रोहित चौहान:
दीपक के बारे में क्या बताऊं ? और हाँ, दो पैग के बाद मैं उन्हें दीपक ही कहकर बुलाता था। हाँ, वे मुझसे कई साल बड़े थे, लेकिन हमारे बीच कुछ तो खास था जो हम इतने अच्छे दोस्त बन पाए। पिछले तीन सालों में कितनी ही ना खत्म होने वाली बेमिसाल रातें और फील्ड में साथ में घूमने का मजा भी खूब आया हैं । कहाँ से शुरू करूं? आप लोग सोच रहे होंगे कि दोनों शराबी होंगे, इसलिए रिश्ता इतना ख़ास और गहरा बन गया होगा। सही भी है, शराब दो अनजान लोगों को साथ ला सकती है, लेकिन दोस्ती जैसे रिश्ते के लिए कुछ और भी जरूरी होता है।
जैसा कि मैंने पहले भी बताया की, दीपक उम्र में मुझसे काफी बड़े थे। वे जब कॉलेज में थे, तब से ही सामाजिक कार्यों में जुड़ हैं | बनासकांठा दलित संगठन ने उनकी क़ाबिलियत को पहचाना और उन्हें निखारा भी। आदिवासी समुदाय से आने वाले दीपक अपने परिवार के उन सदस्यों से अलग थे जो सरकारी नौकरियों में थे,उन्होंने एक अलग दिशा में आगे बढ़ने का फैसला किया। दीपक ने कई आंदोलनों में हिस्सा लिया और वे सरकार के खिलाफ बोलने वालों में से एक निडर व्यक्ति थें । उन्होंने पुलिस की लाठियां और एक-दो बार हवालात की हवा भी खाई, फिर भी उनका ज़ज़्बा बरकरार रहा। आगे चलकर दीपक ने ‘आदिवासी सर्वांगी विकास संगठन’ की स्थापना की, जो आज उत्तर गुजरात में अपना प्रकाश फैला रहा है।
मुझे लगता है, इतना ही काफी है दीपक के भूतकाल के बारे में बताने के लिए। हाँ, निश्चित रूप से कुछ पंक्तियों और शब्दो में उनकी उपलब्धियों को समेटना मुमकिन नहीं हैं, लेकिन इस लेख का और मेरा मकसद वह है भी नहीं। मैं लेख के माध्यम से दीपक के निजी जीवन के कुछ पल साझा करना चाहता हूं।
दीपक से जो भी मिला होगा, वह जब भी उन्हें याद करेगा, तो एक हंसता हुआ चेहरा दिमाग में आएगा। जीवन में कितनी भी बड़ी मुसीबत आई, दीपक ने हंसते हुए उसका सामना किया। जब वह गुस्सा भी होते, तब भी कुछ ही पलों के बाद वह वही हंसता चेहरा होता, जिनसे कोई ज्यादा समय नाराज नहीं रह सकता था।
तीन साल पहले जब मैंने एक एनजीओ जॉइन किया, तब मुझे तीसरे दिन ही दीपक के पास दांता (बनासकांठा जिले का एक तहसील) भेजा गया। मैं काफी असमंजस में था क्योंकि इससे पहले मैंने कभी आदिवासी क्षेत्र में काम नहीं किया था। जब मैं दांता के बस अड्डे पर पहुंचा, तो मैंने दीपक को कॉल किया और ऑफिस का पता पूछा। उन्होंने कॉल काट दिया, और मैं अपने बैग के साथ बेंच पर बैठ गया, यह सोचते हुए कि कहाँ फंस गया हूं। दस मिनट बाद एक व्यक्ति बाइक पर आया, हाथ में सब्जियों की थैली और बाइक पर कुछ बैग बंधे हुए थे। वह मेरे पास आया और बोला, “आप क्यों चलकर आओगे, मैं ही आपको लेने आ गया।“ मैं उनके पीछे बैठा और उन्होंने तेजी से बाइक भगाई। उस पल में जो दीपक का हंसता हुआ चेहरा देखा था, वही चेहरा मैंने इस महीने जब उन्हें आखिरी बार मिला, तब भी देखा।
