गुफरान :

यह पंक्तियाँ केवल एक गीत नहीं, बल्कि जीवन का दर्शन हैं। इन्हें लिखने वाले थे जनता के गीतकार शैलेन्द्र, जिनका जन्म 30 अगस्त 1923 को रावलपिंडी (अब पाकिस्तान) में हुआ था। साधारण परिवार से आए शैलेन्द्र का बचपन संघर्षों से भरा था, पिता रेलवे में कर्मचारी थे और यही साधारण जीवन उनके भीतर आम आदमी के दुःख-दर्द को समझने की संवेदना जगाता रहा। छात्र जीवन में वे स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े, जेल गए और बाद में IPTA (इंडियन पीपल्स थिएटर एसोसिएशन) से जुड़कर, सक्रिय हुए। इसी दौर में उनकी राजनीतिक चेतना और साहित्यिक संवेदना गढ़ी गई।

फ़िल्मी दुनिया में उनकी यात्रा 1949 से शुरू हुई, जब राज कपूर ने उन्हें बरसात के लिए गीत लिखने का अवसर दिया। इसके बाद तो उन्होंने हिंदी सिनेमा को ऐसे गीत दिए जो आज भी जनमानस में गूंजते हैं। आवारा हूँ, मेरा जूता है जापानी, सजन रे झूठ मत बोलो, किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार, ये गीत केवल मनोरंजन नहीं थे, बल्कि उस दौर के सामाजिक यथार्थ, संघर्ष और उम्मीदों की प्रतिध्वनि थे। शैलेन्द्र की सबसे बड़ी खूबी उनकी सरलता थी। उनके शब्द सीधे-सादे थे, पर उनमें गहरी संवेदना और जीवन का अनुभव छिपा रहता था। वे कहते थे कि सच्चा गीत वही है जिसे गली-मोहल्लों और खेत-खलिहानों में आम आदमी गा सके। यही कारण था कि उनकी रचनाएँ आज भी उतनी ही ताज़ा और प्रासंगिक लगती हैं।

राज कपूर, शंकर-जयकिशन और मुकेश के साथ उनकी जोड़ी ने हिंदी सिनेमा को अमर गीतों की सौगात दी। राज कपूर ने उन्हें मंच दिया, शंकर-जयकिशन ने उनकी पंक्तियों को सुरों से सजाया और मुकेश ने उन्हें अपनी आवाज़ से अमर कर दिया। यह आत्मीय रिश्ता ही था जिसने आवारा, श्री 420, बरसात और अनाड़ी जैसी फिल्मों को यादगार बना दिया।

किंतु शैलेन्द्र केवल गीतकार नहीं थे, वे समाजवादी विचारधारा और इंसानियत के कवि थे। उनके गीत हमेशा इंसान को संघर्षों के बीच उम्मीद और हौसला देते रहे “तू जिंदा है तो जिंदगी की जीत पर यकीन कर” यही जीवन-दृष्टि उन्हें अलग बनाती थी।

फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ की कहानी पर उन्होंने फ़िल्म तीसरी कसम बनाई, जो कलात्मक दृष्टि से तो मील का पत्थर थी, पर व्यावसायिक रूप से सफल न हो सकी। आर्थिक संकट और गहरे अवसाद ने इस महान कवि-गीतकार को असमय ही हमसे छीन लिया। 14 दिसंबर 1966 को मात्र 43 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया।

आज जब हम उनकी जयंती पर उन्हें याद करते हैं तो महसूस होता है कि शैलेन्द्र ने हमें गीतों के रूप में केवल धुनें नहीं दीं, बल्कि जीवन जीने का साहस भी दिया। उनके गीत इंसानियत, प्रेम और बराबरी का संदेश देते हैं। “होठों पे सच्चाई रहती है, जहाँ दिल में साफ़ाई रहती है…” जैसी पंक्तियाँ आज भी हमें याद दिलाती हैं कि इंसान की सबसे बड़ी पूँजी उसकी ईमानदारी और उसकी संवेदना है। शैलेन्द्र की यही अमर धरोहर हमें ज़िंदगी की जीत पर यक़ीन करना सिखाती है।

फीचर्ड फोटो आभार : अमर उजाला

Author

  • गुफरान, फैज़ाबाद उत्तर प्रदेश से हैं और सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़े हैं। वह अवध पीपुल्स फोरम के साथ जुड़कर युवाओं के साथ उनके हक़-अधिकारों, आकांक्षाओ, और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दों पर काम करते हैं।

    View all posts

One response to “किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार: शैलेन्द्र का गीतों में जीवन-दर्शन”

  1. Amit Avatar
    Amit

    बहुत अच्छा विषय चुना है लेख के लिए। इसके साथ यदि गाने सुनने के ऑडियो लिंक्स भी होते तो और मजा आता

Leave a Reply

Designed with WordPress

Discover more from युवानिया ~ YUVANIYA

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading