कोर्दुला कुजूर:

जल, जंगल, ज़मीन का संघर्ष आदिवासी समाज का महत्वपूर्ण संघर्ष रहा है। दुनिया के सभी आदिवासी अपने जीवन को बचाने के लिए अपने-अपने तरीके से लड़ाई लड़ रहे हैं। सरकार और कॉर्पोरेट उनके जल, जंगल और ज़मीन पर गिद्ध की निगाहें डाली हुई हैं, क्योंकि आदिवासी का जीवन जंगलों और उनके इर्द-गिर्द ही बसता है। उनका जीवन जल, जंगल और ज़मीन (इन तीनों) के बिना अधूरा है। जल, जंगल अथवा प्रकृति ही उनका भगवान होता है, देवता होता है, इसलिए किसी भी कीमत में वे उन्हें नहीं छोड़ना चाहते हैं। और ऐसे समय में यदि उन्हें इन सब चीज़ों से, चाहे किसी भी कारण से, बेदखल किया जाए तो संघर्ष करना उनके जीवन का हिस्सा बन जाता है।

आज तक आदिवासी समाज में जो भी आंदोलन हुए हैं, चाहे वह जल, जंगल, ज़मीन बचाने की लड़ाई हो, घर या गाँव बचाने की बात हो या फिर समाज में किसी तरह की हिंसा की बात हो, हर आंदोलन अथवा संघर्ष में महिलाएँ प्रथम पंक्ति में रही हैं और आंदोलन में सफलता भी पाई है।

हम जानते हैं कि आदिवासी महिलाओं का नेतृत्व और संघर्ष सदियों पुराना है, जो जल, जंगल, ज़मीन के अधिकारों, महाजनी शोषण और विनाशकारी विकास परियोजनाओं के खिलाफ सशक्त रूप से खड़ी रही हैं।

यदि हम बड़े आंदोलनों की बात करें, जैसे बिरसा मुंडा उलगुलान, संताल विद्रोह और जतरा/टाना भगत के आंदोलनों की बात हो, वहाँ असंख्य महिलाओं ने बलिदान दिया है, जिनमें से कुछेक को छोड़कर आज भी अधिकतर गुमनाम हैं। संताल विद्रोह, बिरसा मुंडा उलगुलान और छोटानागपुर के लगभग सभी विद्रोहों में पुरुषों के साथ महिलाओं ने कंधे से कंधा मिलाकर लड़ाई लड़ी है।

आज भी झारखंड में कोयलकारो आंदोलन, नेतरहाट आंदोलन और नगड़ी आंदोलन में महिलाओं की अच्छी भागीदारी रही है और वे हमेशा नेतृत्व में अग्रणी रही हैं।

यदि हम राष्ट्रीय स्तर पर देखें तो नर्मदा बचाओ आंदोलन और हसदेव बचाओ आंदोलन जैसे संघर्षों में भी आदिवासी महिलाओं ने अपनी आजीविका और घर-ज़मीन बचाने के लिए अथक संघर्ष किया है और सरकार तथा कॉर्पोरेट घरानों की दमनकारी नीतियों के खिलाफ लड़ाई लड़ रही हैं।

इस तरह से हम कह सकते हैं कि आदिवासी संघर्षों में केवल फूलो-झानो मात्र ही नहीं हैं, बल्कि उनके जैसी कई पुरखिन औरतें हैं और वर्तमान समय में भी उनका निर्वाह करने वाली कई ऐसी महिलाएँ हैं, जिन्होंने संघर्ष को अपने जीवन का हिस्सा बना लिया है।

फिर भी मैं अपने व्यक्तिगत अनुभव और वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए झारखंड के संदर्भ में कहना चाहती हूँ कि आने वाले समय में झारखंड का आंदोलन किस दिशा में जाएगा, कहना मुश्किल है, क्योंकि बाहरी ताकतें यहाँ हावी होती जा रही हैं और यहाँ के आंदोलन को कमज़ोर करने और लोगों के आपसी संबंधों को तोड़ने के लिए कई तरह के हथकंडे अपना रही हैं। जब-जब किसी बड़े मुद्दे को लेकर लोग एकजुट होते हैं, तब-तब आदिवासियों को धर्म के नाम पर लड़वाया जाता है। लोग भाई-भाई को नहीं पहचान रहे हैं और यहाँ की ज़मीन धड़ल्ले से दूसरों के हाथ में चली जा रही है – कभी नए शहरों को बसाने के लिए, कभी खदानों के लिए और कभी टूरिज़्म के नाम पर।

यदि समय रहते यहाँ के लोग इन सब बातों को नहीं समझे, तो वो दिन दूर नहीं जब उन्हें अपना कहने के लिए कुछ भी नहीं बचेगा।

आगे यदि हम आदिवासी महिला नेतृत्व की बात करें, तो आदिवासी महिलाओं ने अपने अधिकारों और नेतृत्व क्षमता के विकास में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। आदिवासी महिलाओं का नेतृत्व और निर्णय क्षमता का विकास अपने समुदाय के अलावा अन्य समुदायों और समाज के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा सकता है।

आदिवासी महिलाओं का संघर्ष और नेतृत्व केवल जल, जंगल, ज़मीन तक ही सीमित नहीं है, बल्कि अपनी संस्कृति की रक्षा के लिए भी इसे ऐतिहासिक माना जा सकता है।

आदिवासी महिलाएँ अपने पारंपरिक ज्ञान और संस्कृति के संरक्षण में भी सक्रिय भूमिका निभा रही हैं और उनकी निर्णय लेने की क्षमता में लगातार वृद्धि हो रही है। बावजूद इसके, अपने ही समाज में उन्हें कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। भेदभाव, गरीबी और सामाजिक असमानताएँ उनके लिए रुकावट बन रही हैं। फिर भी आदिवासी महिलाएँ अपने अधिकारों के लिए लगातार संघर्ष कर रही हैं।

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  • कोर्दुला कुजूर आदिवासी एक्टिविस्ट हैं और रांची, झारखंड में रहती हैं। महिलाओं और बच्चों के सवालों पर वह लंबे समय तक काम करते आ रही है और झारखंडी आदिवासी वुमेन्स एसोशियन शुरुआत करने में प्रमुख भूमिका निभाई हैं। साथ ही झारखंडी आदिवासियों के भाषा आंदोलन के सहभागी बनकर कुड़ुख भाषा को बचाए रखने का महत्वपूर्ण भूमिका निभाते आयी हैं।

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