समित कुमार कर:
01 मई से जुड़ी ऐतिहासिक पृष्ठभूमिः
- 1 मई, 1886 – अमेरिका के शिकागो में “8 घंटे काम, 8 घंटे आराम, 8 घंटे मनोरंजन” की माँग को लेकर हड़ताल।
- हेमार्केट विस्फोट (4 मई, 1886): पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाई, कई मज़दूर शहीद हुए।
- 1889 में पेरिस में दूसरे इंटरनेशनल ने 1 मई को अंतर्राष्ट्रीय मज़दूर दिवस घोषित किया।
उद्देश्यः यह दिन उन लाखों मज़दूरों के बलिदान को सलाम करने का है, जिन्होंने कार्य दिवस को 12-14 घंटे से घटाकर 8 घंटे करवाया। आज यह दिन न्यूनतम मज़दूरी, सामाजिक सुरक्षा, संविदा (ठेका प्रथा) के उन्मूलन और कार्यस्थल पर सुरक्षा की माँग का वैश्विक प्रतीक है।
भारत में मई दिवस: गारवेलु चेट्टियार नाम के एक प्रभावी कम्यूनिस्ट नेता के सुझाव पर पहली बार वर्ष 1923 में भारत में मई दिवस मनाया गया। मद्रास में मई दिवस मनाने की अपील की गई। इस अवसर पर वहां कई जनसभाएं और जुलूस आयोजित कर मजदूरों के हितों के प्रति सभी का ध्यान आकर्षित करने का प्रयास किया गया। उनका कहना था कि दुनिया भर के मजदूर इस दिन को मनाते हैं, तो भारत में भी इसकी शुरुआत की जानी चाहिए।
डॉ. बी आर अम्बेडकर महत्वपूर्ण श्रम कानूनों के रूपकार हैं और उन्होंने भारत में, देश स्वतंत्र होने के पहले 1937-1938 में ब्रिटिश सरकार के वाइसरॉय को अपनी ज़िद एवं तर्क से श्रमिकों के लिए 14 घंटे से 8 घंटे कार्य समय निर्धारित करवाया था।
ववर्तमान परिप्रेक्ष्य में देश में चल रहा मज़दूर आंदोलन ही मई दिवस की प्रासंगिकता को ज़िंदा रखे हुए है। भारत के विभिन्न राज्यों (जैसे उत्तर प्रदेश, हरियाणा, झारखंड, पंजाब) में चल रहे मज़दूर आंदोलनों में श्रमिक मुख्य रूप से वेतन वृद्धि, नौकरी की सुरक्षा और श्रम कानूनों में बदलाव के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं। 2026 की शुरुआत में, नोएडा-मानेसर औद्योगिक क्षेत्र से लेकर रांची तक मज़दूर अपनी मांगों के लिए सड़कों पर हैं।
मज़दूर आंदोलनों में शामिल श्रमिकों की मुख्य मांगें निम्नलिखित हैं:
1. मुख्य आर्थिक और कार्य संबंधी मांगें:
- न्यूनतम वेतन वृद्धिः श्रमिक 20,000 से 26,000 रुपये प्रति माह के बीच न्यूनतम वेतन की मांग कर रहे हैं, क्योंकि उनका मानना है कि वर्तमान वेतन (जो कई जगह 11,000-13,000 रुपये के आसपास है) बढ़ती महंगाई और घर के खर्च के लिए अपर्याप्त है।
- समान काम के लिए समान वेतनः विभिन्न राज्यों में, विशेषकर नोएडा और मानेसर के बीच मज़दूरी में अंतर (wage disparity) को दूर करने और एक समान वेतन संरचना लागू करने की मांग है।
- ओवरटाइम का उचित भुगतान: मज़दूरों की मांग है कि अतिरिक्त समय (double overtime) काम करने के बदले कानून के अनुसार दोगुना वेतन दिया जाए।
- काम के घंटे: 8 घंटे की शिफ्ट सुनिश्चित करने और जबरन 12 घंटे काम कराने पर रोक लगाने की मांग।
2. सामाजिक सुरक्षा और कानूनी मांगें:
- चार श्रम संहिताओं (Labour Codes) का विरोधः श्रमिक संगठनों का कहना है कि केंद्र सरकार द्वारा लाई गई चार नई श्रम संहिताएं मज़दूर विरोधी हैं। वे इन्हें वापस लेने या लागू न करने की मांग कर रहे हैं, क्योंकि इनसे नौकरियां कम होंगी और सामाजिक सुरक्षा के अधिकार छिन जाएंगे।
- स्थायी नौकरी की मांग: कॉन्ट्रैक्ट या ठेका मज़दूरी (contractual labour) को समाप्त करने और कामगारों को नियमित कर्मचारी का दर्जा देने की मांग।
- सामाजिक सुरक्षा: भविष्य निधि (PF), ग्रेच्युटी और स्वास्थ्य बीमा (Health Insurance) जैसी सुविधाओं को सुनिश्चित करने की मांग।
3. अन्य विशिष्ट मांगेंः
- समय पर वेतन: वेतन और पे-स्लिप हर महीने की 10 तारीख तक मिलने की गारंटी।
- महिला सुरक्षा: कारखानों में महिलाओं के लिए नाइट शिफ्ट में सुरक्षा सुनिश्चित करना।
- जाति-आधारित भेदभाव पर रोक: पंजाब जैसे क्षेत्रों में भूमिहीन और दिहाड़ी मज़दूरों के लिए उचित मज़दूरी और जाति-आधारित भेदभाव को समाप्त करने की मांग।
आंदोलन के प्रमुख क्षेत्र और कारणः
- नोएडा-फरीदाबाद-मानेसर (NCR): यहाँ मुख्य रूप से कम मज़दूरी और हरियाणा के मुकाबले कम वेतन मिलने के कारण असंतोष है।
- झारखंड/बिहार (बरौनी): 12 फरवरी 2026 को हुए देशव्यापी बंद में इन राज्यों में भी वेतन वृद्धि और श्रम कानूनों के खिलाफ प्रदर्शन हुए।
- आउटसोर्स कर्मचारीः मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में आउटसोर्स (ठेके पर) कर्मचारी ठेका प्रथा को बंद करने की मांग कर रहे हैं।
संक्षेप में, ये आंदोलन “महंगाई के दौर में उचित वेतन और सुरक्षित भविष्य” की लड़ाई है।

Leave a Reply