संजीव:
यह कहानी भोनपुरा पंचायत और उसमें बहने वाली शांत निर्मल नदी के आक्रामक अँधेरी दस्तक की है। ग्वालियर शहर से करीबन 58 किलोमीटर दूर भोनपुरा नाम की ग्राम-पंचायत जो तहसील गोहद, ज़िला भिंड, मध्य प्रदेश में स्थित है। एक दिन मैं और मेरे संगठन के सदस्य अरविन्द कुमार, हमें अपने मित्र गिर्राज सिंह तोमर जी के घर भोनपुरा ले गए। हमारा गाँव में जाने का मकसद गाँव की सुन्दरता, उसकी हरयाली और दूर-दूर तक लहराती फसलों की मीठी छवि को अपनी आँखों में भरना था।
हम गिर्राज जी से मिले और मुलाकात करने से जाना की इनका व्यवहार बहुत ही निर्मल और गाँव वालों के प्रति इनमें काफी आपसी प्रेम है। उन्होंने बताया की वो पेशे से शिक्षक और समाज सेवक हैं। उन्होंने अपने जीवन का एक बहुत बड़ा हिस्सा समाज सेवा में लगाया है और अभी भी जी-जान से समाज कल्याण के लिए बढ़-चढ़कर भाग ले रहे हैं। हमने उनसे एक स्नेह आग्रह किया की हमें आपका गाँव देखना है, तो वह अपना गाँव दिखाने के लिए तैयार हो गये। जब हम गाँव देखने के लिए गए तो जाना उनका गाँव बहुत ही खुशहाल और चारों तरफ की ठंडी हवा, चिड़ियों की किलकारी, सभी को मोहने वाली हरियाली और दूर-दूर तक खेतों में लहराती फसलें जो देखने में काफी ज़्यादा सुंदर लग रही थी। जैसे-जैसे हम आगे बढ़ें गाँव को करीब से जानने लगे। कुछ समय बाद हम गाँव के ठीक बीच में पहुँचे और देखा की गाँव में एक बहुत निर्मल सुंदर प्यारी सी नदी बहती है। नदी के किनारे पर कुछ गाय पानी पी रही थी और कुछ गाँव वालों की खेती नदी के किनारे पर थी। उसकी हरयाली और वहाँ से आने वाली ठंडी हवा, नदी के एक तरफ मैदानी क्षेत्र तो दूसरी तरफ बीहड़ (पठार), इस नदी की सुन्दरता में चार चाँद लगा रहे थे।
गिर्राज जी ने बताया इस नदी को – आसन नदी के नाम से जाना जाता है। वैसे तो यह नदी ईश्वरा महादेव मंदिर ग्राम – पहाडगढ़, ज़िला – मुरैना से निकलते हुए चंबल के बिहड़ में होते-होते एक बहुत सुंदर रास्ते का निर्माण करते भिंड ज़िले में स्थित गोहद तहसील के ग्राम हरीचा के पास बहेती कुंवारी नदी में मिली हुई है। एक समय पहले इस नदी के ऊपर मध्य प्रदेश में 2 बाँध, कुतवार तथा पगारा बाँध बने हुए थे। बीहड़, बाघी पान सिंह तोमर तथा फूलन देवी का आशियाना भी हुआ करता था और न जाने कितने बाघियों को इस बीहड़ ने आश्रय दिया। अब मुझे गाँव को जानने की उत्तेजना ओर बढ़ने लगी, ” हमने गिर्राज जी से गाँव के इतिहास बताने के लिए अनुरोध किया तो ना जाने क्यों गिर्राज जी कुछ पल के लिए शांत हो गये और नदी की ओर देखते हुए कुछ सोचने लगे, मुझे नहीं पता था की उनकी इस चुप्पी का राज़ इतना डरावना भी हो सकता था।” कुछ समय बाद गिर्राज जी ने मोन तोड़कर, बोला “संजीव तुम जो यह नदी देख रहे हो, यह हमारे गाँव के लिए इस साल मानसून में, बहुत बड़ी आपदा लेकर के आई थी। उस रात जब तूफान की आवाज़े हमारे घरों के दरवाज़ो पर दस्तक देने लगीं, तो हमें नहीं पता था कि यह एक ऐसी रात है जो हमें कभी नहीं भूलने देगी।”
