शैलेश सिंह:

मैं शैलेश स्वतंत्रता दिवस की तैयारी के दौरान, केंद्र पर आने वाली सभी युवतियों से मिलना-जुलना कर रही थी और उनके लिए आज़ादी क्या है, इसको लेकर समझने और लिखने का प्रयास जारी था। तभी मेरी मुलाकात केंद्र में आने वाली युवती (रजिया) से हुई। रजिया की उम्र लगभग 30 साल है और वह पिछले 1 वर्ष से हमारे साथ गरिमा लाइब्रेरी से जुड़ी हुई है।

रजिया से मेरी बातचीत गाँव में क्या चल रहा है, क्या माहौल है और उनका हाल-चाल कैसा है, इस तरह से शुरू हुई। रजिया बताती है कि हाल-चाल तो ठीक ही है पर गाँव का माहौल देखकर कभी-कभी मन बहुत घबराता है और व्याकुल हो जाता है जिससे हमारे भी जीवन पर असर पड़ता है।

मैंने रजिया से पूछा क्यों ? क्या हुआ सब सही तो है ना…

रजिया: पिछले 1 महीने से मैं जो देख रही हूँ वह मुझे बहुत ही अजीब लग रहा है। एक नई हवा चली है जिसको आप फेक न्यूज़ बताती हो।

मैंने पूछा: क्या??? 

रजिया: दीदी पूरे गाँव में हल्ला है कि छोटी बहन अपनी बड़ी बहन को अगर चूड़ी नहीं पहनाती है तो बड़ी बहन के साथ कुछ अपशगुन हो जाएगा और बहुत परेशानियां देखनी पड़ सकती हैं। छोटी बहन की चूड़ी पहनने के बाद बड़ी बहन को उसको मिठाई और कपड़े देने होंगे।आसपास के गाँव में यह लगातार देखने को मिल रहा था।

मैं समूह की बैठक में गई थी तो वहाँ पर महिलाएं चर्चा कर रही थी कि चूड़ी वाला हल्ला बहुत ज़ोर-शोर से चल रहा है और फिर धीरे-धीरे यह हवा हमारे गाँव तक भी आ गई है। विमला चाची और सुशीला दीदी दोनों की बहने चूड़ी पहनने आ गई हैं।

सुशीला दीदी बोल रही थी कि मेरे पास तो साड़ी खरीदने के पैसे भी नहीं हैं, कैसे मैं उनको मिठाई और कपड़े भेंट करू? विमला चाची भी बता रही थीं कि उनके यहाँ दोनों बेटे बाहर हैं। कहाँ से कुछ खरीदें, अभी तो पैसा भी नहीं भेजा है।

वह बताती है कि मेरी भी छोटी बहन का फोन आया पूछते हुए कि मैं चूड़ी पहनाने कब आऊं? मैंने एक बार तो किसी तरह से आनाकानी की, पर छोटी बहन का जवाब आता है कि मत देना साड़ी, पर चूड़ी पहनाने ज़रूर आऊंगी वरना कुछ अनहोनी हो जाएगी अगर नहीं पहनूंगी। तो रजिया कहती है कि अगर हम चाहे भी तो इन सब चीज़ों से बाहर निकलना बहुत कठिन है क्यूंकि परिवार और रिश्तेदारों की वजह से इन सब चीजों से बाहर निकलना मुश्किल हो जाता है।

यह सब देखकर बहुत अजीब लगता है कि कैसे हम बेवजह के खर्चों में पड़कर उन चीज़ों को पूरा करते हैं जिनका कोई भी अस्तित्व नहीं है। इन चीज़ों को पूरा करने के लिए हम कितनी परेशानियां उठाते हैं फिर भी जाने कितने लोग इस तरह के अंधविश्वास में जी रहे हैं और उसे पूरा करते हैं। लेकिन दीदी इतना समझ आ चुका है कि इन सबसे हमें कोई फायदा नहीं है। और मैं लगातार अपने परिवार में इन सब चीज़ों को लेकर बात कर रही हूँ। इस तरह के चीज़ों को बढ़ावा ना दे इसके लिए लगातार उदाहरण ढूंढ रही हूँ।

तो यह रजिया थी। जिनके क्या विचार इस तरह की बातों का प्रचार-प्रसार होता है उसको लेकर उन्होंने हमारे साथ जुड़कर इतने दिनों में यह तो नजरिया बना लिया कि यह एक तरह की फेक न्यूज़ है। और बदलाव के लिए वह अपने परिवार में संवाद भी कर रही हैं।

