अफ़ाक :

जंगल और पहाड़ हमको हमेशा अपनी ओर खींचते रहे हैं। बतौर पर्यटक हम बाहरी सुंदरता देखते-समझते हैं। दो-चार दिन के पर्यटन के बाद एक सुंदर और रिलैक्स भरी छवियों के साथ वापस आ जाते हैं। मैंने खुद भी यही काम हर बार किया है। पर इस बार सभी अपरिचित नए साथियों, युवाओं के साथ महाराजगंज के सदर ब्लॉक के वन ग्राम बीट, ग्राम सभा बरगदवा राजा में लगभग एक सप्ताह यूथ कैम्प के सिलसिले में जाकर रहना हुआ। पहले भी तीन बार मैं इस जगह के आस पास आया हूँ, पर इतने दिन रूककर, देखने-समझने का अवसर नहीं मिल पाता था।

इस जंगल में रहने वाले लोगों को वन टांगिया समुदाय के नाम से जाना जाता है। अधिकतर लोग वन टांगिया से यह समझते हैं कि यह वन को काटने वाले लोग हैं। जबकि टांगिया शब्द म्यांमार, बर्मा से आया है। जिसका अर्थ होता है पर्वतों में खेती करने वाले लोग। 1918 के आस-पास फोरेस्ट अफसर, रेंजर लोग म्यांमार गए। वहाँ इन्होंने देखा की पर्वत पर खेती, जंगलों के बीच होती है। लौटने पर अंग्रेज़ों को बड़ी मात्रा में रेल के लिए लकड़ियाँ चाहिए थीं। वे लोग यहाँ से इमारती लकड़ियाँ- साखू, सागोन, आदि काट कर बाहर भेजते थे। इन्हीं लकड़ियों से रेल की पटरियों के नीचे की सिल्ली बनाई जाती है। यह लकड़ियाँ सैकडों साल तक खराब नहीं होती थी।

उस समय तक इस जंगल में नये पेड़ लगाने की समझ नहीं बन पाई थी। यहाँ पर नया पेड़ नहीं लगाते थे। सिर्फ पेड़ काट लेते थे। फिर उसी पेड़ से नए पौधे उगते थे। लेकिन यह नए पौधें बारिश और तूफान में टूट जाते थे। उसी वक़्त रेंजर लोग जो बर्मा गए थे उन्होंने वहाँ देखा था की म्यांमार में पहाडों पर वहाँ के किसान वनों में बढिया खेती करते हैं।

इस बात को ध्यान में रखते हुए अंग्रेज़ों द्वारा सन् 1918 में ही सोहगी बरवा वन क्षेत्र के आसपास लगभग 100 किमी के दायरे में गाँवों में मुनादी कराई गई। जो लोग यहाँ पेड़ लगाने का काम करेंगे उनको पेड़ लगाने के साथ खेती के लिए भी ज़मीन दिया जायेगा। ग़रीबी थी और अंग्रेज़ जोर-ज़बरदस्ती करके भी लोगों को लेकर आये और पेड़ लगाने और खेती का काम साथ-साथ शुरू हुआ।

दरअसल सागौन, साखू लगाने कि जो विधि होती है- कि पेड़ से पेड़ की दूरी 8 से 10 फिट पर होती है और इसी तरह पेड़ लगाए जाते थे। बीच के हिस्से में जो खाली ज़मीन होती थी, वहाँ यह लोग (वनटांगिया) खेती करते थे। जिस पानी से साखू और सागौन के पौधें की सिंचाई होती थी उसी पानी से खेतों की भी सिंचाई हो जाती थी। इससे अंग्रेज़ों को इमारती लकड़ियाँ और लोगों को मोटा अनाज मिल जाता था।

अभी वन टांगिया क्षेत्रों में 23 वन टांगिया क्षेत्र हैं। जिनमें 18 महराजगंज और 5 गोरखपुर में हैं। वन टांगिया को अंग्रेज़ों ने नर्सरी के तौर पर विकसित किया। और एक-एक नर्सरी को नंबर से पहचाना जाता है। महाराजगंज के सोहगी बरवा जंगल का हिस्सा पनिहाव से लक्षमीपुर तक फैला हुआ है। यह पूरा जंगल नेपाल के सरहद से लगा हुआ है। महाराजगंज में लगभग 40 हज़ार लोग वन टांगिया क्षेत्र में रहते हैं।

