राकेश जाधव:
लिखते-लिखते कोरे कागज ख़त्म हो गए थे, मैंने फ़टाफ़ट अपने ढीले कपड़े खूंटी पर लटकाए और झोला उठाकर पीठ पर लटका लिया और बाज़ार की तरफ चल पड़ा कोरे कागज़ खरीदने।
अक्सर मेरी आदत है, जब भी रास्ते पर चलता हूँ तो मन सवालों और विचारों से तर-बतर हो जाता है। और यह विचार-मंथन कभी बहुत गंभीर मुद्दों को लेकर होता है; तो कभी रास्ते के किनारे लगी किसी तस्वीर के ऊपर भी हो जाता है। खैर, आज भी दिमाग़ में ऐसा ही कुछ चल रहा था। क्योंकि शाम का समय हो चला था, सूरज अपनी आखरी किरणे धरती के हर कोने में बिखेर देने की कोशिश में था। मैं भी जल्दी में था, तो मैंने रणजीत चौक से होते हुए मेन गली वाला रास्ता चुना, जो सीधा बाज़ार में जाकर खुलता था। बस मैंने वो सीधा रास्ता लिया ही था कि मेरी नज़र में अजीब सा दृश्य छा गया, सामने चालीस-पैंतालीस साल का एक आदमी उस रास्ते पर आने-जाने वाले लोगों को रोक कर कुछ कह रहा था, मैंने बिना रुके ही अपनी आँखें छोटी कर अंदाज़ा लगाया, वो लोगों से कुछ मांग रहा था।
मन में तभी एक ख़्याल आया, इस रास्ते में अक्सर शराबी और चोर-लुटेरों का दबदबा रहता है। शायद ये भी ज़रूर कोई पागल या शराबी होगा जो लोगों को परेशान करने लग रहा है, या फ़िर कोई प्रचार-प्रसार वाली कंपनी से होगा जो फ़रोख़्त कर रहा है, मतलब वहीं बेफालतू की बातें। लेकिन पता नहीं क्यों? उसके पास पहुँचते ही मेरे कदमों की गति साधारण हो गई, उसकी नज़र मेरे ऊपर पड़ी। मैं बिना किसी प्रतिक्रिया के आगे चलते जा रहा था, अब वो मेरे बेहद नज़दीक आ चुका था। उसने अब मेरा रास्ता रोक लिया था।
अब मैं चाहकर भी उसके चंगुल से बच नहीं सकता था।
“सुनो बेटा!! …माफ़ करना आपको परेशान कर रहा हूँ। आप यहाँ से हो क्या??” उसने मेरे सामने खड़े होकर कहा।
मैं थोड़ा घबराया और हिचकिचाते हुए “हाँ!!” कहा और वहीं रुक गया।
उसने फ़िर अपना सवाल सही करते हुए पूछा “मेरा मतलब आप प्रॉपर मध्यप्रदेश से हो क्या?”
