महिपाल मोहन :

उत्तराखंड के वन गुज्जर का इतिहास– आज अगर हम मनुष्य के इतिहास में जाकर देखते हैं तो हमें तीन तरह के जीवन, मनुष्य के शुरुआती दौर में दिखाई देते हैं।

  1. शिकारी मानव,
  2. पशुपालक,
  3. खेती करने वाला।

इसमें से पहला यानि शिकारी मानव का इतिहास अभी के समय खत्म हो चुका है। रहे दो तरह के – खेतिहर और पशुपालक, देश और दुनिया में खेती स्थाई जीवन की शुरुवात ही संग्रह और ज़रूरतों के बढ़ने से हुई। मनुष्य जैसे-जैसे एकल से सामूहिक और फिर कबीलाई होने लगा उसकी ज़रूरतों का दायरा भी बढ़ने लगा। लेकिन वहीं पशुपालक समाज अपना घुमंतू जीवन लगातार जीता रहा। क्योंकि पशुओं के लिए चारे की ज़रूरत से लागातार अस्थायी जीवन जीने को मजबूर रहा। जिसमें मौसम, चारे की उपलब्धता और पानी की खोज के चलते, मौसम अनुसार सर्दियों में तराई और गर्मियों में पहाड़ों पर आवाजाही जारी रही। इन समुदायों का उल्लेख आपको आज़ादी से पहले के अंग्रेज़ी हुकूमत के दस्तावेजों में भी पढ़ने को मिलेगा।

वन गुज्जर का इतिहास – कई लोगों का मानना है कि वन गुज्जर कश्मीर से हिमाचल एक दहेज के रूप में आए थे। सुनी सुनाई बात है की कश्मीर के राजा की लड़की की शादी हिमाचल के राजा के लड़के से हुई, शादी में दहेज के तौर पर ये हिमाचल आए। शुरुआत से ही घुमंतू जीवन के चलते यह समुदाय गर्मियों के मौसम में हिमाचल की पहाड़ियों पर और सर्दी के मौसम में उत्तर प्रदेश और अभी के उत्तराखंड के मैदानों में आवाजाही करने लगा। यह सिलसिला लगातार जारी रहा लेकिन अंग्रेज़ों के समय देश  में जब वन विभाग बना तो उसके बाद देश के भीतर कई पार्क और सेंचुरी बनने लगी। इसके कारण इन घुमन्तू परिवारों को कई मार्ग बदलने पड़े, लेकिन फिर भी इस समुदाय का घुमन्तू जीवन जारी था। जब देश आज़ाद हुआ तो धीरे-धीरे इनके यायावरी के परमिट खत्म होने लगे। धीरे-धीरे देश के भीतर घोषित हो रहे पार्क व टाइगर रिजर्व, कोर जोन और बफर जोन बनते गए, जिसके बाद इनके यायावरी के मार्ग बंद होने लगे। आज के समय गड़वाल क्षेत्र के वन गुज्जर समुदाय के लोगों को छोड़कर, अधिकतर वन गुज्जर स्थायी जीवन व्यतित करने लगे हैं। 

वन गुज्जर समुदाय की दिनचर्या- सुबह 4:00 बजे से लेकर 7- 8 बजे तक पूरा समय जानवरों की देख-रेख व काम निपटाना, उसके बाद दूध को बाज़ार में जाकर बेचने के बाद वे अपना आराम करते हैं। दोपहर का खाना खाकर, शाम के समय में फिर जानवरों के काम में लग जाते हैं। इस समाज में महिलाओं के साथ-साथ परिवार के सभी लोग – युवक-युवतियां, मिलकर काम करते हैं। खासकर रात्रि में चराई के लिए भैसों को जंगल लेकर जाना युवा लड़कों का रोज का काम है।

आज भी वन गुज्जर समुदाय अपने पशुपालन व्यवस्था से जुड़े हैं और साथ ही कूछ जगहों पर खेती भी कर रहे हैं। अन्य जो जंगलों के भीतर रह रहे हैं, कुछ एक कुमाऊँ के क्षेत्र को छोड़ दिया जाए तो अधिकतर लोग पशुपालन पर ही निर्भर हैं। मज़ेदार और हैरान करने वाली बात यह है कि जंगलों के भीतर रहते हुए भी इनके घर आज भी बिना दरवाज़ों के देखने को मिलेंगे। सभी के घर बनाने के तरीके आज भी वही हैं, जिसमें स्थानीय मिट्टी, लकड़ी और ऊपर से घास की छत बनाई जाती है। 

