दामोदर सिंह हंसदा:

हो आदिवासी समाज में सभी पर्व मानव जन्म के साथ जुड़े हुए हैं। पोरोब-पोनाई (पर्व त्यौहार) को हम दो भाग में बाँटते हैं।

I. दोरोम (धर्म) यानि मासिक धर्म के आधार पर 

II. दोस्तुर (कर्म) के आधार पर 

मासिक धर्म के आधार पर दो पर्व – “मगे” और “बाह” मानते हैं। मगे का अर्थ मासिक धर्म है। इसको पर्व के रूप में आठ दिन तक मनाते हैं।

हो समाज में ‘बाह परब’ मनाया जाता है, जिसका होली के साथ कोई सम्बन्ध नहीं है। बाह परब सृष्टि के साथ जुड़ा हुआ महान पर्व है, जिसमें नारी शक्ति की पूजा की जाती है। “बाह” का अर्थ है फूल, अर्थात मासिक धर्म के चले जाने के बाद गर्भाशय (फूल) पूरी तरह से खिल जाता है। इसी ख़ुशी में कि अभी तो नारी पूर्ण होगी, पूर्ण माँ होगी, पूर्णिमा होगी, इसे पर्व के रूप में चंद्रमा की पूर्णिमा पर मनाया जाता है। “बाह पोरोब” में प्रतीक के रूप में सखुआ / साल / सरई या सारजोम बाह (फूल) का अर्पण किया जाता है। साथ में कुछ नया फल का भी अर्पण किया जाता है। इस कामना के साथ कि जल्द ही इस फूल में भी फल फलित हो। पूजा से फूल लेकर महिलाएँ अपने पति को सखुआ फूल से सजाती है अर्थात पत्नी का पति के प्रति समपर्ण का पर्व है बाह पोरोब।

रही बात की इस पोरोब में सखुआ का फूल ही क्यूँ अर्पण किया जाता है? तो पूर्वज बताते हैं कि सखुआ फूल के रंग के समान ही गर्भाशय का रंग होता और जब तक इनमें प्रजनन क्षमता है वे अपना रंग नहीं बदलता है। सूख जाने के बाद भी लगभग इसका रंग वैसा ही रहता है। 

बाह पर्व की कुछ विशेषताएं यह हैं कि महिलाएँ ही सखुआ के फूल जंगल से लाती हैं। जंगल में सखुआ पेड़ से डाली काटने से पहले महिलाएँ जंगल के देवता से फूल मांगती हैं, फिर गाना गाते हुए फूल की डाली को काटा जाता है और गीत गाते हुए घर तक उसे लाया जाता है। सबसे बड़ी सखुआ फूल की डाली को पुजारी के घर छोड़ा जाता है ताकि जो महिला किसी कारणवश जंगल फूल लाने नहीं जा पाती है, वो पुजारी के यहाँ से फूल ले जा सकती है। फिर पूजा-पाठ खत्म हो जाने के बाद, इसी डाली को अखड़ा के बीचो-बीच गाड़ दिया जाता है और रात भर उसके चारों ओर सिर्फ महिलाएं व कुंवारी लड़कियाँ नाचती हैं। पुरुष ताली बजाते हुए या मांदर के साथ गाना गाते हैं। इस तरह से बाह पोरोब में रात भर नाच-गान के माध्यम से जगत के सभी गर्भ धारित मानव से लेकर वनस्पतियों, सूक्ष्म जीवों से लेकर बड़े जीव जिनमें गर्भाशय (फूल) है, उनकी स्तुति की जाती है और उनकी सलामती की कामना की जाती है। जो गर्भ धारण कर प्रकृति के सृष्टि चक्र को बढ़ावा दे रहा है, वैसे सभी गर्भाशय (बाह/फूल) का नमन करने का पर्व है “बाह परब”!

फूलों को महकने दो,

भौरों को गुनगुनाने दो,

फूलों की खुशबु हवा में बिखरने दो।

जवां दिलों को मदहोश होने दो।।

प्रकृति ने हम कर कृपा बरसाया है !

रेगिस्तान में फूल को खिलाया है,

अब नया सबेरा आएगा,

खुशियों का रंग छाएगा।।

प्रकृति को अपने गुल खिलाने दो,

सभी फूलों में फल आने दो,

हर आँगन किलकारियों से गूंजने दो,

फूलों को युहीं खुशबु फैलाने दो।।

फीचर्ड फोटो प्रतीकात्मक है।

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