मैंने तवक्को नहीं की थी वो मुझसे ऐसा सवाल करेगा। आखिर ये भला किस प्रकार का सवाल था? साथ ही, मैं पूरी कोशिश में था कि मेरे मुँह से ऐसा कुछ न निकल जाए कि बाद में पछताना पड़े। लेकिन सच्चाई को भी तो नहीं झुठलाया जा सकता था; मैंने फिर से अपनी मुंडी हिलाकर हामी भरी।
फ़िर उसने अपना परिचय दिया, वह उत्तरप्रदेश का रहने वाला है और शहर में ‘संत मैरी स्कूल’ में किसी प्रोग्राम के प्रशिक्षण के सिलसिले से शहर आया हुआ था। लेकिन किसी गलतफहमी के चलते वो उस प्रशिक्षण के पांच दिन पहले ही शहर में आ चुका था। अब वो स्कूल में तो जा नहीं सकता था; तो उसने रुकने के लिए होटल का रुख किया लेकिन दुर्भाग्यवश उसी वक्त उसके साथ एक हादसा घट गया और उसका बैग, मोबाइल, पर्स और कुछ ज़रूरी चीजें किसी ने उठा ली थीं। अब मरता क्या नहीं करता, पिछले दो दिन से वो इधर-उधर रुक कर गुज़ारा कर रहा है। उसकी भाषा बहुत ही प्रभावशाली और शुद्ध व्याकरण वाली लग रही थी, साथ में अंग्रेज़ी के व्यावसायिक शब्दों का तालमेल बोली का वजन बढ़ा दे रहा था। कुछ शब्द और जुमले तो मेरे सर के ऊपर से गए, मैं बस उसकी बात सुनने का अभिनय करने लगा। उसकी बात न समझ पाने की एक वज़ह यह भी हो सकती है कि मैं अब उसकी भाषा से ज़्यादा भूषा (पहनावे) पर गौर करने लगा था।
उसने फ़िर आगे कहा: रास्ते में चलते-चलते कहीं पर चक्कर खाकर गिर गया था, हालांकि कोई ख़ास चोट तो नहीं आई लेकिन तबियत बिगड़ने लगी थी। जब वो जाँच के लिए सरकारी अस्पताल पहुंचा तो पता चला कि उसे दिल की बीमारी है।
सच कहूँ? अब मुझे लगने लगा था कि यह आदमी ज़रूर कोई डींग हाँक रहा है। और आख़िर में घूम फ़िर के इसकी कहानी पैसों के ऊपर आकर ही रुकेंगी, ऐसा मैंने पहले ही अनुमान लगा लिया।
उसने आगे कहा:
अब वो पानी तक पचा नहीं पा रहा है, उल्टी हो रही है। कल शाम से पेट में एक निवाला तक नहीं उतरा है। लेकिन फ़िलहाल उसकी समस्या भूख नहीं थी, डॉक्टर ने कहा है कि फौरी तौर पर मैनकाइंड की एक इंजेक्शन लगानी पड़ेगी। और ये इंजेक्शन चौबीस घंटे के अंदर नहीं लगाई तो बात हाथ से भी निकल सकती है। और इस इंजेक्शन की क़ीमत बयालीस रुपए थी।
लेकिन उसके पास उस वक्त एक चिंदी भी नहीं थी, और उसी बयालीस रुपए के लिए वो यहाँ लोगों का रास्ता रोक कर उनसे मदद माँग रहा था। फ़िर मैंने गौर किया, तो एहसास हुआ कि वाकई में उसकी हालत ख़राब थी। माथे पर पसीना था, नीरस चेहरा, आँखों के नीचे काले धब्बे। हाँ, वो पानी तक पचा नहीं पा रहा था! वो बीमार था। एक मेला सा काले रंग का स्वेटर पहना हुआ था, जो एक किसी छात्र ने दिया था। हाथ में एक थैली पकड़ रखी थी जिसमें उसकी कुछ चीजें रखी हुई थीं।
इतनी देर उसकी कहानी सुनने के बाद, उसने बड़ी ही उम्मीदों भरी नज़रों से मुझे देखा। लेकिन मुझे अभी भी उसकी कहानी पर यक़ीन नहीं आया, मेरे अंदर बड़ा द्वंद युद्ध चलने लगा। “क्या मदद कर दूँ? या फिर ये किसी तरह का फँसाना है?”
