वर्षा बर्मन :

कमजोर, अबला, बेसहारा कहकर खुद को
लाचारों-सा बर्ताव नहीं करूंगी आज,
नारीत्व की श्रेष्ठता का गान गवा कर
बेमतलब सम्मान की मांग नहीं करूंगी आज।

आज, बात करूंगी समता की, निर्णय लेने की सक्षमता की,
दहलीजों को लांघ के थोड़ा मांग करूंगी विचारों की स्वतंत्रता की।
उम्मीद करूंगी बेबुनियादी पैमानों में न मापा जाए मुझको,
आशा होगी वस्तु के रूप में न झांका जाए मुझको,
गालियों के नाम में मेरा न अस्तित्व रहे,
गलियों से गुजरूं तो तनिक भी भय का न भान रहे।

इस क्रम में, मेरे व्यवहारों-बर्तावों में भी गर कुछ गलत दिखे,
बेशक तब मुझ पर भी सौ उंगलियां उठे,
बस ध्यान में रख के परिस्थिति-अनुसार-समानता,
नर-नारी सब की स्थिति में अंतिम परिणीति न्याय रहे।

Author

  • वर्षा / Varsha

    वर्ष, छत्तीसगढ़ के कोरिया ज़िले के फुलझर गाँव से हैं। उन्होंने बायोटेक्नोलॉजी में स्नातक किया है। वर्तमान समय में वर्षा छत्तीसगढ़ लोक सेवा परीक्षा की तैयारी कर रही हैं। वह एक अच्छी प्रशासक बनना चाहती हैं। वे सामाजिक मुद्दों पर कविता लिखने में रूचि रखती हैं।

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