। यहाँ के अधिकांश गाँव पहाड़ों पर बसे हुए हैं जहाँ पहुँचने के लिए लंबी दूरी पैदल तय करनी पड़ती है। सड़क और परिवहन की कमी, बार-बार भूस्खलन, मौसम की कठोरता (अत्यधिक ठंड और बारिश)। इन परिस्थितियों में मज़दूरों को काम करना बेहद कठिन हो जाता है।

रोज़गार के सीमित अवसर: पहाड़ी क्षेत्रों में उद्योगों का अभाव है। खेती भी पूरी तरह वर्षा पर निर्भर होती है और ज़मीन कम उपजाऊ होने के कारण उत्पादन अधिक नहीं होता है। जिस कारण लोगों की निर्भरता बाजार पर होती है। इस कारण मजदूरों को स्थायी रोजगार नहीं मिल पाता। उन्हें दूसरे राज्यों में पलायन करना पड़ता है। स्थानीय स्तर पर  मजदूरों को कम मजदूरी मिलती है। 

पलायन की समस्या: उत्तराखंड के मज़दूरों की सबसे बड़ी समस्या पलायन (Migration) है। हमारे क्षेत्र में अधिक काम न मिलने के कारण लोगों का पलायन हो रहा है। युवा और कामकाजी लोग रोज़गार की तलाश में शहरों की ओर जाते हैं, जिसमें लोगों को होटल कारखानों आदि में मज़दूरी करनी पड़ती है। पलायन होने के कारण गाँव खाली होते जा रहे हैं। बुज़ुर्ग और महिलाएँ ही गाँव में रह जाती हैं। पारंपरिक जीवन शैली प्रभावित हो रही है। गाँव में पहले समय में मज़दूरी का काम मिलता था, वर्तमान समय में मशीनों के आने के कारण लोगों को मज़दूरी मिलना कठिन हो रहा है। पहले गेहूं, धान, खास कटाई, लकड़ी काटने, बुवाई व कटाई में लोगों को लगाया जाता था। जब से मशीन ट्रैक्टर आदि गाँव में आए हैं लोगों की मज़दूरी खत्म हो गई है। 

महिला मज़दूरों की स्थिति: उत्तराखंड में महिलाएँ मज़दूरी का बड़ा हिस्सा संभालती हैं। महिलाओं द्वारा पशुपालन किया जाता है, जिससे महिलाएँ दूध की डेयरी लगाकर अपनी आजीविका चलाती हैं। महिलाओं के द्वारा दूसरों के खेतों में काम कर अपनी आजीविका चलाकर अपने परिवार का भरण पोषण करती हैं। वर्तमान समय में खेतों के कार्य में आधुनिकरण होने के कारण मशीनों का उपयोग अधिक मात्रा में किया जा रहा है, जिस कारण महिलाओं को रोज़गार से वंचित होना पड़ा है। इसका प्रभाव महिलाओं की आजीविका और परिवार के भरण-पोषण पर पड़ रहा है। महिलाएँ आत्मनिर्भर बनने के लिए स्वयं सहायता समूह से जुड़कर आर्थिक रूप से मज़बूत बना रही है। महिलाओं के द्वारा अपना व अपने परिवार का पूरा दायित्व निभाने के लिए कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के कारण महिलाओं को दुगुनी मेहनत करनी पड़ती है, लेकिन उन्हें उचित मज़दूरी और पहचान नहीं मिल रही। प्राकृतिक आपदाओं का प्रभाव – यह क्षेत्र भूकंप, बाढ़ और भूस्खलन जैसी आपदाओं के लिए संवेदनशील है। जैसे की आपदा आने से हज़ारों मजदूरों की आजीविका पर असर पड़ता है। 

सरकार द्वारा कई योजनाएँ चलाई जा रही हैं जैसे: महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम, सड़क और परिवहन सुधार योजनाएँ, स्वरोजगार योजनाएँ। इनसे कुछ हद तक मज़दूरों को राहत मिलती है, लेकिन महँगाई अधिक होने के कारण मज़दूरों की जीवन शैली में अधिक प्रभाव नहीं पढ़ पा रहा है। जिस कारण मज़दूरों को गाँव छोड़कर शहरों की ओर काम करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। उत्तराखंड की भौगोलिक परिस्थितियाँ मज़दूरों के जीवन को कठिन बनाती हैं। सीमित संसाधन, रोजगार की कमी और प्राकृतिक आपदाएँ उनकी समस्याओं को बढ़ाती हैं। यदि इन परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए योजनाएँ बनाई जाएँ और स्थानीय स्तर पर रोजगार बढ़ाया जाए, तो मज़दूरों की स्थिति में सुधार लाया जा सकता है।

Author

  • खीमा जेठी एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं जो पिथौरागढ़, उत्तराखंड से हैं। उन्होंने एम.ए. (समाज शास्त्र) की शिक्षा प्राप्त की है और 23 वर्षों तक अर्पण संस्था में कार्य किया है। वर्तमान में, वह पैरा लीगल वॉलंटियर (PLV) और महिला किसान अधिकार मंच (MAKAAM) के साथ वालंटियर के रूप में कार्यरत हैं। वह महिलाओं, किशोरियों और वरिष्ठ नागरिकों को कानूनी जानकारी और अधिकारों के प्रति जागरूक करने का कार्य करती हैं। साथ ही, वन पंचायत संघर्ष मोर्चे के साथ जुड़कर जल, जंगल और जमीन के मुद्दों पर भी काम कर रही हैं।

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