वेद मीना :
नारी का वस्तुकरण से तात्पर्य नारी को कोई चीज़/भौतिक वस्तु समझने से है। जिसके प्रति न कोई भावनाएं होती हैं, न संवेदनाएं होती हैं। जिसका बस केवल अपने स्वार्थ के लिए उपयोग किया जाता है। यह शब्द आज के संदर्भ में बहुत ही ज़्यादा महत्वूर्ण हो जाता है, जैसे कोलकाता की डॉक्टर बेटी के साथ पहले सामूहिक बलात्कार किया जाता है, फिर उसके पैरों को 90 डिग्री तक घुमाकर तोड़ दिया जाता है, मानो जैसे उस बिटिया/बहन में कोई जान या फिर भावनाएं ही न हो। हद्द तो तब होती है जब इसको लेकर प्रशासन भी असंवेदनशील व्यवहार करता है। नारी के इसी वस्तुकरण के कारण को इतिहास में तलाशने की मेरी कोशश है। आज आपको थोड़ा इतिहास में लेकर चलता हूँ।
नारी के सम्मान की खोज हम वैदिक संस्कृति या वैदिक काल (1500BC-600BC) से करते हैं। इस काल को भी दो वर्गों में विभाजित किया गया है। ऋग्वैदिक काल (1500BC-1000BC) और उत्तर वैदिक काल (1000BC-600BC)। ऋग्वैदिक समाज में महिलाओं की स्थित अच्छी थी, वहाँ महिलाओं को शिक्षा दी जाती थी, बाल विवाह नहीं था, पर्दा प्रथा नहीं थी, सती प्रथा नहीं थी, सार्वजनिक जीवन में महिलाएं भाग लेती थी, कुल मिलाकर लैंगिक समानता जैसी स्थिति बनी हुई थी। लेकिन जैसे ही उत्तर वैदिक काल आता है, वहाँ महिलाओं की दशा में गिरावट नज़र आती है। इसका कारण इस काल में कुछ संहिता और कुछ ब्राह्मणों (कोई जाति विशेष नहीं) को माना जा सकता है। जैसे एतरेय ब्राह्मण ने कहा कि पुत्री का जन्म दुख का कारण है। इसी प्रकार मैत्रायणी संहिता में कहा गया कि “नारी मदिरा और जुंए के समान है।” यहाँ मैं स्पष्ट कर देता हूँ कि मेरा उद्देश्य किसी धर्म या जाति को नीचा दिखाना नहीं है। आप समझ सकते हो उस समय सिर्फ कुछ ही लोगों को शिक्षा दी जाती थी और उस समय धर्मगुरुओं के द्वारा इस तरह की बात करना, जनता को किस हद तक प्रभावित करता रहा होगा।
अब हम मौर्यकाल (322BC-185BC) की ओर रुख करते है, यहाँ थोड़ी महिलाओं की दशा में सुधार नजर आता है। समाज में विधवा विवाह की अनुमति थी, महिलाओं को तलाक का अधिकार था, महिलाओं को अंगरक्षक और गुप्तचर के रूप में नियुक्त किया जाता था। फिर गुप्तकाल (319AD-550AD) आता है। वैसे तो गुप्तकाल को इतिहास का स्वर्णकाल कहा जाता है, लेकिन महिलाओं के संदर्भ में देखे तो इसे स्वर्णकाल कहना तार्किक नज़र नहीं पड़ता है। क्योंकि इस काल में सती प्रथा, पर्दा प्रथा, देवदासी प्रथा आदि कुरितियां प्रचलित थीं।
इसी प्रकार फिर मुगलकाल, आधुनिक काल में ये सभी प्रथाएं और ज़्यादा गहरी होती चली जाती हैं। और अब वर्तमान आपके सामने है। जहाँ बॉलीवुड के गानों जैसे “तू चीज़ बड़ी है मस्त मस्त/ मैं तो कब से रेडी हूं तैयार, पटा ले सैय्याँ मिस कॉल से आदि गानों में नारी का वस्तुकरण साफ दिखाई पड़ता है। नारी की भूमिका को सिर्फ बिस्तर से किचन तक सीमित करना, आधुनिक समाज में नारी दासता का प्रतीक है। जिस तरह से समाज में आए दिन बलात्कार की घटनाएं सुनने को मिलती हैं, या फिर महिलाओं पर घरेलू हिंसा के मामले दिखाई देते हैं वे सभी महिला को एक वस्तु समझने वाली सोच का ही परिणाम है।
अगर हमें एक सभ्य समाज का निर्माण करना है तो हमें लैंगिक समानता पर सबसे पहले ध्यान देना होगा। उन सभी रूढ़िवादी प्रथाओं और परंपराओं का त्याग करना होगा जो समाज में महिलाओं को नीचा दिखाने वाली हैं। यहाँ यह समझना बेहद ज़रूरी है कि महिलाओं की इस दुर्दशा को केवल सरकार ही नहीं, समाज की भी कुछ नैतिक ज़िम्मेदारी बनती हैं, जिन्हें निभाकर ही सुधारा जा सकता है। और सरकार को चाहिए कि जहाँ तक संभव हो महिलाओं को सुरक्षा मुहैया कराने वाली नीतियां बनाएं और जो नीतियां बनाई हुई हैं उन्हें पूरी सख्ती से लागू किया जाए। क्योंकि इसी से हमारा समाज सभ्य कहला सकेगा। हमारे राष्ट्रपिता गांधी जी का भी मानना था कि देश को आगे बढ़ाने के लिए समाज का तरक्की करना बहुत ज़रूरी है और इसका एक अहम हिस्सा है महिलाओं को सशक्त बनाना।

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