विकास कुमार:

प्रसिद्ध खगोल वैज्ञानिक डॉ. जयंत विष्णु नार्लीकर का 20 मई 2025 को पुणे स्थित उनके निवास पर 86 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उनका निधन न केवल भारतीय विज्ञान जगत के लिए, बल्कि जन विज्ञान आंदोलन के लिए भी एक बड़ी क्षति है। विज्ञान को आमजन के लिए सरल और रोचक बनाकर प्रस्तुत करना एक कठिन कार्य माना जाता है, लेकिन डॉ. नार्लीकर ने यह कार्य दशकों तक अत्यंत प्रतिबद्धता के साथ किया। समाज के हर वर्ग में वैज्ञानिक चेतना और तर्कशील सोच के प्रसार में उनके योगदान को कभी भुलाया नहीं जाएगा।

प्रारंभिक जीवन और शिक्षा

डॉ. नार्लीकर का जन्म 19 जुलाई 1938 को कोल्हापुर, महाराष्ट्र में हुआ था। उनके पिता एक गणितज्ञ थे और माँ संस्कृत की विद्वान। उन्होंने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से गणित में स्नातक की डिग्री प्राप्त की और इसके बाद ब्रिटेन के विख्यात कैंब्रिज विश्वविद्यालय से खगोलविज्ञान और खगोलभौतिकी का गहन अध्ययन किया।

‘बिग बैंग’ को दी चुनौती

कैंब्रिज में उन्होंने प्रसिद्ध खगोल वैज्ञानिक सर फ्रेड हॉयल के साथ शोध कार्य किया और दोनों ने मिलकर हॉयल–नार्लीकर गुरुत्व सिद्धांत विकसित किया। यह सिद्धांत आइंस्टीन के सामान्य सापेक्षता सिद्धांत (Theory of Relativity) का एक वैकल्पिक मॉडल था, जो यह समझाने का प्रयास करता था कि यूनिवर्स में नया पदार्थ निरंतर कैसे बनता है।

आज “बिग बैंग थ्योरी” को यूनिवर्स की उत्पत्ति की प्रमुख व्याख्या के रूप में माना जाता है, जिसके अनुसार यूनिवर्स की शुरुआत लगभग 13.8 अरब वर्ष पहले एक अत्यधिक सघन बिंदु से हुई थी। परंतु नार्लीकर और हॉयल ने इस सिद्धांत को चुनौती दी और यह प्रस्तावित किया कि यूनिवर्स सदा से अस्तित्व में है और अनंत तक विस्तार करता रहता है।

डॉ. नार्लीकर ने गुरुत्वाकर्षण, समय और स्पेस-टाइम की प्रकृति को समझने में भी कई गणितीय योगदान दिए। वे 1994 से 1997 तक अंतर्राष्ट्रीय खगोल संघ की कॉस्मोलॉजी आयोग के अध्यक्ष भी रहे।

भारत में विज्ञान संचार को लोकप्रिय करने में बड़ी भूमिका

भारत लौटने के बाद, नार्लीकर ने टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च (TIFR) में प्रोफेसर के रूप में कार्य किया। बाद में, वर्ष 1988 में, उन्होंने इंटर-यूनिवर्सिटी सेंटर फॉर एस्ट्रोनॉमी एंड एस्ट्रोफिजिक्स (IUCAA) की स्थापना की, जो आज खगोलशास्त्र और खगोल भौतिकी के क्षेत्र में भारत का अग्रणी संस्थान है।

IUCAA ने विज्ञान संचार को लोकप्रिय बनाने के लिए कई प्रयास किए, जिनमें साइंस कैंप, मासिक व्याख्यान, और कार्यशालाएँ प्रमुख हैं। डॉ. नारळीकर 2003 में सेवानिवृत्त हुए, लेकिन वह IUCAA से एमेरिटस प्रोफेसर के रूप में जुड़े रहे।

विज्ञान साहित्य में भी महत्वपूर्ण योगदान

डॉ. नार्लीकर ने विज्ञान के जटिल विषयों को लोकप्रिय रूप में प्रस्तुत करने के लिए मराठी और अंग्रेज़ी में कई विज्ञान कथाएँ और पुस्तकें लिखीं। उनकी रचनाओं में गुरुत्वाकर्षण, यूनिवर्स की उत्पत्ति, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, अंतरिक्ष यात्रा, और समय की प्रकृति जैसे विषयों को कल्पना, नैतिकता और सामाजिक चेतना के साथ जोड़ा गया।

उनकी चर्चित पुस्तकों में “टाइम मशीन ची किमया”, “प्रेषित”, “यक्षांची देणगी”, “अभयारण्य”, और “Virus” शामिल हैं। “A Tale of Four Cities” को 2014 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

देश-विदेश में कई प्रतिष्ठित सम्मान मिले

नार्लीकर को 1965 में मात्र 26 वर्ष की उम्र में पद्मभूषण से सम्मानित किया गया। 2004 में उन्हें पद्मविभूषण से भी नवाज़ा गया। वर्ष 2011 में महाराष्ट्र सरकार ने उन्हें राज्य के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘महाराष्ट्र भूषण’ से सम्मानित किया। 2014 में भारत की प्रमुख साहित्यिक संस्था, साहित्य अकादमी ने उनकी आत्मकथा को मराठी भाषा लेखन में सर्वोच्च पुरस्कार के लिए चुना। भारत के अलावा उन्हें कई अंतरराष्ट्रीय सम्मान भी मिले हैं। उन्हें 1967 में कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय का एडम्स पुरस्कार मिला। वे रॉयल एस्ट्रोनॉमिकल सोसायटी (UK) और थर्ड वर्ल्ड एकेडमी ऑफ साइंसेज़ के फेलो रहे हैं। विज्ञान को लोकप्रिय बनाने के उनके योगदान के लिए उन्हें 1996 में यूनेस्को का कलिंगा पुरस्कार भी मिला।

फीचर्ड फोटो आभार : विकिमीडिया कॉमन ; फ़्यूचूरा साइंस

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  • विकास युवा विचारक, स्वतंत्र पत्रकार एवं प्रगतिशील सिनेमा आंदोलन से जुड़े हैं, झारखंड के निवासी,हैं और फिलहाल विशाखापटनम में रहते है।

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