नितिन:
देश की आज़ादी की लड़ाई में सबसे पहले कुर्बानी देने वालों में आदिवासी समाज के लोग रहे हैं। जल-जंगल-ज़मीन की रक्षा के लिए आदिवासी समुदाय ने सबसे तीखे संघर्ष किए। इन्हीं संघर्षों की बदौलत देश की प्राकृतिक संपदा बची और अंग्रेज़ों के लूट और शोषण के खिलाफ आवाज़ खड़ी हुई।
आज बिरसा मुंडा, टंट्या मामा, खाज्या नायक और भीमा नायक जैसे क्रांतिकारियों के वंशजों के लिए इज़्ज़त से जीने के रास्ते लगातार मुश्किल होते जा रहे हैं।
आदिवासी इलाकों के गाँवों में फसलों का सही दाम नहीं मिलता। रोज़गार के अवसर भी कम होते जा रहे हैं। इसके कारण हज़ारों युवा अपनी जल-जंगल-ज़मीन छोड़कर गुजरात, महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे राज्यों में पलायन करने को मजबूर हैं।
आदिवासी समुदाय का कोई भी परिवार उजड़कर बाहर न जाए, इसी चिंता के साथ लगभग 20 साल पहले रोज़गार गारंटी कानून के लिए संघर्ष हुआ था। उस संघर्ष में आदिवासी समुदाय की बड़ी भूमिका रही और अंततः यह कानून बना।
लेकिन पिछले 10 वर्षों में धीरे-धीरे इस कानून को कमज़ोर किया गया है। आज स्थिति यह है कि रोज़गार गारंटी का असली मकसद ही खत्म होता दिखाई दे रहा है। अब सरकार ने इसे नए नाम से पेश किया है “विकसित भारत जी राम जी” कानून। लेकिन पुराने कानून की कमियों को दूर करने के बजाय इस नए कानून में उन्हें और पक्का कर दिया गया है।
असली समस्या: मज़दूरी और काम की गारंटी
मध्य प्रदेश में सरकारी न्यूनतम मज़दूरी 467 रुपये प्रतिदिन है, लेकिन मनरेगा के तहत आदिवासी समुदाय के मज़दूरों को केवल 261 रुपये प्रतिदिन मिलते हैं। इस तरह देखें तो यह मज़दूरी नहीं, बल्कि बेगारी जैसी स्थिति बन जाती है।
महंगाई लगातार बढ़ रही है, लेकिन मज़दूरी वहीं की वहीं अटकी हुई है। आज के हालात में किसी भी ग्रामीण परिवार को सम्मानजनक जीवन के लिए कम से कम 600 रुपये प्रतिदिन की मज़दूरी की जरूरत है। लेकिन सरकार के नए कानून में भी यह बात पूरी नहीं होती।
मनरेगा में पहले से मौजूद समस्याएँ, जैसे फर्जी मस्टर रोल, गलत माप और भ्रष्ट मूल्यांकन, लंबे समय से आदिवासी मज़दूरों की मेहनत और मज़दूरी की चोरी करते रहे हैं।
अब मोबाइल हाज़िरी, जीओ-टैगिंग, आधार-केवाईसी और चेहरे के स्कैन जैसी तकनीकें भी इसमें जोड़ दी गई हैं। इससे काम पाना और मज़दूरी लेना आदिवासी समुदाय के लिए और कठिन हो सकता है।
सरकार दावा करती है कि अब 125 दिन का काम मिलेगा। लेकिन पिछले दस वर्षों का अनुभव यही बताता है कि आदिवासी समुदाय को 100 दिन का काम भी मुश्किल से मिल पाता है।
बेरोज़़गारी और भूख को बजट की कमी के बहाने नहीं रोका जा सकता, लेकिन नया कानून साफ कहता है – “बजट नहीं तो काम नहीं।”
नए कानून की पाँच बड़ी खामियाँ
- मज़दूरी का रेट: महंगाई लगातार बढ़ रही है, लेकिन मज़दूरी नहीं बढ़ाई जा रही है। मध्यप्रदेश की न्यूनतम मज़दूरी 467 रुपये प्रतिदिन है, जो मौजूदा हालात में भी कम है। आदिवासी समुदाय का मानना है कि यह कम से कम 600 रुपये प्रतिदिन होनी चाहिए।
- टेक्नोलॉजी का जाल: मोबाइल हाज़िरी, आधार-केवाईसी और चेहरे के स्कैन जैसी व्यवस्थाएँ अब कानून का हिस्सा बन रही हैं। जॉब कार्ड बनाना और हर तीन साल में केवाईसी करवाना अनिवार्य कर दिया गया है। इससे आदिवासी मज़दूरों के नाम काटे जाने या भुगतान रुकने का खतरा बढ़ सकता है।
- भ्रष्ट मूल्यांकन: अब भुगतान मूल्यांकन के आधार पर होगा। इसका मतलब है कि 8 घंटे की मेहनत के बावजूद मज़दूरों को पूरा दाम मिलने की गारंटी नहीं रहेगी।
- समय पर काम और भुगतान की समस्या: भुगतान का आधा बोझ अब पहले से कर्ज़ में डूबी राज्य सरकारों पर डाला जा रहा है। यदि समय पर काम नहीं खुलता या मज़दूरी नहीं मिलती, तो इसके लिए अधिकारियों की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।
- ग्राम सभा की भूमिका कमजोर: नए कानून में यह स्पष्ट नहीं है कि कौन सा काम कहाँ होगा। जबकि असली जरूरतें गाँव की ग्राम सभा को ही सबसे बेहतर पता होती हैं। इसके बावजूद सरकार ऊपर से निर्णय थोप सकती है।
आदिवासी समुदाय भी एक ऐसे “विकसित भारत” की कल्पना करता है जहाँ गाँव में ही सम्मानजनक रोज़गार मिले, समय पर काम खुले और मेहनत का पूरा दाम मिले। तभी गाँवों से पलायन रुकेगा और आदिवासी समाज अपने घर, जंगल और ज़मीन से जुड़े रह पाएगा।

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