शंकर तड़वाल:
भारत के देशज माने जाने वाले आदिवासी लोगों का अपना अस्तित्व बचाने के लिए अपनी ओर से अनेक प्रयास किए जा रहे हैं। कार्तिक उराव महोदन ने भारत में आदिवासियों को संगठित करने के लिए आदिवासी विकास परिषद् बनाया। इस परिषद् ने आदिवासी प्रतिनिधियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को ज़मीन से ऊपर उठाया, ऊपर से शिखर तक पहुँचाया, शिखर से सत्ता तक पहुँचाया। उसके बाद आदिवासी विकास परिषद् को चलाने वाला कोई नहीं बचा। लोगों के जीवन से जुड़े मुद्दों की लड़ाई लड़ने वाला कोई नहीं बचा, यानी आदिवासियों के मुद्दों को शासन तक ले जाने वाला कोई नहीं बचा। सत्ता में पहुँचे आदिवासी राजनेता पार्टियों की रीति-नीति के निर्वहन में ढल गए।
1987-88 के समय से झारखण्ड के माननीय डॉ. राम दयाल मुण्डा ने ‘भारतीय आदिवासी संगमम’ की स्थापना कर आदिवासी लोगों के अस्तित्व टिकाए रखने की पैरवी संयुक्त राष्ट्र संघ में की।
इस संगमम के प्रयास से भारत के आदिवासियों को संयुक्त राष्ट्र संघ की विश्व के आदिवासियों के लिए की गई घोषणाओं का बड़े पैमाने पर प्रचार-प्रसार किया गया। देश में एक साथ आदिवासी लोगों में जन-जागृति की बाढ़ आई। समय आया 1988-89 का, जब महाराष्ट्र के शाहदा और पालघर के क्षेत्रीय जन-संगठन, श्रमिक संगठन और भूमि सेना ने ‘आदिवासी एकता परिषद्’ का गठन किया।
भारत में 1871 में हर 10 वर्ष में जनगणना करने की शुरुआत हुई थी। भारत की विखण्डित स्थिति के धर्मों को अंग्रेज़ी शासन काल में 1871 की जनगणना में पहली बार धर्मों को सरकारी दर्ज़ा मिला, जिसमें 1. हिन्दू, 2. मुस्लिम, 3. सिख, 4. ईसाई, 5. जैन, 6. बुद्ध, 7. जनजातीय धर्म था। 1941 तक यह जनगणना होती रही, तब तक जनजातीय धर्म लिखा जाता था।
1950 में भारत का संविधान देश में लागू हुआ और भारतीय संविधान में अनुच्छेद 25 के तहत देश के सभी धर्मों को धार्मिक स्वतंत्रता की मान्यता दी गई। भारत सरकार ने संविधान लागू होने के बाद 1961 से केवल आदिवासियों के जनजातीय धर्म को विलोपित कर दिया। जिससे भारत के अशिक्षित और अशिक्षित रखे गए आदिवासी कई प्रकार के धर्मों में मदद, सहयोग, सुरक्षा, सुधार और चिकित्सा सहायता के नाम से विभक्त हो गए; पूरी तरह से समूह जीवन खत्म हो गया।
भू-राजस्व संहिता 1959 की धारा 165 से 178 कानून में आदिवासियों की ज़मीन को गैर-अनुसूचित व्यक्ति नहीं ले सकते। इस प्रावधान के बावजूद बड़े पैमाने पर आवासीय भूमि बनाकर भारत में लाखों एकड़ ज़मीनें एन-केन-प्रकारेण छीन ली गईं। भू-राजस्व संहिता 1959 की धारा 165 से 178 कानून की बड़े पैमाने पर अवहेलना की गई।
संविधान के मौलिक अधिकार के अनुच्छेद 19 में भारत का नागरिक भारत में कहीं भी अभिव्यक्ति, शांतिपूर्ण सम्मेलन, संघ बनाने, सर्वत्र अबाध संचरण, निवास और बसने का अधिकार देता है, किन्तु 19(5) में आदिवासी क्षेत्र में 19(5)(घ) राज्य क्षेत्र में सर्वत्र अबाध संचरण और 19(5)(ङ) राज्य क्षेत्र में निवास करने और बसने के लिए गैर-अनुसूचित व्यक्ति को एकदम मना किया गया है।
यह प्रावधान इसलिए किया गया कि उनके यहाँ बसने, ज़मीन आवंटन करने, व्यापार-विनियम करने, धन उधार देने और साहूकारी करने से आदिवासी संस्कृति प्रभावित हो रही है या आगामी समय में आदिवासी संस्कृति पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की सम्भावना है। संविधान के 19(5) के निर्देश के अमलीकरण के लिए ‘पंचायत उपबन्ध विस्तार अधिनियम 1996’ के 4(ण) में भारत की संसद ने अनुसूचित क्षेत्र में ज़िला स्वशासी परिषद गठन की व्यवस्था की।