पर गाँव की एक महिला विमल चाचा बताती हैं कि वह अभी तक अपनी दो बहनों को साड़ी और मिठाई दे चुकी हैं और बहनें अभी आना बाकी है। दोनों ही बहने मेरे लिए चार-चार दर्जन चूड़ी लाई थी। उनका घर यहाँ से काफी दूर गाँव में है। आने में लगभग तीन से चार घंटे लग जाते हैं और किराया भी बहुत है। दोनों बहनों का लगभग आने-जाने में और चूड़ी पहनाने की रिवाज में ₹1500 का खर्च ज़रूर आया होगा। एक बहन का तो बेटा बीमार भी था पर वह फिर भी आई क्यों ना आती, आना ज़रूरी भी था। अगर ना आती तो शायद कुछ ऊंच-नीच हो जाती, शायद कोई अनहोनी हो जाती। अभी थोड़ा गेहूं बेचकर दोनों को निपटाया है। क्या करें घर में इस समय दिक्कतें चल रही हैं।

बेटी का गौना किया है। उसके पीछे कई जगह पर कर्ज़दार होना पड़ा, जिसके चलते गेहूं को बेचना पड़ा। एक बहन में लगभग ₹1000 का खर्च आया है। दोनों को किसी तरह निपटा कर फुर्सत पाई हूँ। अभी देखो जो दोनों बहने और आ रही है उनको कैसे निपटाती हूँ। 

तो अगर एक घर में चार बहने हैं, तो प्रत्येक महिला दो बार चूड़ी पहनने की रस्म जो गाँव के माहौल के अनुसार न करने पर अपने नुकसान के दर से कीमत अदा कर रही है।

एक बार ससुराल में और दूसरी बार खुद से अपनी बहन को जाकर जिसमें लगभग प्रत्येक महिला पर 3000 से 3500 रुपए का खर्च आ रहा है और इस तरह की लगभग 40 से 45% महिलाएं ऐसी हैं जो धारणाओं पर विश्वास करके अपने मेहनत के पैसों का बेहतर तरीके से उपयोग करने की समझ नहीं बन पा रही हैं।

हमने पिछले 1 महीने में लगभग 7 गाँव में इसी मुद्दे को सुना है। हर एक गाँव की आबादी 1000 से लेकर 3000 के बीच में है।

जिसमें से हमने यह भी देखा ज्यादातर महिलाएं हैं। लगभग 65% के आसपास महिलाएं मिलेंगी जिनमें से 40% महिलाओं की यह धारणा है कि अगर वह इस तरह की बातों को नहीं मानती हैं तो उनके साथ कुछ गलत हो जाएगा और उन्होंने इस तरह की बातों पर यकीन करके इसको किया भी है। 

ये वह महिलाएं हैं जो खेतों में काम करती है। दूसरों के खेतों में मज़दूरी करती हैं। जंगल से लकड़ी लाती हैं। जिनके पुरुष बाहर पलायन करते हैं। स्वयं सहायता समूह में जुड़कर 10-10 रुपए इकट्ठा करती हैं। तब जाकर उनका जीवन कहीं चल पाता है। पर फिर भी इस तरह की फेक न्यूज़ सुनकर वह यह एक बार भी नहीं सोचती हैं कि इतनी मेहनत का पैसा हम कहां लगा रहे हैं। और किसको फायदा हो रहा है।?

हमने लगभग 250 महिलाओं के साथ इस मुद्दे को लेकर संवाद किया जिसमें यह निकाल कर आया कि लगभग उनमें से 150 महिलाएं तो ऐसी हैं जो डर के कारण यह सब करती हैं कि हमारा कुछ बुरा हो जाएगा। 70 महिलाएं ऐसी हैं जो रिश्तेदार और परिवारों के दबाव में आकर इस तरह के मुद्दे का हिस्सा बनती हैं। 30 महिलाएं ऐसी हैं जो यह समझ चुके हैं कि यह एक फेक न्यूज़ है। एक तरह का कमाने का जरिया है। पर उनमें से भी बस चार-पांच ही हैं जो इन सब चीजों के लिए अपने परिवार में आवाज़ उठा पाती हैं। 

इस तरह की न्यूज़ में अगर देखें तो किनकी फायदा हुआ?? चूड़ी वाला? मिठाई वाला? कपड़े वाला?

आपके आसपास भी अगर इस तरह की फेक न्यूज़ को बढ़ावा दिया जाता है तो आप ज़रूर इसके लिए बात करें और एक बार विचार करने के लिए ज़रूर प्रेरित करें की इन सब चीजों को करने में किसका फायदा होता है।

Author

  • शैलेश, उत्तर प्रदेश से हैंl वर्तमान में शैलेश सरजू फाउंडेशन के साथ जुड़कर उत्तर प्रदेश के बहराइच ज़िले में काम कर रही हैंl वह महिलाओं, किशोरियों और बच्चों के साथ शिक्षा, आजीविका और संविधान से जुड़ी गतिविधियों के अंतर्गत कार्य करती हैंl शैलेश को कविता और कहानी लिखना अच्छा लगता हैl

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