मो नसीम / आफाक: 

अप्रैल के महीने में महुआ चुना (गिरना) शुरू हो जाता हैं। जब महुआ पेड़ पर आता है, तो सारी पत्तियाँ पेड़ से झड़ जाती हैं, पेड़ पर सिर्फ महुआ ही महुआ होता है। उसके बाद कलियाँ निकलती हैं, फिर उसमें पीले-पीले बल्फ नुमा गुच्छे निकलते हैं जो रात भर महुआ पेड़ पर चाँद की रोशनी में छोटे-छोटे बल्ब की तरह से टिमटिमाते रहते हैं। सुबह महुआ के पेड़ के नीचे मानो पीली चादर सी बिछ जाती है। ज़्यादातर महुए भोर होने तक चू जाते हैं। कुछ ऐसे होते हैं, जो पेड़ से दिन भर चूते रहते हैं। 

उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर शहर से बिलकुल सटा हुआ एक गाँव है पैगापुर। यहाँ एक बहुत बड़ा बाग है जिसमें तकरीबन 20-25 महुआ के पेड़ होंगे। हर एक पेड़ 60-70 साल पुराना है, हर एक पेड़ के कई हिस्सेदार हैं। महुआ चुनने के लिए एक की पारी आज होती है, तो कल दूसरे की पारी होती है। एक शहरी व्यक्ति ने महुआ की पारियाँ लगने वाली बात पर कहा कि यह लोग मिलकर क्यों नहीं सारा महुआ चुने और फिर बाद में बराबर से महुआ बाँट ले। या फिर जितने पैसे का महुआ बिके उस पैसे को ही आपस में बाँट ले। इससे किसी को तकलीफ़ नहीं होगी और कोई झगड़ा-झंझट भी नहीं होगा। लेकिन लोग बहुत ही समझदार हैं। यह जानते हैं कि अगर एक साथ चुनेंगे तो हमने ज़्यादा चुना, तुमने कम चुना। फिर ये हिस्सा ज़्यादा, ये हिस्सा कम, यानि तू-तू मैं-मैं और ज़्यादा होगी। काम भी नहीं करेंगे और अपना हिस्सा भी ज़्यादा चाहेंगे। इसलिए इन सब झंझटों से बचने के लिए आज उसकी पारी, कल मेरी पारी का आनन्द लेकर महुआ चुनना ज़्यादा सही प्रक्रिया हैं। उसकी कल्पना कोई और (न चुनने वाला) नहीं कर सकता है। 

इस काम में घर के बड़े-बूढ़े, औरतें और बच्चे सब मिलकर काम करते हैं। महुआ चुनते समय अगर आप किसी को देखेंगे तो लगेगा कि कोई खिलौना ज़मीन पर चाबीनुमा गुड्डे की तरह खिसक-खिसक कर महुआ चुन रहा है। जैसे मानो महुआ नहीं सोना-चाँदी चुन रहे हों। महुआ बहुत कीमत का नहीं होता, एक पेड़ से लगभग 8 से 10 हज़ार रुपये का महुआ ही चुना जा पाता है। फिर उसेक हिस्सेदार जो हों, उन लोगों में पारी के हिसाब से इसे बाँटा जाता है। अब हर एक पेड़ के 4-5 हिस्सेदार अमुमन होते ही हैं। तो अपने चुने हुए महुआ की कीमत लगभग 2 हजार रुपया ही होती है। 

पूरी लगन के साथ लगभग दो हफ्ते तक पूरी रात रोशन दूधिया रोशनी में घर के बड़े और बच्चे महुआ चुनते हैं। कुछ लोग रात में जल्दी इसलिए आते हैं, ताकि वो हर एक पेड़ से महुआ बीन  लें। सुबह जब पारी के हिसाब से पेड़ और महुआ का मालिक आता है, तो चिल्लाते है कि कौन उसका महुआ बीन ले गया है। ज़्यादातर मामलों में एक ही परिवार के लोग एक दूसरे की पारी में घुसकर महुआ चुन लेते हैं। जिसके हिस्से का महुआ चुना जाता हैं। उसको पता होता हैं कि किसने उसका महुआ चुना हैं। जो चुना होता हैं, वह भी जनता है कि सामने वाला जान गया हैं। फिर भी कोई किसी को सीधे नहीं बोलता, हाँ अपना महुआ चुन जाने के दुख में दिन भी बड़बड़ता ही रहता है। यह भी सोचता हैं, कल मैं भी दूसरे की पारी में जाकर महुआ चुन लाऊंगा। पर नींद की गफलत में वह ऐसा कर नहीं पता है। 

यह सिलसिला ऐसे ही चलता रहता है। कभी-कभी पारी के हिसाब का मालिक समय से पेड़ के नीचे आ जाता है और महुआ चुनने की ताक में बैठे लोगों का आमना-सामना हो जाता हैं। तू-तू, मैं-मैं के बीच महुआ बीनने का काम चलता रहता है। महुआ चुनने के चक्कर में बच्चे स्कूल छोड़ देते हैं। 

जितने दिन महुआ बीनने की प्रक्रिया चलती हैं। गाँव में दिलचस्पी बनी रहती हैं। इस दौरान ग्रामीण परिवेश में आपसी रिश्तों की गर्मी को समझा जा सकता हैं। जिसमें प्रेम, चालाकी, सहयोग और हमारा-हमारा के साथ मीठी-मीठी नोक-झोक के बीच ज़िंदगी चलती रहती है। महुआ का पेड़ अपने मालिकों के अलावा अन्य लोगों को अपनी सुगंध से सुगंधित करता है। अपनी पत्तियों से जानवरों का पेट भरता है। पेड़ के नीचे बच्चे खेलते हैं और बड़े-बूढ़े ठंडी हवा का आनंद लेते हैं। यही हैं हमारा सुंदर प्यारा ग्रामीण जीवन। 

Authors

  • मो नसीम शिक्षा के क्षेत्र में काम करते हैं। बच्चों को पढ़ना और नवीन तकनीक से सीखना-सिखाना इनको बहुत पसंद हैं। जनपद सुल्तानपुर के रहने वाले हैं। शिक्षक के साथ-साथ यह बहुत अच्छे पेंटर-आर्टिस्ट भी हैं। एक सामाजिक शैक्षणिक कार्यकर्ता के तौर पर अपने समुदाय में पहचाने जाते हैं।

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  • अफ़ाक, फैज़ाबाद उत्तर प्रदेश से हैं और सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़े हैं। वह अवध पीपुल्स फोरम के साथ जुड़कर युवाओं के साथ उनके हक़-अधिकारों, आकांक्षाओ, और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दों पर काम करते हैं।

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