पंचायत उपबन्ध विस्तार अधिनियम 1996 के तहत भारत के 10 राज्यों में नियम बनाए गए हैं, किन्तु भारत के एक भी राज्य ने इस कानून के 4(ण) में ज़िला स्वशासी परिषद का गठन नहीं किया है। जिससे भारत के अनुसूचित क्षेत्र वाले आदिवासियों की न ज़मीन बच रही है, न बच पाई है। व्यापार और साहूकारी से न शोषण रुका है, न लूट पर लगाम लगी है। गैर-अनुसूचित लोगों, साहूकारों, व्यापारिक सेक्टर, कम्पनी और शासन तंत्र की नीतियों से बेलगाम आदिवासियों की कृषि भूमियाँ अधिग्रहित की जा रही हैं। खनिज पदार्थ दोहन के नाम से आदिवासियों को अपनी भूमियों से खदेड़ने का दौर तीव्रतम है।
इधर आदिवासियों को हाशिये से उबारने के लिए संविधान के मौलिक अधिकार 15(4) में सामाजिक-शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े अनुसूचित जनजाति वर्ग की उन्नति के लिए कोई विशेष उपबन्ध या प्रावधान करने की व्यवस्था करने का निर्देश है। संविधान के पन्नों में हम बहुत सुरक्षित हैं। हमें भूमि विनियम में रोक का अधिकार मिल गया, गैर-अनुसूचित जनजाति के बीच भूमि विक्रय में व्यवधान का अधिकार मिल गया। यहाँ तक कि उच्चतम न्यायालय भी इस पर सुनवाई या बहाली का फ़ैसला नहीं कर सकता, ऐसी शक्ति मिल गई।
धरातल पर वास्तविकता का हम आकलन करें। संविधान बनाने के समय माननीय जयपाल सिंह मुण्डा ने आदिवासियों के लिए आवाज़ मुखर की, वे संविधान निर्माण तक लड़ते रहे। उसके बाद भारत में आदिवासियों के लिए या आदिवासियों के कई प्रकार के जन-संगठनों का गठन हुआ, स्वयंसेवी संस्थाएँ बनीं। उनके लिए अब आत्म-मंथन का समय आ गया है कि वाकई क्या हम आदिवासियों की शिक्षा व्यवस्था की बहाली की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं? आदिवासियों की शिक्षा व्यवस्था मज़बूत करने में क्या हम सफल हो पाए हैं? आदिवासियों के भूमि अधिकार को क्या हम सुरक्षित कर पा रहे हैं?
जयपाल सिंह मुण्डा का संविधान सभा में सदस्य बनना और आदिवासियों के लिए ‘आदिवासी’ शब्द को संवैधानिक मान्यता देने की मांग रखना देश के आदिवासियों के लिए बहुत उपयोगी मांग थी, परन्तु देश आज़ाद होने और संविधान लागू होने के बाद इस विषय को लेकर आगे कोई संघर्ष नहीं बन पाया।
भारत के पूर्वोत्तर राज्य त्रिपुरा, असम, मणिपुर, मेघालय में छठी अनुसूची की व्यवस्था अनुच्छेद 244(2) के नाम से संविधान में एक अलग व्यवस्था बनी। वहाँ के लिए केन्द्र और राज्य में कानून बने और राज्य में नियम भी बन गए। भारत के अन्य 10 राज्यों में पाँचवीं अनुसूची संविधान के अनुच्छेद 244(1) के नाम से बनी, किन्तु उसके केन्द्र में कानून नहीं बने और राज्य नियम नहीं बने।
जिसको लेकर संविधान लागू होने के बाद बड़ा आन्दोलन बनना था, लेकिन नहीं बना। भारत की दूसरी जातियों से आदिवासी लोगों की संस्कृति-सभ्यता भिन्न थी। उसे बचाने के लिए धार्मिक पहचान का बड़ा मुद्दा संविधान लागू होने के बाद बनना था, वह भी बन नहीं पाया।
भारत की विभिन्न विकास परियोजनाओं द्वारा आदिवासियों की नदी घाटियाँ हों, या जंगल भूमि, या खनिज सम्पदा सरकारें या निजी व्यक्ति व बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ नहीं ले सकते इस बात का संविधान में उल्लेख है, जो 1996 के समय समता जजमेंट में भी सुप्रीम कोर्ट से निकलकर आया। उड़ीसा के नियमगिरी का जजमेंट भी निकलकर आया। भारत के आदिवासी आन्दोलन ने अपने पक्ष के इन फ़ैसलों को आन्दोलन का रूप देना चाहिए था, जो नहीं दे पाए। नियमगिरी को लेकर सुप्रीम कोर्ट का जजमेंट आदिवासियों की रूढ़ि-प्रथा को बचाने के आधार पर आदिवासियों के पक्ष में आया था। बल्कि भारत का आदिवासी राजनैतिक वर्ग गैर-अनुसूचित जनजाति के धार्मिक प्रचार-प्रसार के आन्दोलन को स्वीकार कर लिया और उनके साथ हो लिया।
