अलीशा फातिमा:

“फ़ैज़ाबाद, अवध की ऐतिहासिक राजधानी, नवाबी दौर की शानो-शौकत और गंगा-जमुनी तहज़ीब का अद्भुत संगम है। नवाब शुजाउद्दौला के समय में यहाँ भव्य इमारतें, बाग़-बगीचे और सरायें बनीं, जिनमें गुलाब बाड़ी और उनकी वालिदा बहू बेगम का मक़बरा विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं। सरयू नदी के घाट इस नगर की सांस्कृतिक और धार्मिक धड़कन रहे हैं, जहाँ नावों की हलचल और साधुओं का जमघट वातावरण को जीवंत बना देता था। फ़ैज़ाबाद के पुराने बाज़ार कश्मीरी शाल, इत्र और ज़रीकारी के लिए मशहूर थे, जिनमें दूर-दराज़ से व्यापारी आते थे। यहाँ बनने वाले चमड़े के जूते, जिन्हें नागरा कहा जाता है, फ़ैज़ाबाद की पहचान बन गए। नगर के नामों से पता चलता है कि यहाँ विभिन्न हिस्सों और बाहरी मुल्कों से लाकर अलग-अलग पेड़ों के बाग़ बनाए गए थे, जिनमें जामुनियाँ बाग़, लाल बाग़, नहर बाग़, कश्मीरी मोहल्ला आदि शामिल हैं।

ब्रिटिश शासन के दौरान फ़ैज़ाबाद सैन्य छावनी और 1857 के संग्राम का गवाह भी बना। यहाँ की जेल में अनेक क्रांतिकारियों को कैद और फाँसी दी गई, जिनमें शहीद अशफ़ाक़ उल्ला ख़ान भी शामिल थे। फ़ैज़ाबाद का इतिहास केवल स्थापत्य और व्यापार तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके सांस्कृतिक संगम और स्वतंत्रता संघर्ष की स्मृतियों में भी गहराई से दर्ज है। यहाँ मंदिर, मस्जिद, मजार, चर्च और गुरुद्वारे इसकी मिली-जुली संस्कृति को दर्शाते हैं।”

फ़ैज़ाबाद की बात हो और जुमेरात की बाज़ार का जिक्र न हो, यह अधूरा होगा। यह साप्ताहिक हाट बाज़ार शहर के लोगों के जीवन का अहम हिस्सा है, जिससे लगभग हर घर जुड़ा हुआ है। यह बाज़ार इतना समावेशी है कि यहाँ हर वर्ग, लिंग और धर्म के लोग दिखाई पड़ते हैं। कोई कुछ बेचने आया है, तो कोई कुछ खरीदने, और कोई सिर्फ बाज़ार में घूमने। यहाँ लोग जमीन पर, तखत पर, फोल्डिंग चारपाई पर, मेज पर, गाड़ी पर, साइकिल पर, बाइक पर और यहाँ तक कि हाथ या शरीर पर समान रखकर बेचते हैं। शाम होते-होते हर किसी को यहाँ से कुछ न कुछ कमाई हो जाती है, और लागत के नाम पर उनके खर्च बहुत कम होते हैं। यह बाज़ार लोगों को आवश्यक वस्तुएँ सस्ते दामों पर उपलब्ध कराने के साथ-साथ आजीविका का अवसर भी प्रदान करती है। इसे विभिन्न नामों से जाना जाता है, जैसे जुमेरात की बाज़ार, बृहस्पत की बाज़ार और गुलाब बाड़ी की बाज़ार। पहले यह बाज़ार चौक स्थित घंटाघर के आस-पास लगती थी, लेकिन वहाँ जाम और झगड़ों की समस्या के चलते इसे गुलाब बाड़ी मैदान में स्थानांतरित कर दिया गया।

इस गोल आकार के मैदान में सैकड़ों व्यापारी अपनी दुकानें लगाते हैं। लखनऊ, कानपुर, बाराबंकी, रुदौली और इलाहाबाद जैसे शहरों से भी व्यापारी यहाँ आते हैं। सस्ती दरों पर कपड़े, घरेलू सामग्री और रोज़मर्रा की चीज़ें यहाँ उपलब्ध रहती हैं। हालांकि, बरसात के दिनों में मैदान में पानी भर जाने से व्यापारियों और ग्राहकों को परेशानी का सामना करना पड़ता है और दुकानें सड़क पर लगानी पड़ती हैं, जिससे जाम की समस्या और बढ़ जाती है। यदि जल निकासी की व्यवस्था बेहतर हो और व्यापारियों को कुछ बुनियादी सुविधाएँ मिलें, तो यह बाज़ार और भी जीवंत और सुविधाजनक हो सकती है। त्योहारों के समय, जैसे होली, ईद, दिवाली और रक्षा बंधन पर, यहाँ हज़ारों की भीड़ उमड़ पड़ती है। आम लोगों को सस्ती दरों पर समान मिल जाता है, और रिक्शा, बैटरी रिक्शा, ऑटो चालकों की भी सप्ताह के एक दिन अच्छी कमाई हो जाती है। यह बाज़ार लोगों को अपनी जीविका चलाने और अपने उत्पादों को लोगों तक पहुँचाने का अवसर भी देता है।

बाज़ार में खरीदारी के साथ लोग कचौड़ी और फुल्की जैसी चटपटी चीज़ों का मज़ा भी लेते हैं। ठीक सामने स्थित स्टार बेकर्स, फ़ैज़ाबाद की मशहूर बेकरी, इस अनुभव को और खास बना देती है। लोग बाज़ार से निकलकर बेकरी में खाने-पीने का आनंद लेते हैं और फिर नवाब शुजाउद्दौला का मक़बरा और गुलाब बाड़ी घूमने जाते हैं।

बच्चों के साथ परिवारों के लिए यह सैर और भी यादगार बन जाती है। इस तरह, यह साप्ताहिक बाज़ार केवल खरीद-बिक्री की जगह ही नहीं, बल्कि फ़ैज़ाबाद की सांस्कृतिक और सामाजिक धड़कन भी है, जो लोगों को एक साथ लाती है और उनकी जिंदगी में रंग भरती है।

Author

  • अलीशा फातिमा फैज़ाबाद की रहने वाली एक युवा सामाजिक कार्यकर्ता हैं। वह वर्तमान में ग्रेजुएशन कर रही हैं और पिछले दो वर्षों से अवध पीपुल्स फोरम के साथ जुड़कर बच्चों और किशोरियों के नज़रिया निर्माण, जीवन कला कौशल और सशक्तिकरण पर काम कर रही हैं। वह उत्तर प्रदेश सामाजिक परिवर्तनशाला से भी जुड़ी हुई हैं। अलीशा का उद्देश्य समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाना और युवाओं को उनके अधिकारों और जिम्मेदारियों के प्रति जागरूक करना है।

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