खानपान- चोपड़ रोटी, (घी लगी रोटी) और चटनी इनका सुबह का नाश्ता है जिसमें लस्सी (छाछ) और मक्खन हर समय खाने को मिलेगा। इन समुदायों में शादी और अन्य खुशीयों के मौकों पर घी बुरा (चीनी को पीस कर) ज़रूर बनाया जाता है। बाकी समय रोटी, कुछ सब्ज़ी इनके भोजन का हिस्सा है। मांस, मछ्ली, अंडा इनके भोजन में कहीं भी दूर-दूर तक देखने को भी नहीं मिलेगा। दूध, दही, लस्सी और घी की कभी भी कमी नहीं रही जिसके कारण काफी भरपूर मात्रा में प्रोटीन मिलता रहता है। साथ ही इस समुदाय में आज भी आपको कुपोषण जैसी समस्या देखने को नहीं मिलेगा। जहाँ एक ओर भारत में आज भी कई राज्यों में कुपोषण जैसी बीमारी मौजूद है, इसके विपरीत इन समुदायों के बच्चे रिष्ठ-पुष्ट मिलेंगे। अजीब सी विडंबना है, एक ओर जहाँ इस समुदाय के पास दूध, दही, छाछ, मक्खन, रोटी भरपूर है, लेकिन एक समय ऐसा भी था जब इनका बाहरी समाज से कोई भी जुड़ाव नहीं था। उस दौर में लोग दूध की ही रोटी और पनीर बनाकर के सब्ज़ी के रूप में खाते थे। समय के साथ, बाहरी समाज से रोटियां बनाकर खाना भी सीख गए। यह समुदाय भैंस, गाय के साथ-साथ घोड़े भी रखते हैं, जो यायावरी के समय इनके सामान ढ़ोने के काम आते थे, तब मैदान से ऊंचे पहाड़ों पर जाना और पहाड़ों से मैदानों पर आना, जीवन का चक्र बना हुआ था।  

शिक्षा, स्वास्थय शुरुआती दौर से ही घुमंतू जीवन जीने से आज भी इस समुदाय में शिक्षा का अभाव है, वह इसलिए भी है की आज भी शिक्षा एक स्थाई व्यस्व्था रही है। शिक्षा की इनके जीवन-यापन के लिए शुरू से ही कोई उपियोगिता महसूस नहीं रही है। खासकर भारतीय शिक्षा व्यवस्था आज भी बाज़ार और नौकरी व्यवस्था के लिए ही बनी हुई है। इन्हीं कारणों से यह समुदाय शिक्षा में नहीं जा पाया। आज उसका एक सबसे बड़ा खामियाजा देखने को मिलने लगा है। शिक्षा की कमी के कारण पिछले कई सालों से स्थानीय बनियों की लूट का शिकार होते आए हैं। कई इस तरीके के मामले आज भी आपको देखने को मिलेंगे। पूरे साल भर बनियों को दूध बेचते हैं लेकिन उसके बाद भी उस बनिए के कर्ज़दार बने रहते हैं। लेकिन कुछ परिवार जो बाहरी, शहरी दुनिया से जुड़े हैं जिनमें कुछ शिक्षा आ चुकी है। उनका जीवन अन्य वन गुज्जरों का जीवन काफी अंतर आ चुका है। साथ ही खानपान, दिनचर्या में खेती जिसे स्थायी जीवन का आधार माना जाता है वो जुड़ने लगा है। स्वास्थ्य के मामले में देखा जाये तो खासकर महिलाओं को गर्भवस्था के कारण तकलीफ़ों का सामना करना पड़ता है। जंगलों के भीतर रहने के कारण इन्हें सबसे अधिक दिक्कतों का सामना करना पड़ता है, क्योंकि इन जगहों पर सड़क नहीं होने से गाड़ी या एंबुलेंस नहीं पहुँच पाती है। कई आरक्षित वन क्षेत्र होने के कारण भी वन विभाग के द्वारा रात को गेट बंद कर दिये जाते हैं, जिसके कारण कई बार इस तरह की स्थिति में बाहर नहीं निकल सकते हैं। 