इस वन क्षेत्र में सभी लोग बाहर से आये हैं। ये लोग सौ साल से ऊपर से यहाँ रह रहे हैं। लगभग 6 साल पहले इस वन टांगिया क्षेत्र में ग्राम प्रधानी का चुनाव हुआ और अभी यहाँ दूसरी ही प्रधानी चल रही हैं। ज़मीन के पट्टा के लिए सबको 75 साल पुराने कागजात, ज़मीन पर काबिज होने का साक्ष्य देना था। पढ़ाई का, वन विभाग का रजिस्टर, बाहर निकल कर कुंआ खुदाई, ट्राम वे लाइन, आदि की जानकारी के आधार पर यहाँ लोगों को पट्टा हुआ है। अभी इसको सेंचुरी घोषित किया गया है। लोगों को लग रहा है, इससे उनका जीवन बढ़िया होगा। बढ़िया होगा या नहीं यह तो वक़्त बताएगा। लेकिन बाकी वन समुदाय के साथ जो हो रहा है वो यहाँ न हो, जंगलों के होने से पर्यावरण संतुलित है। प्राकृति के साथ जीवन संघर्ष से भरा हुआ है। लेकिन यहाँ लोग खेती किसानी से खुश हैं। यहाँ एक लगभग 70 साल के बुजुर्ग हैं, राम नारायण जिनसे मेरी दोस्ती हुई है। हम जिस स्कूल में रहते थे, उनका खेत बिलकुल वहीं बगल में है। रोज़ हम उनकी टिब्बुल (ट्यूबवेल) चलाकर नहाते थे। हम खुद चला लेते और पानी उनके अलग-अलग खेतों में लगा देते थे। यह दिन भर धूप में अपने खेतों को खुद गोड़ते रहते हैं। जब मिलो, खुश होकर मिलते हैं। दरअसल आदिवासी लोग वनों में मूल रूप से रहने वाले लोग प्रकृति के साथ खुशी-खुशी जीना जानते हैं। 

जंगलों में वनों में प्रकृति के साथ लोग लंबे समय से रहते रहे हैं। और उन्हें पता है कि कैसे उसे बरकरार रखना है। लेकिन जब भी कोई बाह्य शक्ति ऐसे जंगल में रहने वाले समुदाय को नए तरीके से चलाने की, एक दम आधुनिक धारा से जोड़ने की कोशिश करती है। तो इन्हें अपने घरों अर्थात जंगलों से दूर होना पड़ता है। इस प्रकार इनकी सभ्यता और जंगल दोनों हमेशा खतरे में पड़ जाते हैं। मैं यहाँ से जाते-जाते यही सोच रहा हूँ और उम्मीद कर रहा हूँ कि जिस तरह से वन टांगिया समुदाय के लोग जंगल के साथ सामंजस्य बना कर सालों से जीते आये हैं। उसी प्रकार अभी भी चलता रहे, जंगल में लोकतंत्र की बहाली बहुत अच्छी बात है। लेकिन जंगल में शहर नहीं बनाया जा सकता, इसलिए आशा करता हूँ कि वन टांगिया लोग खुशी-खुशी ऐसे ही अपने जंगलों में खेती-किसानी करते रहेंगे। हम जैसे लोग जब भी यहाँ आएंगे तो नई ऊर्जा से लबरेज होकर और प्रकृति के साथ जीने की शिक्षा के साथ अपने समाज में जाएंगे।

Author

  • अफ़ाक, फैज़ाबाद उत्तर प्रदेश से हैं और सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़े हैं। वह अवध पीपुल्स फोरम के साथ जुड़कर युवाओं के साथ उनके हक़-अधिकारों, आकांक्षाओ, और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दों पर काम करते हैं।

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