शिवांशु: 

मुझे याद है हम शहर में रहते थे और अपने गाँव कभी-कभी जाते थे। फिर एक दिन पापा हम लोग को अचानक हमेशा के लिए गाँव ले आये। इससे पहले हम लोग गाँव बस दिन भर के लिए कभी-कभी आते थे। मुझे याद है जिस दिन हम सब गाँव पहुंचे वो दिन बहुत अच्छा गुजरा, फिर धीरे-धीरे शाम होने लगी। गर्मियों की शाम थी। शहर में शाम में चारो तरफ उजाला होता था, लेकिन यहाँ गाँव रात के साथ अंधेरे में डूब गया और कहीं-कहीं हल्की सी लालटेन की रौशनी दिखती थी। जैसे ही थोड़ी रात और हुई आस-पास से किसी की बहुत जोर से रोने की आवाज़ें आने लगीं, जो धीरे-धीरे बढ़ती गई। मैं घर के बाहर ही था, जैसे आवाज़ें बढ़ीं मैं चिल्लाते हुए घर में घुस गया और रसोई में जाकर मम्मी के पीछे दुबक कर डर के मारे कांपने लगा। मम्मी ने दुलराते हुए पूछा, “क्या हुआ?” मैं चुप रहा मम्मी के बहुत बार पूछने पर मैंने बताया कि किसी के रोने की ज़ोर से आवाज आ रही है। फिर मम्मी ने हँसते हुए कहा कि ये सियार बोल रहा है। ऐसा तो रोज़ ही होता है, इसमें डरने की क्या बात है। लेकिन मेरे लिए ये एकदम नया था।

मैंने मम्मी से कहा, “सियारों को यहाँ से भगा दीजिये तो मैं सो जाऊँ।” मम्मी ने बहुत समझाया लेकिन मैं सियार को मार के भागने की बात पर अड़ा रहा। आधी रात तक सियार चिल्लाते रहे और मैं कहता रहा कि सियार को मार के भगा दो, तो सो जाऊँ। माँ कहती कि सियार को कैसे भगाउँ? खैर जब सुबह के समय सियार बोलना बन्द किये तो जाकर मैं सो पाया। अब ये सिलसिला रोज चलने लगा। मैं दिन भर खेलता और दोपहर के बाद से ही डरने लगता की रात होगी तो क्या होगा? मेरी रातें बड़ी मुश्किल में कटती, पूरी रात जागते हुए, डरते हुए कटने लगी। मैं रोज़ मम्मी से, भाई से सियार को मार के भागने को कहता। 

ऐसा लगभग महीनों चला फिर एक दिन ये बात बाबा जी को पता चली और फिर बाबा ने शाम से ही अपने पास मुझे लेटने को बुला लिया कहा कि कहानी सुनाएंगे और सियार को मार के भगा भी देंगे। मैं बहुत खुश होकर बाबा के पास शाम से ही सोने चला गया। रात गहरी हुई और जब सियार बोलने लगे तो मैंने बाबा से जिद करने लगा, “चला सियार को मार के भगा देते हैं।” बाबा ने कहा कि पहले एक कहानी सुन लो फिर सुबह मार कर भगा देंगे। बाबा ने कहानी सुनाई कि जैसे हम लोग दिन में एक दूसरे से बात करते हैं, ऐसे ही सियार रात में आपस में बात करते हैं। जब हम बात करते हैं तो सियार को तो डर नहीं लगता, वो तो हमें मार के नहीं भगाते। फिर जब सियार बात करते हैं तो तुम क्यों कहते हो कि उनको मार के भगा दो। मैंने कहा मुझे डर लगता है। बाबा ने कहा सियार को पता चलेगा कि तुम सियार को उसके ड़र से भागने की बात कर रहे तो उसे कैसा लगेगा? तुमको अपने घर से भगा दिया जाए तो कैसा लगेगा? मैं कुछ देर चुप रहा फिर कहा कि बहुत बुरा लगेगा। मैं कहाँ सोऊंगा? 

फिर बाबा ने आधी रात तक मुझे सियारों के परिवार और उनके रहन-सहन उनके बच्चों के बारे में ढेरों कहानियां सुनाई और अगली सुबह मुझको सियार का घर और बच्चा दिखाने के लिए ले गए। मैंने पहली बार सियार की मांद (घर) देखी और हमें देख के सियार के बच्चों को भागते हुए देखा। बाबा ने समझाया कि जैसे सियार हमको नुकसान नहीं पहुंचता, ऐसे ही हमें इनको भी नुकसान नहीं पहुंचना चाहिए। हम सबको मिल-जुल कर रहना चाहिए। इसके बाद से जब भी सियार रोता तो मैं अपनी छोटी बहन को समझाता देखो वो सियार अपनी बहन से लड़ रहा है।

Author

  • शिवांशु, उत्तर प्रदेश के गोंडा ज़िले के रहने वाले हैं। शिवांशु अलग-अलग सामाजिक संस्थाओं के साथ पिछले 6 वर्षों से बच्चों की शिक्षा और पुस्तकालय विकास पर काम कर रहे हैं। हाशिए के समुदायों के युवाओं और बच्चों तक शिक्षा पहुँच सके इस बात को सुनिश्चित करने के लिए लाइब्रेरी एजुकेशन, पियर एजुकेशन आदि शैक्षणिक करिकुलम बनाने का काम करते हैं। शिवांशु अवध यूथ कलेक्टिव के साथी हैं और गोंडा में सरयू फाउंडेशन के डायरेक्टर हैं।

    View all posts

Leave a Reply

Designed with WordPress

Discover more from युवानिया ~ YUVANIYA

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading