सत्यम श्रीवास्तव :
हाल ही में कन्नड़ लेखिका बानु मुश्ताक ने अपने कहानी संग्रह Heart Lamp के लिए 2025 का प्रतिष्ठित इंटरनेशनल बुकर प्राइज़ जीता है। यह पुरस्कार अंग्रेज़ी में अनूदित विश्व साहित्य की उत्कृष्ट कृतियों को प्रदान किया जाता है, और इस बार यह सम्मान पहली बार किसी कन्नड़ भाषा की रचना को मिला है। महत्वपूर्ण बात यह भी है कि इस बार पहली दफा यह पुरस्कार किसी कहानी संग्रह को मिला है। इस संग्रह का अंग्रेज़ी अनुवाद दीपा भास्ती ने किया है, जो इस पुरस्कार को जीतने वाली पहली भारतीय अनुवादक बनी हैं।
बुकर प्राइज़ (Booker Prize) विश्व साहित्य के सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कारों में से एक है, जो हर वर्ष अंग्रेज़ी भाषा में लिखे गए सर्वश्रेष्ठ मौलिक उपन्यास को प्रदान किया जाता है। इसकी शुरुआत 1969 में हुई थी। बाद में इसे अंग्रेज़ी भाषा में अनुवादित हुई कृतियों के लिए भी दिया जाने लगा।
बानु मुश्ताक कर्नाटक की एक अनुभवी वकील, सामाजिक कार्यकर्ता और लेखिका हैं, जिनकी कहानियाँ दक्षिण भारत के मुस्लिम समुदायों की महिलाओं के जीवन, संघर्ष और सामाजिक अन्याय पर केंद्रित हैं। बानू मुश्ताक, 1970 के दशक में शुरू हुए ‘बंदाया साहित्य आंदोलन’ (Bandaya Sahitya Movement) से जुड़ी रही हैं। यह आंदोलन कर्नाटक में सामाजिक और आर्थिक अन्याय के खिलाफ़ साहित्य के माध्यम से विरोध का मंच था, जिसमें दलितों, किसानों, महिलाओं और अन्य हाशिए पर पड़े समुदायों की आवाज़ को प्रमुखता दी गई। बानू मुश्ताक इस आंदोलन की कुछ चुनिंदा मुस्लिम महिला लेखकों में से एक थीं, जिन्होंने पितृसत्ता, धार्मिक कट्टरता और सामाजिक असमानताओं के खिलाफ़ अपनी लेखनी के माध्यम से संघर्ष किया।
उन्होंने ‘लंकेश पत्रिके’ (जिसका सम्पादन गौरी लंकेश थीं और जिन्हें दक्षिणपंथी कट्टरपंथियों ने 2017 में कत्ल किया था) जैसे प्रगतिशील समाचार पत्रों में पत्रकारिता की और बाद में वकालत के क्षेत्र में भी सक्रिय रहीं। साथ ही, उन्होंने मुस्लिम महिलाओं के मस्जिदों में नमाज़ पढ़ने के अधिकार के लिए आवाज़ उठाई, जिसके चलते उन्हें 2000 में सामाजिक बहिष्कार और जानलेवा हमलों का सामना करना पड़ा। बानू मुश्ताक की लेखनी और सामाजिक सक्रियता ने उन्हें कर्नाटक में सामाजिक न्याय और महिला अधिकारों की एक सशक्त प्रतीक बना दिया है।
क्या खास है बानू मुशताक की ‘बुकर’ कहानियों में?
