दीपक रंजीत :
कैसे एक मृतप्राय आंदोलन को – “उत्तराखंड मेरी मातृभूमि, उत्तराखंड मेरी पितृभूमि” – गीत गाकर फिर से जगा दिया; पहाड़ों में आंदोलन का गीत गूंजने लगा।
उत्तराखंड राज्य आंदोलन के इतिहास में एक दौर ऐसा भी आया जब थकान, निराशा और दमन ने जन-ऊर्जा को जैसे सोख लिया था। ठीक इसी बीच गिरीश तिवारी ‘गिर्दा’ के गीत चौक-चौराहों, कक्षाओं, धरनों और जुलूसों में गूंजे – “उत्तराखंड मेरी मातृभूमि…”, “जैंता इक दिन त आलो”, “म्यार हिमाला” – और आंदोलन ने फिर से अपनी धड़कन पहचान ली। गिर्दा के ये गीत केवल संस्कृति नहीं थे; वे आत्मबल, एकता और राजनीतिक स्पष्टता के औज़ार बने।
1990 के दशक में पर्वतीय ज़िलों को लगता था कि बड़े उत्तर प्रदेश ढांचे में शिक्षा, स्वास्थ्य, रोज़गार, सड़क – सबमें संगठित उपेक्षा हो रही है। 1994 में मंडल आरक्षण का ढांचा पहाड़ के संदर्भ में असंगत माना गया (यहाँ OBC जनसंख्या बहुत कम आँकी जाती थी), जिससे असंतोष तीखा हुआ और राज्य की माँग उफान पर आई। उसी साल 2 अक्टूबर की रात मुरादनगर-मुज़फ्फरनगर (रामपुर तिराहा) में शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर पुलिस की गोलीबारी और दमन ने आंदोलन को निर्णायक मोड़ दिया – कई प्रदर्शनकारी मारे गए, और महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार/यौन हिंसा के आरोप दर्ज हुए। यह घटना चिंगारी पर घी सिद्ध हुई।
गिर्दा केवल कवि नहीं थे, बल्कि आंदोलन के सांस्कृतिक ध्वजवाहक बने। उन्होंने कुमाउनी-गढ़वाली और सरल हिंदी में ऐसे गीत रचे जिन्हें गाँव की चौपाल भी समझे और शहर का छात्र भी। ये गीत रैलियों में सामूहिक कोरस बनते, थके क़दमों में फिर जोश भरते। उनके गीत केवल प्रेरक नहीं, बल्कि राजनीतिक रूप से मार्गदर्शक भी थे – भ्रष्टाचार, संसाधनों की लूट, पलायन और स्त्री-श्रम के सवालों को केंद्र में रखते। आंदोलन सिर्फ प्रशासनिक पुनर्गठन नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और सांस्कृतिक स्वाभिमान की मुहिम बन गया।
“कोदा-झंगोरा खायेंगे, उत्तराखंड बनायेंगे” जैसे नारों के साथ जुलूस चल पड़ते – साधन कम सही, संकल्प प्रचंड। यह लोक-आर्थिक आत्मनिर्भरता का घोष था। जब पुलिसिया दमन ने डर बैठा दिया था, तो गिर्दा के सामूहिक गायन ने उस डर को तोड़ा। भीड़ ‘श्रौता’ से ‘भागीदार’ बनी। “मातृभूमि/पितृभूमि” जैसी रूपक भाषा ने संघर्ष को घर-आँगन का मसला बना दिया; राज्य की माँग अब दूर का विचार नहीं, अपनी ज़मीन-अपना भविष्य हो गया। छात्र, महिलाएँ, कर्मचारी, कृषक – सबके लिए गीतों में अपना दर्द और आकांक्षा झलकती थी। इसलिए अलग-अलग संगठनात्मक धाराएँ भी एक सांस्कृतिक मंच पर साथ आईं।
1994 से 2000 के बीच आंदोलन की आग ठंडी नहीं पड़ी। अंततः उप्र पुनर्गठन अधिनियम, 2000 पास हुआ और 9 नवम्बर 2000 को उत्तरांचल (अब उत्तराखंड) भारत का 27वाँ राज्य बना। यह यात्रा सड़क के जज्बे और संसद के निर्णय – दोनों की संयुक्त उपज थी, जिसमें सांस्कृतिक ऊर्जा लगातार ईंधन देती रही।
इस इतिहास को याद रखना ज़रूरी है। रामपुर तिराहा से जुड़े कई मुक़दमे आज भी अदालतों में लंबित हैं, जो न्याय की अधूरी यात्रा की याद दिलाते हैं। जिस सांस्कृतिक शक्ति ने राज्य दिलाया, वही आज भी लोकतांत्रिक जवाबदेही और स्थानीय नीति-निर्माण के लिए ज़रूरी है। गिर्दा के गीतों में निहित आदर्श – पलायन रोकना, संसाधनों पर स्थानीय हक़ और पर्यावरण-सम्बद्ध विकास – आज भी नीति की कसौटी बने हुए हैं।
लेकिन आज उत्तराखंड का यथार्थ यह है कि विकास के नाम पर चल रही योजनाएँ पहाड़ केंद्रित अर्थव्यवस्था की जगह बाहरी मॉडल पर टिक गईं। सड़कें, होटल, हाइड्रो प्रोजेक्ट और चारधाम जैसे निर्माण ने पहाड़ को आर्थिक रूप से मज़बूत करने के बजाय असंतुलन की तरफ़ धकेला। नतीजा यह हुआ कि आपदाएँ और त्रासदियाँ बार-बार सामने आने लगीं—बाढ़, भूस्खलन और ढांचागत दुर्घटनाएँ। यह वही स्थिति है जिसकी आशंका कवियों और बुद्धिजीवियों ने पहले ही जताई थी।
गिर्दा ने अपनी कविताओं में इस त्रासदी की आहट बहुत पहले दे दी थी – “महल-चौबारे बह जायेंगे, खाली रौखड़ रह जायेंगे… बोल व्यापारि तब क्या होगा?” इसी तरह उन्होंने चेताया था कि जब तक हम प्राकृतिक संसाधनों का दोहन करके नक़ली विकास की दौड़ में लगे रहेंगे, तब तक असली समृद्धि नहीं आएगी। उनके शब्द आज और भी ज्यादा प्रासंगिक हैं क्योंकि पहाड़ की असली ताक़त – उसकी ज़मीन, पानी, जंगल और लोग – को नज़रअंदाज़ करके बनाया गया कोई भी विकास मॉडल अंततः आपदा ही लाएगा।
गिर्दा की कविताएँ हमें बार-बार याद दिलाती हैं कि जिस संस्कृति और जनशक्ति ने राज्य दिलाया, वही भविष्य को सँभालने की भी चाबी है। जब राजनीतिक रणनीतियाँ थक जाती हैं, तो संस्कृति और कविता रास्ता दिखाती हैं। यही वजह है कि आज भी जब उत्तराखंड त्रासदियों से जूझता है, तो गिर्दा की आवाज़ गूंजती है – चेतावनी भी, मार्गदर्शन भी।

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