उसने मुझे चुप देख कर कहा, “अगर कैश नहीं है तो, मेडिकल तक मेरे साथ चलकर मुझे ये इंजेक्शन भी ख़रीद सकते हो।”
समय कम था मेरे पास, बाज़ार से कोरे कागज़ लेकर वापस जाकर लिखना भी था। मैं जब आगे पीछे हो रहा था तब उसने फ़िर से कहा, “अभी आप जितने दे सकते हो उतने दे दो, पूरे नहीं भी दोगे तब भी चलेगा।”
मैंने अब तक अपना आखिरी फैसला बना लिया था, कहा “मैं अभी किसी ज़रूरी काम से जा रहा हूँ और मेरे पास कैश नहीं है; न ही मेरा फोन पे चालू है।”
फ़िर उसने चेहरे पर मंद सी मुस्कान लाई, उस मुस्कान में निराशा भी शामिल थी। और मेरी तरफ़ देख कर कहा “कोई बात नहीं बेटा नहीं है तो क्या कर सकते हैं? तुम जानबुझकर थोड़ी ही नहीं दे रहे हों।” और उसका ये आखिरी वाक्य मेरे जेहन में घर कर गया।
उस वक्त तो मैं वहाँ से जैसे-तैसे बहाना मार कर आगे बढ़ गया।
मगर कुछ ही कदम चलने के बाद मैं गुम सा गया, इस बार के सवाल और विचार मुख्तलिफ थे। मेरा ध्यान भटकने लगा, मेरा ज़मीर मेरे ऊपर घृणा करने लगा। क्या मेरे लिए बयालीस रुपए इतने कीमती हो गए? हालांकि मैं इन रुपयों को स्टेशनरी खरीदने में खर्च करता मगर उनकी क़ीमत तब भी कम होती। क्या कोई केवल बयालीस रुपए के लिए इतनी मेहनत कर सकता है? बोल-चाल से तो काफ़ी शिक्षित और समझदार लग रहा था, वो भला क्यों झूठ बोलेगा? लेकिन फ़िर दूसरे लोग क्यों मदद के लिए आगे नहीं आ रहे थे? जबकि उनके पास तो अतिरिक्त पैसे भी होंगे! और बार-बार उसका पसीने और निराशा से तर चेहरा मेरी आँखों के सामने आ जाता हैं। अब मैं इस पीड़ा और उलझन से थक गया था, अब और इस द्वंद युद्ध में नहीं रहना चाहता था। आख़िर में, मेरे अंदर का वो भला आदमी जीत ही गया।
बुक स्टोर पहुँचते तक मैं उसी सवालों में उलझा रहा, फ़िर फ़टाफट कोरे कागज़ लेकर बैग में डाले, और बंटवे से पच्चास रुपए का एक नोट निकाल कर दूसरे जेब में रख लिया ताकि नोट निकालते हुए उसे बंटवा न दिख सके।
मेरे कदमों की गति पहले से भी तेज़ थी, मैंने आते समय भी वहीं रास्ता चुना। अचानक चलते-चलते मुझे धक्का लगा, ये एक एहसास था कि अगर वो आदमी मुझे दुबारा नहीं मिला तो? क्या मैं इस बोझ के साथ जी सकूंगा? भले ही वो झूठ बोल रहा है और मेरे बयालीस रुपए खा भी जाए, लेकिन कम से कम मुझे तसल्ली तो हो जाएगी।
जितना अधिक सोच रहा था मैं उतना ज़्यादा अपने आप को कोसने लगा। मेरी आँखें अब उसे किसी अपने की तरह ढूंढने लगी। मैं रास्ते भर में उसे ढूंढता आ रहा था, और एकदम से मेरी साँस रुक गई जब मैंने देखा कि वो आदमी अभी भी उसी जगह पर आते-जाते लोगों को रोक कर मदद मांग रहा था। क्या अभिमान और उत्तरजीविता की लड़ाई लड़ रहा होगा वो?
