जितेन्द्र वसावा:

यह लेख कुछ वर्षों पहले लिखा गया है

ज़्यादातर तारणों में से भीलों की होली विषयक मान्यतायें आज भी प्रचलित है, और परंम्परा के रूप में चल रही हैं। बालक्रिड़ा, काममय प्रेम, अश्लील गीत यह सब देखते ही भारत भर में प्रचलित होली उत्सव की धार्मिक मान्यताओं में भीलों की होली विषयक मान्यता के अंश सुक्ष्म तरीके से देखने वालों को दिखाई देता है। क्योंकि आर्यो ने द्रविड़, पुलिंद, निषाद या भील जैसी आर्योत्तर संस्कारी प्रज्ञा से विरासत मिली थी। वही मूलभूत रूप से हिन्दु धर्म की धार्मिक, सामाजिक और सांस्कतिक नींव गिनी जाती हैं। 

भील होली को ओलीबाई कहते हैं। एक किम्वदन्ती है कि वे सात बहनें थी और दाबना राजा की लड़कियां थी। उसमें दोहरी दीवाली, ओली, याहा, रानी काजोल वगैरह नाम मिलते हैं। इन सभी के पास दाब मंडल के सात छोटे-छोटे राज्यों की जवाबदारी थी। रानी काजोल के पास बरसात और पानी विषयक ज्ञान था। याहा के पास अन्न और खेती का ज्ञान था। उसी प्रकार होली के पास प्रेम, शृंगार और संसार जीवन का ज्ञान था। कहा जाता है कि ये सभी बहनें सात राज्यों की प्रजा  को अपने ज्ञान से मार्गदर्शन देती और इसी वजह से प्रजा  को उनके प्रति आदर भाव था। उसमें से उनको माता का स्थान लोगों ने दिया था। ओली बाई उनका ज्ञान बच्चों और युवाओं में बांटती थी, उस गाँव के बच्चों को प्रेम-संसार के जीवन की बातें बताती थी। आज जिसे हम अश्लील समझते हैं, उस भाषा में वह बच्चों को गीत गवाती थी। यह देखकर गाँव वालों ने उसे जलाकर मार डाला था। इसलिये दाबना लोगों को इन सात राजाओं ने दण्ड की फटकार लगाई थी और हरेक गाँव में होलीबाई की मरणविधी उत्तर क्रिया का प्रसंग हर वर्ष मनाने का कहा गया, जो आज के दिन तक चल रहा है, ऐसा माना जाता है। 

बालकों और अष्लीलता का संदर्भ – भविष्योत्तर पुराण में भी मिलता है। उसमें एक कथा ऐसी है – युधिष्ठिर ने कृष्ण को पूछा कि फागूनी पूर्णिमा को प्रत्येक गाँव तथा नगर में एक उत्सव क्यों होता हैं? सभी घरों में बालक क्रीड़ामय क्यों दिखते हैं? और होलिका क्यों जलाते हैं? उसमें कौन से देवता की पूजा की जाती है? और किसने इस उत्सव का प्रसार किया? कृष्ण ने युधिष्ठिर को राजा रघु विषयक एक दंत कथा किंवदन्ती कही। द्रोण्का नामक एक राक्षसी बालकों को रात-दिन डराती थी, उसे शिव का वरदान प्राप्त था। किंतु ग्रीष्मऋतु में लोग हंसे, आनंदित हो, बच्चे लकड़ी, घास-फूस इकट्ठा कर आग लगाये, तालियां बजाएं, तीन बार प्रदक्षिणा करे, हंसे और अपनी प्रचलित भाषा में अश्लील गीत गायें, तो इस शोरगुल और हंसने से राक्षसी मर जायेगी, ऐसा शिव ने कहा था। इसलिए इस संदर्भ पर से ऐसा कह सकते है की पुराणकाल पूर्व की संस्कृति में होली संबंधित बालकों और अष्लील गीतों का महत्व देखने को मिलता है। 

लिंगपुराण में भी जानकारी है कि वह बाल क्रीड़ाओं से पूर्ण और लोगों को ऐष्वर्य देने वाली है। काठकगुटय 73 9 में भी एक सुत्र है। राका होलक उसकी व्याख्या टीकाकार देवपाल ने इस तरह कही है। होला एक कर्म विशेष है जो स्त्रियों के सौभाग्य के लिये सम्पादित होता है। इस कृत्य में राका पूर्णचन्द्र देवता हैं। वराहपुराण में है कि यह पटवास- विलासिनी चूर्ण से युक्त क्रिड़ाओं वाली हैं। आरंभ का शब्दरूप होलका था। और वह भारत के पूर्वी भागों में प्रचलित था। जैमिनिः 1‘3‘15.16 जैमिनि और काठकग्रहय में हुए वर्णनों को देख कर कह सकते हैं कि इसकी शताब्दियों पूर्व से होलका का उत्सव प्रचलित था। कामसूत्र और भविष्योत्तर पुराण उसका वसंत ऋतु संबंधित रिश्ता नापता है। यानि की यह उत्सव पूर्णियों की गणना अनुसार वर्ष के अंत में होता था, और वंसतऋतु की काम प्रेममय  लीलाओं का द्योतक है। धर्मशास्त्र का इतिहास पृ 85 से 80 

