संजीव कुमार :

कुछ कहानियाँ अधूरी होके भी पूरी हो जाती हैं, तो कुछ कहानीयाँ पूरी होके भी अधूरी रह जाती हैं। आओ चलते हैं कुछ ऐसी ही पूरी-अधूरी गुमशुदा कहानी की ओर –

यह कहानी एक ऐसे परिवार की है जिसमें किसी ने अपने बेटे, पति और पिता को खोया है “यह कहानी है रामकांति जी की जो की ग्राम चक-माधोपुर, भिंड ज़िला, मध्यप्रदेश में रहेती है” – इनसे हमारी मुलाकात एक शिविर कैंप के दौरान हुई। उनसे बात-चीत के दौरान उन्होंने बताया कि अभी जो उनकी स्थिति है वो कुछ समय पहले ऐसी नहीं हुआ करती थी, एक समय था तब इनके आँगन में भी चहल-पहल हुआ करती थी। जब यह अपने पति रामसुमन, जो की दिमागी रूप से थोड़े कमजोर होने के बावजुद भी घर की सारी ज़िम्मेदारी उठाए हुए थे, ससुर अतरसिंह तथा अपने चारों बच्चे – अरुण,अनुप्रिया, सरोज तथा शिक्षा के साथ इस कच्चे से घर में ही बहुत खुश और सुख- शांति से रहा करती थीं।

परंतु उस रात दिनांक 28 सितम्बर 2023 की घटना के बाद उनके परिवार में सब कुछ बदल गया। उन्होनें बताया की उनके पति रामसुमन करीबन रात के 9 बजे बिना किसी को घर पर बताये बाहर टहलने के लिए चले गये, काफी समय बीतने के बाद भी वो घर वापस नहीं आए तो रामकांति और उनके ससुर अतरसिंह ने गाँव वालों को बुलाया और सभी के साथ रामसुमन की तलाश में निकल गये, समय बीतता गया पर अभी तक रामसुमन का कोई अता-पता ही नहीं चला और थक हार-कर सभी गाँव वाले अपने-अपने घर लौटने लगे तथा उन्हीं गाँव वालों में से ही कुछ लोग कहने लगे की रामसुमन को कोई उठाके ले गया है, तो कोई कह रहा था की रामसुमन कहीं चला गया है। जैसे की कुछ साल पहले चला गया था, जहाँ कुछ लोगों द्वारा उन्हें जबरन नौकर  बनाकर रखा गया, पर वहाँ से वो किसी न किसी तरह लौट कर घर वापस आ गया।

समय बीतने के साथ-साथ रामसुमन की कोई खबर नहीं मिली तथा गाँव वालों ने रामसुमन को गुमशुदा घोषित कर दिया। रामसुमन के गुमशुदा होने के बाद उनके पिता अतरसिंह का मानसिक संतुलन बिगड़ गया और वो दिमागी रूप से कमजोर हो गये। इस तरह रामकांति के घर दुःख के बादल छा: गये। परन्तु घर वाले इस उम्मीद में बैठे रहे की जिस तरह रामसुमन दो साल पहले घर वापस लोट आया था, काश इस बार भी कुछ ऐसा ही हो जाए पर अब घर की आर्थिक स्थिति दिन प्रतिदिन बिगड़ती जा रही थी। रामकांति को घर चलाने के लिए कुछ न कुछ तो करना था, इसलिए उन्होंने अपनी जो थोड़ी बहुत पुश्तैनी ज़मीन थी, उसे बटाई पर दे दिया और वो भी साथ में काम करने लगी। पर इतना करना ही काफी नहीं था क्योंकि इससे ना ही उनका कर्ज चुक पा रहा था और ना ही घर चल पा रहा था। अब घर की इस स्थिति को देख, अरुण जो की अभी महज 17 साल का है उसने एक कठोर फैसला लिया और घर में अपना योगदान देने तथा बहनों के भविष्य को सँभालने के लिए अपनी पढ़ाई बंद करके, गाँव से बहुत दूर दुसरे शहर अहमदाबाद में कमाने के लिए चला गया। अभी रामकांति की दो बेटियां अनुप्रिया और सरोज एरोड़ी के एक छात्रावास में रह कर पढ़ाई कर रही हैं  तथा रमाकांती अपनी छोटी बेटी शिक्षा और ससुर के साथ गाँव में रहती हैं। 

जब भी उनकी बच्चियाँ घर लौटकर आती हैं तो अपने पिता की अनुपस्थिति में दुखी, उदास होकर भी अपनी माँ को एक नन्ही सी सहानुभूति देती हैं कि- “बापू आयेंगे!” यह आँगन आज भी उस खुशियों का मोहताज हो गया है जो रामसुमन जी के साथ गुमशुदा हो गयी हैं, यह अध-मरे दरवाज़े उस दस्तक का आज भी इंतजार कर रहे हैं, जो इस घर में खुशियों की बौछार ला दें, किसी का छिना हुआ बचपन और टूटे सपने लौटा दें। 

रामसुमन आज अपने परिवार के साथ नहीं हैं। उनके ना होने से आज उनका पूरा परिवार बिख़र गया है पर फिर भी परिवार वालों ने अपनी खुशियाँ और परिस्थितियों के साथ समझौता कर लिया है और एक उम्मीद लगाये बैठे हुए हैं की एक न एक दिन इस सुने-आँगन में रामसुमन के साथ वो सारी खुशियाँ लौट कर आयेंगी जिसका यह परिवार हक़दार है।

Author

  • संजीव कुमार मध्य प्रदेश के भिंड जिले के मालनपुर के निवासी हैं। वह वर्तमान में बीएससी तृतीय वर्ष के छात्र हैं और जेनिथ सोसाइटी संस्था में सक्रिय रूप से कार्यरत हैं, जहां वह सहारिया आदिवासी और मजदूर वर्ग के अधिकारों के लिए काम करते हैं। उन्हें पढ़ना और लिखना बहुत पसंद है।

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