साथ ही मेरे अंदर एक बड़ी राहत आई, मैंने एक लंबी साँस भरी और उसकी तरफ़ बढ़ा। वो मुझे देखते ही पहचान गया, उसने फ़िर से चेहरे पर वही मंद सी मुस्कान लाई और मेरी तरफ़ देखा। इस बार उसकी मंद सी मुस्कान में एक उत्साह की अनुभूति भी नज़र आई, उसने आगे बढ़ कर मुझे एक बीस का नोट दिखाते हुए कहा “ट्वेंटी रूपीज़ हो गए! अब बस ट्वेंटी रूपीज और बाकी है।” उस वक्त मुझे अपनी बेवकूफियत के ऊपर बड़ी घिन आई, मैंने अपनी जेब से वो पच्चास का नोट निकाल कर उसको थमाया। थोड़ी देर तो वो मुझे देखता रहा फ़िर नोट पकड़ लिया और बदले में बीस रुपए का नोट वापस देते हुए
“थैंक यू बेटा जब मेरे पास पैसे आयेंगे तो मैं आपके ये पैसे लौटा दूंगा।”
मैंने नोट लेने से मना किया और कहा “रख लो काम आयेंगे।” मैं बस इतना ही कह सका।
वो थोड़ा हैरान हुआ और फ़िर मेरे बारे में पूछने लगा। कहने लगा
“अपना फोन नंबर दे दो मैं बाद में आपको लौटा दूंगा।”
“इसकी कोई ज़रूरत नहीं! ” मैंने कहा।
“आप यूपीएससी परीक्षा की तैयारी या फ़िर किसी कंपटीशन एग्जाम की तैयारी कर रहे हो?? मैं आपको बदले में फ्री में पढ़ा सकता हूँ। पूरा कोर्स करवा सकता हूँ।” वो उत्साह से कहने लगा।
“नहीं.. नहीं.. इसकी कोई ज़रूरत नहीं। आप बस टाइम से वो इंजेक्शन लगवा लेना और हो सके तो सरकारी अस्पताल में एडमिट भी हो जाना।” मैंने बड़ी विनम्रता से कहा।
“हाँ, लेकिन मैं आपको बदले में कुछ सीखा सकता हूँ जो तुम्हे काम आएगा।” उसने जिद्द की।
“नहीं.. मैं अभी तो केवल अपनी कॉलेज की पढ़ाई पर फोकस कर रहा हूँ।” मैंने कहा।
“तो फ़िर तुम लाइब्रेरी तो जाते होंगे?? कौनसी लाइब्रेरी जाते हो?” उसने पूछा।
मैं समझ गया था कि ये खुद्दार किस्म का आदमी है, ऐसे नहीं मानेगा। तो मेरे मुँह से गलती से निकल गया “झंडा चौक वाली लाइब्रेरी.. मैं वहीं जाता हूँ।” मैं हड़बड़ा गया था।
“कितने बजे जाते हो? ” उसने फ़िर पूछा।
“शाम में.. शाम के 6 बजे।” मैंने हवा में तीर चलाया।
“तो ठीक है फ़िर..! शाम को मिलते हैं।” उसने कहते हुए जेब में पैसे रख लिए।
और आगे हाथ बढ़ाकर आखिरी बार मेरा नाम पूछा और हाथ मिलाया। और एक आखरी बार कहा “थैंक यू.. मेरी मदद करने के लिए बेटा!” उसका ये आखिरी वाक्य था।
“कोई बात नहीं..!!” मेरा आखरी वाक्य।
और फ़िर मैं वापस अपने पुराने रास्ते पर आगे बढ़ गया। अंततः उन बयालीस रुपए की सही क़ीमत भी मिल गई।
परन्तु न ही उस शाम को मैं झंडा चौक की उस लाइब्रेरी में गया; जहाँ पर मिलने का मैं वायदा करके आया था। न ही मैं फ़िर कभी उस व्यक्ति से मिल पाया। मुझे तो यह भी पता नहीं है कि उस शाम वो लाइब्रेरी में आया भी था या नहीं? और कभी पता चल भी नहीं पाएगा। बस जाते-जाते मेरे अंदर अब एक तस्सली थी, एक अच्छी स्मृति थी। जिसे मैं कभी भुला नहीं पाऊंगा और इस संस्मरण को लिखने के बाद से तो मुमकिन भी नहीं है।

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