अंग्रेज़ी शासन काल में कई वर्षों तक आदिवासियों का धर्म कोड चला आ रहा था, जो 1950 के बाद भारत सरकार ने विलोपित कर दिया। आदिवासी राजनैतिक वर्ग द्वारा उसे लड़ाई कर हासिल करने के बजाय गैर-अनुसूचित जनजाति के धर्मावलम्बियों के साथ जा मिले। और वही आदिवासी वर्ग का पार्टी नेता आदिवासी संस्कृति को विलुप्त करने के आन्दोलन में जुट गया।
आदिवासी शब्द और जनजाति शब्द दोनों शब्दों को विलुप्त करने में आदिवासी राजनेता तन-मन-धन से लग गया।
संविधान के अनुच्छेद 330 में विधानसभा और लोकसभा में, 332 में भारत के आदिवासियों के लिए अलग संस्कृति और पहचान के मुताबिक जो आरक्षण मिला हुआ है, उसी को समाप्त करने के आन्दोलन में आदिवासी राजनेता संलग्न हो गया।
आदिवासियों की अलग पहचान और अलग संस्कृति, अलग रूढ़ि-प्रथा की हैसियत से ही अलग समाज मानकर संविधान के अनुच्छेद 16(4) में आदिवासियों को नौकरियों एवं पदों में जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण देने का प्रावधान है। उसी को खत्म करने के संघर्ष में आदिवासी राजनेता लग गए हैं।
दुर्भाग्य से भारत के जागरूक जन-संघर्ष इन दिशाहीन राजनेताओं को भी नहीं समझा पाए, मार्गदर्शन नहीं कर सके।
भारत का आदिवासी जन-आन्दोलन इतना दुर्बल-निर्बल रहा कि वन संरक्षण संशोधन विधेयक 2023 भारत के वनों में निवासरत आदिवासियों की भूमियों, जंगलों को प्राइवेट सेक्टर में देने के लिए नया कानून केन्द्र ले आई।
संविधान के नीति-निदेशक तत्व के अनुच्छेद 39(ड) में स्त्री-पुरुष मज़दूरों को स्वस्थ शरीर के साथ रोजगार में लगने की व्यवस्था है। किन्तु आज भारत के हर राज्य में कारखाना-जन्य, उद्योग-जन्य, व्यवसाय-जन्य बीमारी से अब तक लाखों की संख्या में मज़दूरों की मृत्यु हो चुकी है। उक्त मज़दूर सिलिकोसिस, विसिनोसिस, टोबाकोसिस, बेगासोसिस, एस्बेस्टोसिस जैसी औद्योगिक व्यवसायजन्य बीमारी से मारे गए हैं। उनकी सुरक्षा, राहत, पुनर्वास के लिए भारत सरकार के पास कोई नीति, कानून, योजना नहीं है।
इसी संविधान की कलम 39(च) में बच्चों को जो 18 वर्ष से कम उम्र है, शोषण से बचाने के लिए जो निर्देश है, उन्हें कारखाने या अन्य किसी असुरक्षित रोजगार में नहीं नियुक्त करने की व्यवस्था संविधान में अनुच्छेद 24 में भी निर्देशित है। उनके लिए बाल श्रम (प्रतिषेध व नियंत्रण) संशोधन विधेयक 2012 बनने के बाद भी हर जगह बाल मज़दूर मज़दूरी कर रहे हैं। उसे न आदिवासी जन आन्दोलन रोक पाया है, न आदिवासी राजनेता बाल मज़दूरी की रोकथाम कर पाए हैं।
इसी असन्तोष के परिणामस्वरूप तथा भारत में आर्थिक विषमता, जातिवाद, भेदभाव में बदलाव लाने के लिए हिंसा का सहारा लेकर नक्सलवाद पनप गया। नक्सलवादी आन्दोलन के चलते सरकार न उनकी माँगें मान सकी, न जनता का समर्थन उन्हें मिला, और न ही संवैधानिक मार्ग से लड़ने वाले जन-संगठनों ने उनका सहयोग किया।
उसका विकल्प के रूप में शान्तिपूर्ण आन्दोलन देश में संगठित रूप से सतत काम करने वाला आन्दोलन उभरने की ज़रूरत थी, जो आज देश में आम जन के मूलभूत संवैधानिक अधिकारों की बहाली की दिशा में काम कर सके। ऐसा संगठित, अनुशासित, स्थायी आन्दोलन हम खड़ा नहीं कर पाए।
भारत 28 राज्य और 9 केन्द्र शासित प्रदेशों वाला देश है। देश में 600 से अधिक आदिवासी जातियाँ हैं। हर राज्य में आदिवासियों की आबादी है। हम इन राज्यों के आदिवासियों को जोड़ने के लिए हमारे पास क्या कोई कार्य-योजना है, या कार्य-योजना बनाने की दिशा में क्या हम आगे बढ़ रहे हैं? भारत के आदिवासी कार्यकर्ता समूह को इस पर गौर करने की आवश्यकता है। सतत क्रिया रूप में आदिवासी आन्दोलन कितना सफल है और कितना भटकाव पर है इस पर भी गौर करने की आवश्यकता है।

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