सुरेश राठौर:

साथियों, देश ही नहीं, दुनिया भर में मज़दूरों को हमेशा से ही दोयम दर्जे का माना गया है। मतलब दुनिया के सारे निर्माण कार्य मज़दूरों के हाथों से किए जाते हैं, परन्तु दुनिया भर में निर्माण कार्य करने वाले हाथ हमेशा से ही खाली रहे हैं।

भारत जैसे विकासशील देश में मज़दूरों की हालत और भी खराब है, क्योंकि किसी भी आपदा/विपत्ति आने पर सबसे बड़ा बोझ इन्हीं के ऊपर आ जाता है। फिर चाहे महंगाई की मार हो या फिर कोविड जैसी वैश्विक आपदा के समय काम न मिलने के कारण पैदल ही अपने घरों में आने को बाध्य होना पड़े… बाढ़ की स्थिति हो या फिर सूखाड़ की… सरकारें आती-जाती रही हैं, पर मज़दूरों की स्थिति में कोई खास बदलाव देखने को नहीं मिला। आज भी मज़दूर अपने लिए साफ पीने का पानी, खाने के लिए दो वक्त की रोटी और रहने के लिए घर की व्यवस्था में अपना जीवन खपाता चला जा रहा है।

भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में हद तब हो जा रही है, जब इनके विकास के नाम पर बड़ी-बड़ी परियोजनाएँ बनाई जाती हैं, पर मज़ेदार बात ये है कि इनको किस तरह के विकास की ज़रूरत है, इनसे कभी पूछा नहीं जाता है। बड़ी-बड़ी कंपनियों को उपजाऊ ज़मीन सौंपने का काम सरकार या यूँ कहें कि सरकार के इशारे पर अफसरशाही कर रही है, पर मज़ाल है कि आप उसका विरोध कर सकें। क्योंकि विरोध करने वाले के घर पुलिसिया महकमा पहुँचकर पिछली पीढ़ी तक का रिकॉर्ड माँगने लग जाता है, और रिकॉर्ड उपलब्ध न कराने पर आपको नोटिस पकड़ाकर चले जाते हैं और पूछा जाता है कि आपका घर क्यों न बुलडोज़ कर दिया जाए।

पूर्वांचल के इलाके में बनारसी साड़ी से जुड़े लाखों परिवार आज भुखमरी के कगार पर आ गए हैं, क्योंकि सरकार का ऐसा मानना है कि बुनकरी के काम में मुसलमान लगे हैं। अगर इस व्यवसाय को ख़त्म कर दिया जाएगा तो मुसलमानों की हालत खस्ता हो जाएगी। केवल परेशान करने की गरज़ से सभी घरों के बाहर बिजली का स्मार्ट मीटर लगा दिया गया है, जिसके कारण बिजली बिल बहुत तेजी से बढ़ता जा रहा है। वातानुकूलित कमरों में बैठे अफसर-बाबू की जब मर्जी होती है, तब बैठे-बैठे बिजली कट हो जाती है। पता करने पर बताते हैं कि बिल नहीं भरने की स्थिति में बिजली काट दी गई है। आप चाहकर भी विरोध नहीं कर सकते, क्योंकि साहब से गलती तो हो नहीं सकती। बेचारा गरीब मज़दूर आदमी, जो घर से बहुत ही उम्मीद के साथ निकला था कि आज बिजली आ जाएगी और बुनकरी का काम शुरू हो जाएगा, अपने जीवन को कोसते हुए वापस आता है।

गाँव में रहने वाले हर मज़दूर, किसान, बुनकर की हालत खराब है, परन्तु आपकी हालत कितनी भी खराब क्यों न हो, पर आप किसी भी सरकारी कर्मचारी या फिर सरकार पर कोई सवाल नहीं कर सकते, क्योंकि सवाल करने का मतलब है कि आप देशद्रोही हैं और आपको जेल के अंदर डाल दिया जाएगा या फिर डालने की धमकी दी जाएगी। भारतीय संविधान की रोज धज्जियाँ उड़ाने वाली सरकार और अफसरशाही मज़दूरों को कीड़े-मकोड़े की तरह समझ रहे हैं।

सरकारी प्राथमिक विद्यालय में पढ़ाने वाले अध्यापक कह रहे हैं कि यहाँ पढ़ने आने वाले बच्चों के शरीर से बदबू आती है, कोई कैसे पढ़ाए। अब इनको कौन समझाए कि इन्हीं बच्चों के परिवारों की मेहनत के पैसे से इनको भारी-भरकम सैलरी मिलती है।

ऐसा नहीं है कि ऐसी स्थिति कोई दस-बारह सालों में हुई है। परन्तु इन दस-बारह सालों में अफसरशाही को इस तरह की बात करने की हिम्मत बढ़ी है, और इनको संरक्षित करने का काम हमारी चुनी हुई सरकारें कर रही हैं। क्योंकि किसी तरह की उठती हुई आवाज़ को दबाने का काम आज किया जा रहा है। गेंद अब उन तमाम गरीब, असहाय, मज़दूर, किसान, महिलाओं के पाले में है कि वो इस ज़ुल्म को कितना बर्दाश्त कर पाते हैं। या फिर एक जन आंदोलन खड़ा करते हैं, जो इन गूंगी और बहरी सरकारों को सबक सिखाकर इनको खदेड़ने का काम करेगा।

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  • सुरेश राठौर बनारस, उत्तर प्रदेश में रहते है और नरेगा के अंतर्गत महिला मज़दूरों के मुद्दों पर काम करते है ।

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