गिर्राज जी की इन सब बातों को सुनकर मेरे मन में डर का माहौल बैठने लगा तथा उस रात की घटना को जानने की जिज्ञासा बढ़ने लगी कि आखिर उस रात हुआ क्या था? मन में सवाल था की यह प्यारी सी नदी किसी को क्या ही नुकसान पहुँचा सकती है। जल्द ही गिर्राज जी ने मेरे मन में उठ रहे सवालों का जवाब देते हुए बताया की “इस आसन नदी ने 32 साल पहले जो तबाही मचाई थी, उसे फिर इस साल दोहरा दिया है। इस मानसून में जब बारिश की पहली बुँदे गिरना शुरू हुई तब तक तो सब ठीक था। पर जब बारिश रुकना बंद नहीं हुई, तो नदी में लगातार पानी भरने लगा और खतरा सिर्फ यहीं नहीं रुका। हमें क्या पता था कि हमारी एक और मुसीबत गाँव से 20 किलोमीटर दूर से चल के आ रही है। सरकार द्वारा कोतवाल बाँध से पानी छोड़ा गया जिससे नदी में पानी का स्थर अपने खतरे के संकेत से ऊपर आ गया और पानी का बहाव लगातार तेज होता जा रहा था। ना जाने उस रात कितने लोगों को अपने घर – खेत को उसी स्थिति में छोड़ कर जाना पड़ा और ऐसी अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ रहा था। यह सिलसिला लगातर 3 दिनों तक चलता रहा। इन सब बातों को सुनकर मैं उस रात हुई घटना और उसमें पीड़ितों की स्थिति समझने की कोशिश कर रहा था। और जब हम गाँव के अन्दर गये और उन पीड़ितों से बात करने की कोशिश कि इसी दौरान हमारी मुलाकात – दसवीं कक्षा में पढ़ रहे विद्यार्थी रोहित कुमार से हुई, जो भोनपुरा पंचायत के ककरारी पुरा का रहेने वाला था। उससे हमनें इस साल नदी में आयी बाढ़ के बारे में पूछा तो उसने बड़ी ही उदासी भरी आवाज में बोला कि, “पानी लगातार भर रहा था। और हमारा गाँव ककरारी चारों तरफ से नदी से घिरा हुआ है। जब नदी में बाढ़ आयी तो गाँव से आने-जाने का रास्ता बंद हो गया। हमारा स्कूल भी हमारे गाँव से दूर, दूसरे गाँव में है, जिसके चलते हम दो-तीन महीने तक स्कूल नहीं गए। हमारी पढ़ाई का नुक्सान हुआ और हमारे खेत भी डूब गए। घर वालों की सारी मेहनत उस खेत में बर्बाद हो गई और मुझे अपनी पढ़ाई भी बंद करनी पड़ी। मैं जो कोचिंग जा रहा था, वह भी बंद करना पड़ा क्योंकि उस समय घर की हालत बहुत ज्यादा खराब थी। “
हम उसके दर्द को पूरी तरह समझ रहे थे, तभी गिर्राज जी हमें गाँव के निचले मैदानी क्षेत्र में ले-जाने को कहने लगे और बताया की इस नदी में सबसे ज्यादा नुकसान गाँव के नीचे हिस्से में रहेने वाले लोगों को पहुँचाया है। जैसे ही हम नदी के मैदानी क्षेत्र में उतरे वहाँ एक छोटा सा पुरा और कुछ लोग वहाँ रहते है। फिर हमारी मुलाकात – सोहनलाल सिंह और उनके परिवार से हुई। जब उनसे नदी में आयी बाढ़ के संबंध में बातचीत की तो वह बड़े भावुक हो गए। और रोते हुए स्वर में बोलने लगे कि यह जो आप घर देख रहे हो और जहाँ तक आपकी नज़र जा रही है 30 बीघा ज़मीन तक यह सब ज़मीन हमारी है। हमारे पूरे परिवार में 40 सदस्य हैं और हमारा घर गाँव के नीचे होने के कारण जब नदी में बाढ़ आई तो हमारी पूरी जमीन और घर में पानी भर गया। हमारे लिए वो रात किसी भयानक हादसे से कम नहीं थी। हमें रातों-रात अपने बच्चों और पशुओं को लेकर गाँव की ओर निकलना पड़ा। ऐसा भी लग रहा था भगवान हमें ना जाने किस अपराध की सजा दे रहा है। हमें ध्यान नहीं कि हमने उस रात क्या-क्या खोया, पूरा घर टूट गया, सारी फसलें खराब हो गई जो कि हमने कर्ज लेकर फसल की थी, हमारी भैंस भी इस नदी के बहाव में बह गई। हमारे खेत में एक कुआं है जहाँ पर हमारे तीन जनरेटर लगे थे, जो कुएं में पानी निकालने के लिए थे वह तीनों जनरेटर खराब हो गए। इन सारी समस्याओं से लड़ते हुए जब हम पुरा से बाहर निकले और गाँव की तरफ चले, जहाँ नदी का पानी नहीं पहुँच पाया। हम सरकारी स्कूल पहुँचे। हमारे पास उस समय कुछ खाने को नहीं था जिससे हम अपना और अपने परिवार का पेट भर सके। पर धन्यवाद है गाँव वालों का, जिन्होंने हमारी और अन्य परिवार की परिस्थितियों को समझते हुए अपने घरों से किसी न किसी प्रकार से सहयोग दिया। किसी ने अपने घर से गेंहू दिए, किसी ने मसाला, किसी ने चावल तो किसी ने दाल इत्यादि देकर हम सब तक सहायता पहुंचायी। जिससे कि हमें थोड़ी राहत मिली पर हम नदी द्वारा किये हुए नुकसान को नजरअंदाज भी नहीं कर पा रहे थे। हमें समझ नहीं आ रहा था कि हम इस स्थिति में करे तो करे क्या, अपने कर्म को फूटने के अलावा कर भी क्या सकते थे और ईश्वर से प्रार्थना कर रहे थे जल्द से जल्द सब ठीक हो जाये।”
