सत्यम :

आज ‘युवानिया’ का सौवां अंक आपके साथ साझा हो रहा है। इस पाक्षिक वेब पत्रिका ने एक लंबा सफर तय किया है। महीने में दो बार, साल में 24 बार। यानी इस पत्रिका ने चार साल से भी लंबे समय तक अपनी निरंतरता बनाए रखी है। युवानिया की टीम और इसके लेखक-लेखिकाओं के साथ-साथ देश भर में फैले इसके तमाम पाठकों को बहुत बधाई और शुक्रिया। 

‘युवानिया’ जैसी पत्रिका निकालने की योजना के समय से ही मेरा निजी तौर पर इसके साथ गहरी रुचि रही है। हालांकि तब वाकई मैंने यह नहीं सोचा था कि एक योजना इतने अनुशासन-बद्ध ढंग से और इस निरंतरता के साथ इतना लंबा सफर तय करेगी। वो दौर कोरोना का था। देश तालाबंदी की जकड़ से निकल ही रहा था। दफ्तर खुलने शुरू हो रहे थे लेकिन सामान्य आवाजाही, जो कोरोना से पहले सामान्य बात थी, अभी भी अवरुद्ध थी। 

ऐसे में इस पत्रिका का विचार शायद इसलिए ही आया था कि लोग खुद को अभिव्यक्त करें। अपनी-अपनी लिखत से अपने आस पास और देश-दुनिया में घटित हो रहे इस दौर का आंकलन करें, कुछ पुराना याद करें, कुछ अभी के हालात पर अपनी बात कहें और इस मंच पर वे वह सब कह सकें जो वो कहीं और नहीं कह सके या कह सकते हैं। 

इस पत्रिका का एक बड़ा उद्देश्य युवाओं के विचारों, चिंतन और उनकी समझ को अभिव्यक्ति देना और उस अभिव्यक्ति को एक जीवंत मंच प्रदान करना था। इसलिए इसका नाम बारेली भाषा में ‘युवानिया’ तय हुआ था जिसका अर्थ जवानी के आस-पास बैठता है। जवानों की बातें, लड़के-लड़कियों की बातें, उनकी रवानगी, उनकी भंगिमाएँ। 

मुझे बहुत खुशी है कि ‘युवानिया’ अपने इस उद्देश्य में पूरी तरह कामयाब रही है। इन चार साल और दो महीनों के सफर में युवानिया ने अपने साथ लगभग 450-500 नए लेखक-लेखिकाएं जोड़े हैं। इनमें से आधे से ज़्यादा लेखक वे हैं जिन्होंने पहली बार कहीं लिखा है। जिनके लिखे का पहली बार प्रकाशन हुआ है और इसके ज़रिए वे कितने ही लोगों तक पहुँचे हैं। थोड़ा सा गुणा-गणित करें तो यह समझा जा सकता है कि औसतन हर अंक में एक नया लेखक या लेखिका जुड़े हैं। लेखक या लेखिका बने हैं। युवानिया का संकल्प इस लिहाज से कायम रहा कि यह नए लेखक/लेखिका ढूंढेगी, उन्हें लिखने के लिए प्रेरित करेगी और अंतत: उनके लिखे को एक मंच देगी और उसे अधिकतम लोगों तक पहुंचाएगी।

युवानिया के इस लंबे सफर में जो एक बात सबसे ज़्यादा नोटिस की जानी चाहिए वह ये कि यहाँ विषयों की समृद्ध विविधता रही। एक ही अंक में आपको कई विषयों पर गाँव-जवार के युवाओं का लिखा पढ़ने को मिलेगा। बात चाहे जल-जंगल-ज़मीन के मुद्दों की हो, आदिवासी विरासत की हो, समाज में बढ़ती सांप्रदायिकता की हो, खान-पान, विशिष्ट पहनावे, सांस्कृतिक रीति-रिवाजों की हो या तमाम जन संगठनों द्वारा किए जा रहे हस्तक्षेपों की हो, सरकारी नीतियों की हो, चुनाव की हो या क़ानूनों की हो, यहाँ किसी न किसी रूप में आयी है। स्वाभाविक और ज़मीनी सच्चाई लिए। 

समय-समय पर इसके जो विशेषांक आए, वो विशिष्ट आकर्षण के साथ आए। सारे के सारे विशेषांक संकलनीय रहे। 

एक और बात जिस पर सहज ही ध्यान जाता है वो है इसमें प्रकाशित हुई विधाएँ हैं। लेखन की जितनी विधाएँ संभव हैं वो यहाँ शाया हुई हैं। कवितायें, कहानियाँ, लेख, आलेख, व्यंग्य, रिपोर्ट्स और क्या नहीं? ज़रूर यह कहना होगा कि ये तमाम रचनाएँ उस तरह से परिपक्व या शास्त्रीय नहीं रहीं लेकिन युवानिया ने कभी यह दावा नहीं किया था कि वह केवल परिपक्व रचनाएँ ही प्रकाशित करेगी बल्कि उसका इरादा हमेशा युवाओं में निहित लेखकीय प्रतिभा को उभारने और उन्हें मंच प्रदान करने का था। बावजूद इसके, हर तरह की रचनाएँ यहाँ पूरी उदारता के साथ छापी गईं और बनते हुए लेखकों को प्रोत्साहन दिया और उन्हें लेखन के प्रति गंभीर बनाया। 

इसने मुझे भी लिखने के अवसर दिये। इसलिए इस पत्रिका से एक अन्य तरह का रिश्ता भी बना। इस रिश्ते के जानिब भी मुझे बेहद खुशी है कि इस पत्रिका ने एक बेहतरीन मुकाम हासिल किया।

इन चार सालों में बहुत से ऊर्जावान साथी इसके साथ सक्रियता से जुड़े। मेरी ओर से युवानिया की कोर टीम के साथ उन सभी साथियों को तहेदिल से मुबारक और शुक्रिया। 

यह पत्रिका ऐसे ही कई पड़ाव पार करते हुए और लंबे सफर पर निकले। नए-नए लेखक, लेखिकाएं और नए-नए पाठक जुड़ें। शुभकामनाओं सहित।

Author

  • सत्यम, मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले से हैं। वे पूर्व में दिल्ली की संस्था श्रुति से जुड़े रहे हैं। सत्यम एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं और वर्तमान में भोपाल में काम कर रहे हैं। वे नियमित रूप से समसामयिक मुद्दों पर लिखते रहते हैं और गीत गाने-गुनगुनाने में भी रुचि रखते हैं।

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