पूरा दिन उनके साथ बिताने के बाद, शाम को मुझे लगा कि ऐसा नहीं हो सकता कि मैं इस व्यक्ति से पहली बार मिला हूं। लेकिन यह उनकी काबिलीयत थी, जो मेरे जैसे अंतरंगी और अंतर्मुखी व्यक्ति को भी सहज कर देती थी। रात हुई, तो दीपक ने मुझसे पूछा, “आप लगाते हो?” मैं क्या जवाब देता? मैं गुजरात के उस हिस्से से आता हूं, जहाँ शराब पीने वालों को शक की नजर से देखा जाता था, और उनकी कोई इज्जत नहीं होती थी। वैसे भी, मेरा पहला हफ्ता था संस्था में। फिर भी, रात की थकान और आदिवासी विस्तार की महुआ की शराब की सुनी हुई बातें मुझे ‘हाँ’ कहने पर मजबूर कर गईं। हम पहुंचे जंगल के बीच एक झुग्गी में। दीपक और उनका एक दोस्त शुरू हो गए। मैंने पहले तो शरीफ बनने की नाकामयाब कोशिश की, लेकिन एक-दो गिलास के बाद मैं भी अपने पर आ गया। मैंने इतनी पी ली थी कि मैं ठीक से खड़ा भी नहीं हो पा रहा था। खाना खाने की तो बात ही छोड़ दें। मैंने दिन में उन्हें बताया था कि मैं शाकाहारी हूं, इसलिए उन्होंने हरी सब्जी बना रखी थी। उन्होंने जबरदस्ती मुझे खाना खिलाया और उठाकर बिस्तर पर डाल दिया। सुबह जब मैं उठा, तो एहसास हुआ कि अब तो मेरी इज्जत गई। दीपक अब सब को बता देंगे कि रात को क्या-क्या हुआ। लेकिन जब मैं ऑफिस पहुंचा, तो देखा फिर वही हंसता हुआ चेहरा, रात की कोई बात नहीं, कुछ भी नहीं।
दीपक वह शख्स थे जिन्होंने मुझे आदिवासी परंपराओं से वाकिफ़ कराया, रीति-रिवाज समझाए जो आगे चलकर मेरे लिए वरदान साबित हुए। समय के साथ हमारी दोस्ती गहरी होती गई, जो उनके जाने तक बरकरार रही।
दीपक ने जीवन में काफी संघर्ष देखे, लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी। आज भी आप दांता या अमीरगढ़ के इलाकों में जाएंगे, तो जान पाएंगे कि दीपक कौन थे। उनके ऑफिस में सामान्य गरीब आदिवासियों से लेकर सरकारी बाबू, पुलिस, व्यापारी और गुजरात के सामाजिक कार्यकर्ताओं तक की भीड़ रहती थी। उत्तर गुजरात में दीपक के साथ जो बहुजन क्रांति की मशाल जल रही थी, वह आज बुझने के कगार पर है। दीपक ने पूरा भार अपने कंधों पर ले रखा था और इस कथन में जरा भी अतिशयोक्ति नहीं है।
अंतिम जोहार,
प्रिय मित्र
दिनांक 23/08/2024 को उत्तर गुजरात के आदिवासी कार्यकर्ता दीपक डाभी का दिल का दौरा पड़ने से उनका देहांत हो गया है। इनके जीवन और मेरे उनके साथ रहे अनुभव पर मैंने लिखा हुआ एक लेख आपके साथ साझा कर रहा हूँ ।
दीपक डाभी सांढोसी गाँव, बनासकांठा (गुजरात) के रहने वाले थे | वे सामाजिक कार्यकर्ता थे एवं आदिवासी सर्वांगी विकास संगठन के सचिव थे, साथ ही वे पश्चिम भारत मजदूर अधिकार मंच के संयोजक भी थे

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