आफ़ाक़:
बनारस से महाज़ 30 किमी की दूरी पर गंगा नदी किनारे आबाद एक शहर है चुनार। यह मुगलसराय रेलवे स्टेशन और मिर्जापुर के बीच छोटा सा रेलवे स्टेशन भी है, जहाँ से ट्रेन तो बहुत गुज़रती हैं पर रूकती नहीं हैं। गंगा के किनारे बसा यह छोटा सा कस्बा, मिर्जापुर जनपद का हिस्सा है। चुनार को पत्थर के सामान, कप, प्लेट, आदि बर्तनों के लिए जाना जाता रहा है। यहाँ पत्थर से बने इन बर्तनों को बनाने वाले सैकडों कारीगर हैं, जिनके बनाये बर्तनों का एक ज़माने में बोलबाला हुआ करता था। अभी भी इनके हाथों तराशे पत्थरों के बर्तनों की कीमत बहुत है। आज यह कारीगर ज़्यादातर प्लास्टर ऑफ पैरिस से बर्तनों को बना रहे हैं, लेकिन प्लास्टर ऑफ पैरिस से बने बर्तनों में चुनार के पत्थर से बने बर्तनों जैसी बात नहीं है। यह कारीगर अभी गंगा नदी पार कर नए रोज़गार की तलाश में पलायन कर रहे हैं।

यहाँ गंगा नदी के किनारे एतेहासिक चुनार किला है। जिसके संबंध में विकिपिडिया करने पर बहुत तरह की जानकारी मिल सकती है। इस किले पर बैठ कर आप गंगा नदी से इस किले के रिश्ते को महसूस कर सकते हैं कि किस तरह से यह नदी और किले के साथ कस्बे का रिश्ता है। यह चुनार किला बहुत शानदार है। इसके पत्थरों को देखकर यहाँ की विरासत और हस्तकला को समझा जा सकता है। किले के मुख्य दरवाज़े के सामने एक अंग्रेज़ों का कब्रिस्तान हैं, जिसको ग्रेवयार्ड कहा जाता है। यहाँ कब्रों को देखकर और पढ़कर पता चलता है कि यहाँ उच्य कोटी के अंग्रेज़ अफ़सरों की कब्रे हैं, जिसका अभी कोई पुर्से-हाल लेने वाला नहीं है। उस सल्तनत के यह अफ़सर थे जिसका सूरज डूबता नहीं था। उस ब्रिटिश सम्राज्य को सींचने-सवारने वाले इन असफरों की कब्रों की गोदी में बैठकर हमारे यहाँ के बच्चे पार्टी कर रहे हैं। इन अफसरों के बच्चे आज जहाँ होंगे, वह उम्मीद के हिसाब से कुछ बड़ा ही कर रहे होंगे। यहाँ गंगा की गोदी से उनके पूर्वज उनको दुआ जो कर रहे हैं इसलिए तो इनको यहाँ दफनाया गया था, नहीं तो क्या वह सोना चाँदी के साथ अपने पूर्वज ना ले जाते?

इसी छोटे से कस्बे में संध्या मैम और मिथलेश सर भी रहते हैं, जो लगभग 40 साल पहले बिहार से बनारस होते हुए इस कस्बे के होकर रह गए। यहाँ इन्होंने सामाजिक, सांस्कृतिक और शैक्षणिक कामों की शुरुवात शिखर प्रशिक्षण संस्थान के साथ कीI इनके शुरुवाती दिनों के कामों के साथी इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्र धीरेंद्र प्रताप सिंह मिले जिनके साथ चुनार और मिर्ज़ापुर में काम की शुरूवात हुई थी। संध्या मैम और मिथलेश सर जब से यहाँ आये यहीं के होकर रह गए। इनके चश्में से चुनार, मिर्ज़ापुर को समझने में यहाँ की बसाहट, सांस्कृति, लोगों का जीवन और जल-जंगल-ज़मीन से लोगों के संबंधों को बहुत सहजता से समझा जा सकता है। पहाड़िया ब्लॉक से लेकर राजगढ़ तक इनका संबंध है। लोग इनके साथ आत्मीय रिश्ते से मिलते है, इनसे प्रेम करते हैं।
चुनार में एहसास होता है, जैसे आप धीरेंद्र प्रताप सिंह सर की गोदी में खेल रहे हों। इलाहाबाद से बनारस, चुनार, चंदौली यह जगह अपने गुरू की बगिया है। यहाँ उनके साथ के जो पौधे थे अब पेड़ हो गए हैं। जिसकी छाया में कोई भी मुसाफिर सुकून की सांस ले सकता है। बिना लोकल यात्रा के साधनों का इस्तेमाल किए हुए किसी जगह को समझना मुश्किल काम है। यात्रा किसी भी व्यक्ति के जीवन को बनाने में बहुत ज़रूरी काम करती है। ठहरे हुए पानी, ठहरे हुए समाज में सड़न पैदा होती है। हमारा-आपका काम है आने वाली पीढ़ी के लिए सीखने-समझने के लिए यात्राओं के लिए अवसर बनाये, नहीं तो मिर्ज़ापुर जैसे हर गाँव से लगभग शत फीसदी पुरुषों का पलायन होगा… जिससे अपनी समृद्धशाली प्राकृतिक विरासत को सजोने की बजाए यहाँ कुछ नहीं है की ही बातचीत ज़ारी रहेगी।

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