शादी- दहेज प्रथा को समाज में कलंक के तौर पर देखा जाता है, उत्तराखंड में वन गुज्जर समुदाय में लड़के वाले लड़की को मेहर के रूप में एक भैंस देते हैं, जब शादी होती है।  उस दिन लड़की वाले पक्ष से सभी परिवार के लोग एक-एक भैंस देते हैं  जिसमें कई बार समुदाय के अन्य लोग भी इस रस्म में भेंट स्वरूप भैंस देने का चलन है। कालागढ़ टाईगर रिजर्व के जंगलों और राजाजी नेशनल पार्क से लगे इलाकों में सदियों से निवास करने वाले वन गुज्जरों में वर पक्ष से दहेज लेने की परंपरा है।  कालागढ़ में रहने वाले वन गुज्जरों का कहना है कि उनके परिवार में बेटियों के पैदा होने पर खुशी भी मनाते हैं और भोज भी देते हैं, इसलिए उन्हें भार तो कतई नहीं समझा जाता। बेटियों को पशुधन की अच्छी देखभाल करने और परिवार को एकजुट होकर बांधने में वन गुज्जर महिलाओं का कोई सानी (मुकाबला) नहीं है। क्योंकि जगंलों में कईं दिनों तक बिना परिवार के मुखिया के भी, महिलाएं अपने परिवार की अच्छी तरह से देखभाल करती हैं। हालांकि दहेज प्रथा को मौजूदा दौर में घृणा की नज़र से देखते हैं और उल्लंघन करने पर सजा का भी प्रावधान है, लेकिन वन गुज्जरों के साथ ऐसा नहीं है। इसके अलावा इस समुदाय में विवाह करने के लिए लड़की के बदले लड़की देने का भी रिवाज है। 

कुछ समय पहले मेरी मुलाकात मुन्नी जी से हुई। मुन्नी जी बताती हैं कि भारत की आज़ादी के समय वह लगभग 10 वर्ष की थीं। उनको आज भी याद है उस समय देश आज़ादी का जश्न मना रहा था। उसी समय वो लोग अपने जानवरों के साथ पहाड़ों से मैदानों की ओर वापस आ रहे थे। उस समय देश में कई जगह दंगे हो रहे थे, तो टिहरी के एक राजा ने उन लोगों से कहा कि आप लोग इस समय यहीं रुक जाइए, आगे मैदानों की ओर ना जाएँ। उन्होंने उनके गाय और भैंसों के खाने के लिए घास की व्यवस्था की और चराने के लिए मैदान की व्यवस्था भी कराई। कुछ समय बाद जब नीचे मैदानों में शांति हुई तो सुरक्षित नीचे मैदानों की ओर भेजा। लेकिन जब ये सभी लोग शिमला हिमाचल की पहाड़ियों पर से नीचे की ओर आ रहे थे, तभी अचानक ही नीचे तराई क्षेत्रों में और शिमला क्षेत्र में दंगे की खबर फैलने लगी। ये सभी 30 से 35 लोग अपने-अपने परिवार और जानवरों के साथ आ रहे थे, सभी वन गुज्जर लोग अपने-अपने जानवरों को छोड़कर के जान बचाकर भागे। उन्हें वह वाख्या आज भी हुबहू याद है, जब वो भी अपने परिवार के लोगों के साथ में माँ-बापू, भाई, और बहन साथ में थे। कुछ लोग तलवारे लेकर आए और उनके भाई को मार दिया जिससे उसकी मौत हो गई और उनकी बहन और माँ की गर्दन पर भी तलवारे लगी और कुछ लोग जान बचाने के लिए गिरी नदी में कूद पड़े। इन लोगों को मरा हुआ समझकर बाकी बचे हुए लोग वहाँ से निकल गए। लगभग दो महीने के बाद जब सब जगह दंगे बंद हो गए तो ये लोग वापस उस क्षेत्र में  गए, जहाँ उन्हें उनकी माँ और बहन एक अस्पताल में घायल अवस्था में मिले। उस मुलाकात के बाद सभी लोग अपने-अपने जानवरों को ढूंढने पहाड़ी क्षेत्र में गए, जहाँ उनको अपनी दो भैसें मिली जिनको स्थानीय लोगों ने अपने घर में रखा था, यह सोच कर कि लोग वापस आएंगे तो ले जाएंगे।

मुन्नी जी बताती हैं कि उनकी भी दो भैंस को उस समय उन पहाड़ी लोगों ने अपने वहाँ बांध के रखा था जो उनको मिली। मुन्नी जी बताती हैं की वह समय कितना सरल और आसान था, किसी चीज की चिंता नहीं थी न जंगल से पत्ते काटने का चिंता, ना किसी का भय था ना ही जानवरों के लिए भूसा रखने की चिंता, आज एक जगह स्थाई जीवन जीने से उन्हें लाखों रुपयों की पारली और भूसा इकट्ठा करके रखना पड़ता है। 