यह सब सुनकर हमें बहुत दुःख हुआ, सोहनलाल सिंह तथा उनके परिवार को सहानुभूति देकर हम वहाँ से जाने लगे। जैसे ही हम उस छोटे से पुरा से बाहर निकले तो गिर्राज जी ने बताया की इस पुरा से और आगे जाने पर छोटा सा गाँव है, उस गाँव में जब बाढ़ आयी तब लोग वहाँ से निकल ही नही पाए थे। 1-2 दिन वहीं फंसे रहे फिर सरकार द्वारा राहत पहुंचाई गयी। आपदा प्रबंधन की टीम गयी उन्हें खाना दिया तथा उन्हें नाव के द्वारा निकाला गया और एक सुरक्षित जगह पर पहुँचाया गया। इन सब लोगों के लिए यह समय कैसे कट रहा होगा उसकी कल्पना करना बड़ा ही मुश्किल है।
अब हमारे मन में सवाल था, जब यह सब कुछ हुआ तो आखिर सरकार ने क्या किया ? अपने इन सवालों का जवाब ढूँढने के लिये हमने उस समय पंचायत में बाढ़ आयी तब के ग्राम सचिव और पटवारी से मुलाकात की और उनसे आयी इस प्राकृत आपदा के सम्बन्ध में जानकारी ली। और पूछा की आपने अपने स्तर पर लोगों को क्या राहत पहुंचाई। पटवारी बलवीर सिंह और सचिव महादेवी शर्मा जी ने बताया की हमनें लोगों के हुए नुकसान में राहत पहुँचाने के लिए ऊपर कार्यवाही की है। लेकिन, अभी तक कोई जवाब नहीं आया और ना ही राहत राशि मिली, सरकारी कार्यवाही है, चलती रहेगी यह सब कहकर उन्होंने अपनी बात को खत्म किया।
“हमें ग्राम वालों के ज़रिये पता चला की बाढ़ ने इस भोनपुरा पंचायत में ही लगभग 500 से 600 बीघा ज़मीन और उनके मेहनत मज़दूरी से की गयी फ़सल को तबाह कर दिया। और ना जाने कितने लोगों के सिर से घर का साया हट गया जो उन्होंने अपनी पूरी जीवन भर की मेहनत-मज़दूरी करके बनाया था। कितने लोगों को अपना किमती सामान को छोड़ना पड़ा, कितनों ने अपनी आमदनी का एक मात्र जरिया भेड़, बकरी, गाय, भैंस इत्यादि पशुओं को नदी के हवाले करके जाना पड़ा। और वह बच्चे जिन्होंने उस तबाही के मंजर को अपनी आँखों से देखा और उस घटी परिस्थिति को, क्या वे जीवन भर भूल पाएंगे यह घटना। उम्र भर डरावनी यादों के साथ उनके सपनों में बसी रह जाएँगी। नदी ने सिर्फ सोहनलाल सिंह या भोनपुरा गाँव को ही नहीं बल्कि इसके राह में आने वाले ज्यादातर सभी गाँव में नुकसान पहुँचाया है। अभी तक कोई गिनती ही नहीं की गयी कि कितने लोगों को क्या और किस प्रकार से इस मुसीबत का सामना करना पड़ा।
अब सवाल यह बन के रह गया कि आखिर इस घटना का जिम्मेदार कौन था ?
क्या वो सरकारी अधिकारी जिन्होंने बिना सोचे बाँध का पानी खोला या वो प्रशासनिक व्यवस्था जिन्होंने समय पर गाँव वालों को आने वाली मुसीबत से आगाह नहीं किया। या वो शासकीय प्रक्रिया जिसने गाँव वालो के नुकसान को नजरअंदाज़ करके उन्हें राहत नहीं पहुँचा पायी तथा उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया। और ना जाने ऐसी कितनी खामियाँ है जिनके चलते इस होने वाले नुकसान से बचा जा सकता था तथा हम यह कह सकते हैं कि यह सब एक सरकार की बहुत बड़ी नाकामयाबी है। आज देश के 78 साल आज़ाद होने के बाद भी लोगों को ऐसी समस्या का सामना करना पड़ रहा है, हमारे लिए एक शर्मिंदगी की बात है।

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