शैलेश समावेसी :
सुबह से ही गाँव में बहुत चहल-पहल और शोर-शराबा देखने और सुनने को मिल रहा था। कोई घर की लिपाई करता दिख रहा था तो कोई आसपास की बेवजह के छोटे-छोटे घास नुमा पौधों की कटाई करता दिख रहा था, कोई बिसाती वाले से (कॉस्मेटिक) चूड़ी-बिंदी तो कोई चौराहे से सामान लाते हुए नजर आ रहा था।
सभी अपनी-अपनी तैयारी में व्यस्त थे। पूछने पर पता चला कि आज छोटी का गौना है। हाँ छोटी! संगीता को सब प्यार से घर पर छोटी ही पुकारते हैं, छोटी जब 14 साल की थी तभी उसकी शादी हो गई थी और 3 सालों के लिए उसको रोका गया था।
अब उसके गौना का समय आ गया था जो कि उनके परिवार वालों ने तय किया था। क्योंकि छोटी के बाबा यह चाहते हैं की छोटी की शादी उनके सामने ही हो और बाबा की ये इच्छा उसके (छोटी के) पिता को पूरी करनी थी। जिसको लेकर छोटी की माँ उसको समझाने लगी रही, सभी अपनी-अपनी सत्ता समय-समय पर उपयोग कर रहे थे। अब यहाँ छोटी का क्या??
यह कोई नई बात नहीं इस तरह की कम उम्र की शादी हमेशा आसपास के क्षेत्र में देखने को मिलती आ रही है जिन्हें हम (बाल विवाह) भी कहते हैं। गाँव की महिलाएं विदाई के समय बेटी को नेक में अनाज देने के लिए सर पर टोकरी रखकर नए-नए कपड़े पहनकर और साथ में अपनी लड़कियों को लेकर छोटी के घर आने-जाने में लगी हुई थी।
गाँव के लोग लड़की के गौने में खूब जोर-शोर से अनाज का दान देते हैं। इस रिवाज को यहाँ के लोग अपनी भाषा में पाहुर् कहते हैं। पाहुर् का मतलब मायका होता है और मायके से दिया गया समान पाहुर् कहलाता है।
इसको देने के पीछे का विचार यह है कि वह लगातार होने वाले गौने में ऐसी ही पाहुर् देते रहते हैं। जिससे जब उनके घर में किसी बेटी का गौना होता है तो उनके पास क्विंटल के हिसाब से राशन इकट्ठा होता है। जिससे उनके लिए शादी के खर्चे में आसानी होती है। यह पाहुर् लड़की को बहुत कम मात्रा में दिया जाता है। गाँव के लोग बेटी की शादी में अनाज, चारपाई, उनके घरों में काम में हाथ बाँटते हुए मदद करते हैं।
बेटी को यह भी ठीक तरह से नहीं पता होता है कि वह वहाँ जाने के बाद क्या करेगी, पर गाँव की महिलाएं व और भी लोग शादी के रीति-रिवाज व रूढ़िवादी सोच के ऊपर उठकर विचार ही करते हैं।
गौने के ठीक 1 हफ्ते पहले छोटी मुझे कलेस्टर मीटिंग में मिली थी। हमारे संवाद के समय में उसने अपने पढ़ाई को लेकर बात रखी थी, जिसका कारण यह था कि एडमिशन के लिए परिवार में माता-पिता व आसपास के गाँव वाले कोई भी नहीं सहयोग करना चाहते थे। वह नहीं चाहते थे कि वह और आगे पढ़े।
वह पढ़ना चाहाती थी, शिक्षा से जुड़कर उसे बहुत खुशी होती थी और वह पढ़ने में बहुत मन लगाती थी। वह चाहती थी कि नवी कक्षा से उसका स्कूल में दाखिला करवाया जाए और उसको आगे पढ़ने के लिए एक मौका मिले। हमने बातचीत के दौरान छोटी को सहयोग दिलवाने और घर पर बातचीत करने के लिए अपनी बात रखी थी।
जब मैंने परिवार वालों से बातचीत की तो उनका जवाब छोटी के लिए यह था कि अभी तो छोटी का गौना होने वाला है। आगे की पढ़ाई के लिए अब ससुराल वाले ही सोच सकते हैं। वह चाहेंगे तो पढ़ाएंगे, वह अगर नहीं चाहेंगे तो घर का काम ही करेगी। कई बार सामुदायिक बैठक पर और कई बार घर पर जाकर हमने छोटी के परिवार में बातचीत की पर अगर हम देखें तो रूढ़िवादी सोच और पितृसत्ता ने इस तरह से जकड़ कर रखा है कि किसी को ढांचे के बाहर सोचने से ही लोग डर जाते हैं।
और यही ठीक है दिमाग में बिठाकर वही करते हैं जो बेहतर लगता है उनके नजरिए से वह बेहतर होता है। और फिर वही माता-पिता ने एक तरफा फैसला लेते हुए छोटी की बे-उम्र में शादी करके हज़ारों रूपए खर्च कर दिए पर आगे की पढ़ाई के लिए किसी का विचार समग्र नहीं हुआ…।
छोटी जैसी बहुत सी किशोरियाँ हैं जो अपने सपनों और अपने शौक को मार कर जीवन जीने लगती हैं। लगातार कोशिशों के बाद भी 100 में से 10 लोग ही ऐसे सामने आते हैं जो लड़कियों की शिक्षा और आजादी को लेकर व उनकी गरिमा को लेकर अपना नजरिया सामान रखते हों। यह हमारे लिए भी बहुत चुनौती पूर्ण कार्य होता है जब हम लगातार संवाद और बातचीत के जरिए भी उस जटिल समस्या को सुलझाने में पीछे रह जाते हैं।
यह हमारे समाज के लिए बहुत ही चिंता का विषय है। ज्यादातर यह देखने में आता है कि महिलाओं और किशोरियों के लिए आज भी समाज में भेदभाव और असमानता देखने को मिलती है। शिक्षा, शादी जैसे फैसलों पर परिवार का दबाव और उनकी मर्जी थोपते हुए, वे अपनी लड़कियों के जीवन का फैसला लेते हैं।
परिवार वालों की क्या ज़रूरत होती है कि वह बाल विवाह से होने वाले नुकसान की तरफ ध्यान ही नहीं दे पाते हैं। बाल विवाह से ग्रसित किशोरी या किशोर को क्या महसूस हो रहा होता है, इस पर अगर परिवार के लोग- माता-पिता और आज के युवा ध्यान दें, तो शायद फीलिंग और ज़रूरत पर संवाद करते हुए लोगों का नजरिया बदला जा सकता है।

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