अमानगढ़ रेंज, उत्तर प्रदेश के बिजनौर ज़िले के मकरोनिया कंपार्ट नंबर 18 में,  52 वन गुज्जर के परिवार कई पीढ़ियों से निवास करते आये हैं। इन सभी की आजीविका पशुपालन पर ही निर्भर है। दूध बेचकर सभी अपने परिवार का भरण-पोषण करना, जंगल-जानवर से जुड़ाव ही उनकी  दिनचर्या का मुख्य हिस्सा है। इनकी पारिवारिक व्यवस्था आज भी परिवार के मुखिया के इर्दगिर्द घूमती है। अब्दुला एक परिवार के मुखिया हैं, उनका मुख्य काम अपने पारिवारिक व्यवस्था को चलाना है। रोज़ सुबह एक-एक करके सभी को अपनी खाट से आवाज़ देकर जगाना, उनकी दिनचर्या का हिस्सा है।  4 बजे भोर से ही गफार उसके दोनों बड़े भाई और उसकी भाभी, बहन सभी उठ जाते हैं।  एक-एक कर सभी जानवरों से दूध दोहना और सुबह दूधिये के आने से पहले उस से जुड़े सभी काम निपटा देते हें। उसके बाद सभी अपने-अपने कामों में लग जाते हैं। जैसे एक बहू नाश्ते की तैयारी में लग जाएगी, अन्य लोग गोबर उठाने, साफ-सफाई के कामों में, यहाँ तक की एक छोटा सा बच्चा भी खाली नहीं बैठता है। गफार जो उम्र में 10-12 वर्ष का है, रोज़ सुबह और शाम को पाँच से छै भैंसों को दोहता है। उसे भैंसें बहुत पसंद हैं और वह उनके साथ खेलता है, प्यार करता है और उनको खिलाता है। इस समुदाय का जंगल और जानवर के साथ एक अनोखा रिश्ता है, जो जंगल और उसकी जैव विविधता को प्राकृतिक तौर से बनाए रखती है। 

दूध आसपास के शहर जैसे रामनगर, हरिद्वार, ऋषिकेश, देहरादून; इन क्षेत्रों में जाता है जिसमें बाज़ार भाव या तो दिवाली या होली के दिन ही तय किया जाता है।  शिक्षा की कमी के कारण लोग आज भी बनियों के अधीन हैं। कई लोगों को यह तक पता नहीं रहता है कि महीने का कितना दूध बनिये के पास गया, मुश्किल ही कुछ लोग अपना खुद का हिसाब का मूल्य निकाल पाते हैं। कई परिवार हमेशा ही बनिए का कर्ज़दार बने रहते हैं। 

चुनौती- 

  • स्थायी जीवन जीने के कारण इस समुदाय के लोगों को आज अनेकों चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। शुरुवाती दौर से ही पशुपालन और जानवरों के साथ इस समुदाय का रिश्ता रहा है, जिसके चलते ये उनके जीवन चक्र का एक मुख्य हिस्सा है। इसी कारण ये समुदाय शुरू से ही घुमंतू रहा है। इसीलिए यह समुदाय दशकों तक मैदान और पहाड़ों पर आवाजाही करते रहा। लेकिन राज्यों की सीमाएं बनने से इनकी आवाजाही में भी रुकावट आ गई है। 
  • उत्तराखंड के वन गुज्जर समुदायों के लोगों पर वन विभाग के द्वारा कई तरह के झूठे केस उनके ऊपर दर्ज किए गए हैं। वही उसके उलट उत्तर प्रदेश के भीतर रहने वाले वन गुज्जर समुदायों में यह देखने को कम मिलता है। जिसका एक कारण यह भी है कि उत्तराखंड छोटा राज्य होने के चलते शायद सरकार द्वारा लोगों को चिन्हित करना आसान हो गया।  
  • वन गाँव होने के कारण भारत सरकार की कई मूलभूत योजनाएं उनके क्षेत्रों में लागू नहीं होती जैसे शिक्षा, स्वास्थय, बिजली और पंचायती गवर्नेंस के अंदर आने वाली कोई भी योजनाओं को वहाँ लागू नहीं किया जाता है, इन कारणों से आज भी यह समुदाय इन मूलभूत सुविधाओं से वंचित है। 

Author

  • महीपाल, सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़े हैं और दिल्ली की संस्था श्रुति के साथ काम कर रहे हैं। 

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