उपरोक्त संदर्भो से स्पष्टरूप से कितने अनुमान निकाल सकते हैं-

1. आरंभ का शब्द होलका था। वह पूर्ण भारत में प्रचलित था। 

2. होली- उत्सव में बालक्रीड़ाओं और जातीयता जताते हुए गीतों का विषेश महत्व है। 

3. होली स्त्रियों के सौभाग्य के लिये उद्यपान मनाने का त्यौहार है।

4. वह लोगों को ऐष्वर्य देने वाली और काम-प्रेममय लीलाओं की द्योतक हैं।

5. होली पुराणकाल पूर्व इसकी सदियों पूर्व चलता आ रहा है, और एक लोक प्रचलित उत्सव है। 

उपर के अनुमान और भील आदिवासी की होली विषयक मान्यताओं को देखते हुए कितने ही तथ्य हमारे सामने उभरकर आते हैं।

काण्डया – भीलों में काण्डया का बहुत ही महत्व है। देवमोगरों मेले के बाद, पंद्रह दिन के अंदर उनकी परम्परा के अनुसार बाल खेले और लोले होली गीत गाकर बड़े ढोल के साथ नाचना करते है। इसी परम्परा के अनुसार वे डाडां को होली जगह लगाते है। गाँव या सीम में से बड़ा अरेडा खोज कर गाँव का पुजारा छोटे बालकों के साथ उसको काटकर ले आते हैं। उसके साथ ही आज जिसे हम अश्लील कहते हैं, वैसे शब्दों में कीकीयारी चिल्लाने की एक आवाज़ बनाते हैं, निकालते हैं। गीत-गाते हैं। सारे गाँव के बालक इस काण्डया के आसपास कंडे, लकड़ी रखकर अपना पूरा साल अच्छा, निरोगी जाए ऐसी भावनाओं से उसके साथ संवाद करते हैं। इस काण्डया के स्थापना के बाद पूरे गाँव में सतत पंद्रह दिन तक होली की तैयारी के रूप में खेलने, गीत, नाचने, होली के लिये ज़रूरी सामग्री इकट्ठी करने का काम पूरे जोश में चलता है। इस काण्डया के स्थापन में बालकों का विषेश महत्व होता है। जिसके अंश भीलों की होली में देखने को मिलता है। लिंगपुराण में भी आता है कि वे बाल-क्रीड़ाओं से पूर्ण और ऐष्वर्य देने वाली है। 

होली का डाण्डा- काण्डया की स्थापना के बाद पंद्रहवें दिन गाँव का पुजारा सुबह के प्रहर में आसपास के जंगल में तीन-चार व्यक्ति, बालक, युवाओं के साथ होली लेने जाते हैं। बांस के सांग सागर का सोटा पूजा-विधि करके काट के मानपूर्वक उठाकर लाते हैं। इस होली के सोटे को पवित्रता से ज़मीन के उपर खड़ा रखा जाता है। जंगल में कहीं भी थोड़ी देर का हो वहाँ पर भी उस सोटे को ज़मीन के उपर आड़ा नहीं रखा जाता। शाम को पूरा गाँव नये कपड़ों में उजला-उजला घुमता हुआ जाता है। दिन डूबे उससे पहले ही होली के ढोल बज जाता है। गाँव का पुजारा आगवेन और बड़े होली का सोटा रोपने की विधि में लगे रहते है। 

डूडली और बाल क्रिडाएंः- 

होली पूजन विधि चालू हो उसी समय गाँव के छोटे बालक-बालिकाओं की दो टीम पूरे गाँव में होली का फाग के रूप में गुड़, खोपरा, खजुर चंदे के रूप में लेते हैं। ये टीम पूरे गाँव में घर-घर घूमकर गीत गाकर, नाच-कूद कर फाग लेते हैं। उनके गीतों में हंसी-मजाक भरपूर देखने को मिलता है। पूरे गाँव में होली जलाने से पहले लिया हुआ फाग की प्रवत्ति को डूडली कहा जाता है। फाग लेने के बाद सभी बालक कोई एक जगह पर साथ में बैठ कर लिए हुए फाग को आपस में बांट कर खाते हैं। 

मोरा नाच:-

होली जलाने के दिन, एक तरफ पुजारा और आगेवान होली की पूजा कर बालक डूडल में घूमे उसी समय गाँव के युवा एक जगह इकट्ठा होकर ढाक, तांसा के वांद्ययंत्र के साथ अलग-अलग नकल कर नाचते हैं। ढोंग करते हैं, और एक आदिम वातावरण खड़ा करते हैं। तरह-तरह के जानवरों के मुखौटे को पहनकर वे ढाक, तांसा के सामने आजू-बाजू घूम-घूम कर नाच-कूद करते हुए जानवरों का स्वभाव प्रकट करने का प्रयास करते हैं। इस नाच से बच्चे भयभित होकर उसी जगह खड़े रहते हैं। 