बानू मुश्ताक की कहानियों में भारतीय मुस्लिम समाज की वास्तविकताओं, उनकी परेशानियों और चिंताओं का यथार्थ चित्रण है। उनकी कहानियों में निहित नारीवादी चेतना, सांस्कृतिक पहचान, धार्मिक संदर्भों और सामाजिक संघर्षों के प्रति संवेदनशीलता है जो उन्हें अपने से पहले की मुस्लिम लेखिकाओं मसलन, इस्मत चुगताई, रशीदा जाहान, कुर्रतुलऐन हैदर और समकालीन लेखिकाएँ राना अय्यूब, रुखसाना तबस्सुम और शबनम आदि की रचना परंपरा को आगे बढ़ाते हुए दिखलाई देता है।
बानू मुश्ताक की कहानियों में कर्नाटक के मुस्लिम समुदाय की महिलाओं के दैनिक जीवन, उनकी चुनौतियों और उनके प्रतिरोध केंद्र में देखा जा सकता है। इस्मत चुगताई ने अपनी कहानियों में पितृसत्ता और धार्मिक रूढ़ियों पर तीखा प्रहार किया था। मुश्ताक की कहानियाँ भी इसी तरह की नारीवादी चेतना को दर्शाती हैं, जो सामाजिक और धार्मिक अपेक्षाओं के बीच मुस्लिम महिलाओं की पहचान की खोज को उजागर करती हैं।
भारतीय मुस्लिम लेखिकाओं के लिए इस पुरस्कार का एक अलग महत्व है क्योंकि इसके जरिये उनकी चिंताओं और उस पर रचे साहित्य में उनकी उपस्थिति को और मजबूत करता है। ‘हार्ट लैंप’ की कहानियाँ, जो हास्य और मार्मिकता के साथ लिखी गई हैं, मुस्लिम महिलाओं को केवल पीड़ित के रूप में नहीं, बल्कि बुद्धिमान, साहसी और सामाजिक परिवर्तन की वाहक के रूप में प्रस्तुत करती हैं।
मुश्ताक की कहानियों में कन्नड़, उर्दू और अरबी शब्दों का सहज मिश्रण उनकी भाषाई समृद्धि का प्रतीक है। यह दृष्टिकोण लेखिकाओं जैसे कुर्रतुलऐन हैदर (आग का दरिया) और रुखसाना तबस्सुम (नक्काशी) में भी देखा जाता है, जो उर्दू और क्षेत्रीय भाषाओं के मिश्रण से अपनी रचनाओं को प्रामाणिकता प्रदान करती हैं।
मुश्ताक की कहानियाँ पितृसत्ता, धार्मिक कट्टरता और सामाजिक भेदभाव पर तीखी टिप्पणी करती हैं। यह भारतीय मुस्लिम लेखिकाओं की उस परंपरा का हिस्सा है, जो सामाजिक सुधार और जागरूकता को साहित्य का लक्ष्य मानती है। उदाहरण के लिए, रशीदा जाहान ने अपनी कहानियों में मुस्लिम महिलाओं पर थोपी गई नैतिकता और सामाजिक बंधनों की आलोचना की थी। मुश्ताक की कहानियों में भी दकियानूसी मौलवियों और रूढ़िगत सामाजिक नियमों पर हास्य और व्यंग्य के साथ प्रहार किया गया है। भारतीय मुस्लिम लेखिकाएँ इसे एक सशक्त प्रयास मानती हैं, जो मुस्लिम महिलाओं को धार्मिक और सामाजिक दबावों से मुक्ति की दिशा में प्रेरित करता है।
हार्ट लैंप को 2025 का अंतरराष्ट्रीय बुकर पुरस्कार मिलना भारतीय मुस्लिम लेखिकाओं के लिए गर्व का क्षण है। यह पुरस्कार कन्नड़ साहित्य और भारतीय क्षेत्रीय भाषाओं को वैश्विक पहचान दिलाता है। लेखिकाएँ इसे न केवल मुश्ताक की व्यक्तिगत उपलब्धि, बल्कि भारतीय मुस्लिम महिलाओं के साहित्यिक योगदान की जीत के रूप में देखती हैं। यह उपलब्धि समकालीन लेखिकाओं को प्रोत्साहित करती है कि वे अपनी कहानियों को बिना संकोच के विश्व मंच पर प्रस्तुत करें। साथ ही, यह अनुवाद की भूमिका को रेखांकित करता है, जो क्षेत्रीय साहित्य को वैश्विक बनाने में महत्वपूर्ण है।
बानू मुश्ताक ने 20 मई 2025 को लंदन के टेट मॉडर्न में आयोजित इंटरनेशनल बुकर प्राइज़ समारोह में पुरस्कार लेते हुए अपने भाषण में ‘स्थानीय’ की महत्ता और उन चीज़ों की विशालता पर प्रकाश डाला जिन्हें हम अक्सर ‘छोटा’ कहकर नज़रअंदाज़ कर देते हैं।
उन्होंने कहा, “हर कहानी एक ब्रह्मांड है।” यह वाक्य उनके भाषण का केंद्रीय संदेश था, जिसमें उन्होंने यह स्पष्ट किया कि प्रत्येक व्यक्ति की कहानी महत्वपूर्ण है और उसे सुना जाना चाहिए।
बानू मुश्ताक ने अपने भाषण में उन महिलाओं का उल्लेख किया जो उनके पास न्याय की तलाश में आती थीं। उन्होंने कहा कि इन महिलाओं की पीड़ा और संघर्ष ने उन्हें लिखने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने यह भी बताया कि कुछ महिलाएं यह नहीं समझ पाती थीं कि वे क्यों पीड़ित हैं, और यह अज्ञानता उन्हें और अधिक पीड़ा देती थी।
उन्होंने अपने भाषण में यह भी कहा कि यह पुरस्कार केवल उनके लिए नहीं है, बल्कि उन सभी महिलाओं के लिए है जिनकी कहानियाँ अक्सर अनसुनी रह जाती हैं। यह पुरस्कार उन आवाज़ों को मान्यता देता है जो समाज में हाशिए पर हैं।

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