आखिर में इस प्रकार के आदिम वातावरण में गाँव के ढोली बड़ा ढोल लेकर होली के मैदान में उतरते हैं। स्त्रियों के नाच-गान और ढोली के अलग-अलग नकलों के साथ पूरा वातावरण में उल्लास बना रहता है। यह सारा प्रसंग रात्री के दो-तीन बजे तक सतत चलता रहता है। किसी भी प्रकार की थकान के बगैर यह नाच-गान चालू रहता ही है। आखिर में पुजारा होली की पूर्ण विधि कर होली को आग लगाते हैं। उसी समय ढोली का ढोल स्त्रियों के नाच-गान, मोरां नाच, छूटक कूदने में कीकीयारी, अश्लील गीतों के साथ होली के रंग दूगूना देने हैं। 

होली सुलगकर गिरे उसके पहले उसको पकड़ते हैं और उसके पिछले हिस्से को काट कर गोसाणां के गेरीया को सौंपते हैं। होली का आट सुलगती होली में डालकर उसकी राख से तिलक कर अलग होते हैं। गाँव के लोग होली की जगह से घर चले जाते हैं। उस समय होली की रखवाली के रूप में कुछ पुरुष वहीं रुकते हैं।

होली विषयक एक ऐसी मान्यता है कि होली के मां-बाप का नाम जो जानता है और उसकी सवा महीने उपासना करता है, वे लोग सुलगती होली के उपर से चलकर निकल सकते हैं। कितने ही वृद्ध लोगों के होली में से सुलगता कोयला खाने के किस्से होते हैं।  

पाणा पर्व –

आज जिसे हम धूलेंडी के रूप में जानते है उसे भील पाणां पर्व के नाम से मनाते हैं। इस दिन की खास विषेशता यह है कि उस दिन मामा-बुआ के लड़के-लड़की, देवर-भोजाई, साली-जीजा, इस प्रकार के पात्र एक-दूसरे पर प्रेम प्रकट करने के प्रतीक रूप टेसरू के फूल का रंग छाँटते हैं। उनकी ये रंग छांटने की परम्परा बहुत ही विशिष्ट है। वे इसके सिवा अन्य लोगों पर रंग का एक छींटा भी नहीं डालते। इस प्रकार की रंग छाटंने की परम्परा में से हंसी-मजाक करना सामान्य माना जाता है।

इस दिन गाँव के लोग होली के पर्व को मनाने गेहूं से बनी सेव; मुर्गी, बकरे का मांस; आदि खाना बनाकर सभी परिवार के लोग साथ में मिलकर खाते है और आनंद में रहते हैं।

गोसाणां और गेरूचा-

गोसाणां यह एक प्रकार का समूह नाच है। पशु-पक्षियों के विचित्र प्रकार के मुखौटे पहन कर उसी प्रकार की स्वभावगत लाक्षणिकताओं को प्रकट करके आदिम वातावरण खड़ा करते हैं। कल्पना से बाहर के आदिम स्वरूप वेष धरकर इस नाच में पुरुष हिस्सा लेते हैं। ढाक और तांसा के ताल के साथ नाच को गोसांणा कहते हैं। उसमें घोड़े, बैल, मच्छीमार, दूध बेचने वाला के वेष लेकर उस प्रकार की नाचना द्वारा स्थिती का निर्माण करने में आता है। गोसाणां के नाच में करीबन पच्चीस से सौ लोगों की संख्या होती है। जबकि गेर गेरया में बड़ा ढोल और कांसी के साथ स्त्री-पुरुष शामिल होकर गीत गाते हुए नाचते हैं, जिसमें इंसान जनों में अलग डांस ग्रुप की विषेशता देखने को मिलती है। इन दोनों प्रकार के नाच समूहों में कितने युवा, वयोवृद्ध, स्त्रियों के वेष लेकर नाचते हैं। 

दशहरा आता है, जाता है, दीपावली के दीपक जलकर बुझ जाते है, किन्तु होली का उत्सव पूरे वर्ष चर्चा का विषय बन जाता है। कोई युवा लड़का अपनी मूछ निकाल दे औैर लड़की का वेष धारण कर पूरे गाँव में घूमे, ये आश्चर्य की बात है। कोई अधेड़ उम्र का पुरूष कोई मछली पकड़ने जा रही स्त्री का वेष लेकर आछवी हाथ में रखकर नाचे, यह बात वर्ष पूरा होने तक चलती है। ऐसा वेष धारण करना होली की विषेशता है।

पांचम –

पांच दिन के गोसांणा और गेरूचा के नाचने के बाद आखिर पाँचवें दिन अपने गाँव में नाच-कूदकर होली को पूर्ण करने में आता है। उस दिन एक छोटी होली सुलगाकर उसे पानी डालकर बुझाकर होली पूर्ण हो गई ऐसा जाहिर करते हैं।

फीचर्ड फोटो आभार: पत्रिका

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