गोपाल लोधियाल: 

सवाल यह है कि ये झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले लोग, आखिर कहाँ से आते हैं? क्या यह बारिश के साथ आसमान से टपकते हैं? या फिर यह नदियों और नालों के साथ बहकर यह लोग आते हैं? या फिर बरसाती कुकुरमुत्तों की तरह जहाँ-तहाँ उग आते हैं? यह सवाल सब को समझना चाहिए कि पूरे देश में जहाँ-जहाँ भी झुग्गी झोपड़ियाँ हैं, उनमें रहने वाले यह तमाम लोग आए तो आए कहाँ से?

मैं एक बार ट्रेन से ही गुज़र रहा था, तब मेरा सामाजिक कार्यकर्ता का जीवन शुरु भी नहीं हुआ था। मुझे ट्रेन की खिड़की से झुग्गी-झोपड़ियों के 7/10 के छोटे से घरों में रह रहे कमज़ोर से लोग दिखे। वह देख मैंने सामने बैठे एक सज्जन से पूछा कि यह कौन लोग हैं, यह ऐसे क्यों है, और यह ऐसे कैसे रह लेते हैं? झुग्गी-झोपड़ियों का वह दृश्य देखकर मैं सामने बैठे उस सज्जन से लगातार सवाल पूछे जा रहा था। उस सज्जन से जवाब मिला, “यह कामचोर लोग हैं।” और मैंने मान भी लिया। फिर यही सवाल मैंने एक और सज्जन से किया। उन्होंने बताया, “यह लोग ऐसे ही रहना चाहते हैं, इसलिए ऐसे हालातों में रह रहे हैं।” फिर एक और व्यक्ति से मैंने यही सवाल पूछा उन्होंने कहा, “इनकी तो किस्मत ही खराब है।” 

इन तीन लोगों के उत्तर सुनकर मैंने इसे ही अंतिम सत्य मान लिया। जैसे हमें दिखाया जाता है, बताया जाता है सरकार द्वारा या पत्रकार द्वारा या फिर किसी अन्य के द्वारा और हम उन सभी बातों को ही सत्य मान लेते हैं, वैसे ही मैंने भी इन उत्तरों को ही सत्य मान लिया और अपने विवेक का इस्तेमाल नहीं किया। लेकिन जब मुझे एक ऐसी ही झुग्गी-झोपड़ी बस्ती (सल्म) में जाने का मौका मिला तो मुझे वहाँ के लोगों की ज़िंदगी को भी समझने का मौका मिला। मैंने देखा कि घरों में 10 से 12 साल से ऊपर के सभी लोग काम पर गए हैं, काम भी 15 से 16 घंटे। छोटे बच्चों को खाट पर एक कपड़े से बांधकर यह लोग सिर्फ काम कर रहे हैं, वह आपके शहर की सफाई कर रहे हैं, वह आपके लिए घर बना रहे हैं और यही लोग आपके लिए तमाम तरह की चीजों का निर्माण भी कर रहे हैं।

तो पहला जवाब जो मिला था यह सब कामचोर हैं, उस बात की सच्चाई समझ आई और मैंने समझा कि यह लोक मेहनतकश हैं, कामचोर तो हरगिज़ भी नहीं हैं। दूसरा जवाब था कि यह लोग ऐसे ही रहना चाहते हैं, लेकिन जब उनसे बात की तो उन्होने बताया कि वह भी अपनी ज़िंदगी को बेहतर बनाना चाहते हैं और उसके लिए लगातार श्रम करते हैं। यहाँ पर भी स्पष्ट हो चुका था कि हर कोई इंसान अपनी ज़िंदगी, बेहतर और सुख-सुविधाओं से भरपूर चाहता है। तीसरा जवाब था कि इन लोगों की किस्मत ही खराब है। यह बात बड़ी गहराई तक मेरे मन को चुभ रही थी कि इतनी मेहनत करने वाले इन झुग्गी झोपड़ी के लोगों की किस्मत आखिर इतनी खराब हुई कैसे? और बदकिस्मत लोगों की इतनी बड़ी आबादी शहरों के आस-पास अचानक कैसे इकट्ठा हो गई? यह कौन लोग हैं? यह नदियों के द्वारा बहाव के साथ आए हुए लोग हैं क्या? या फिर यह आसमान से बारिश के साथ गिरे हैं?

यह वह लोग हैं जिन्होंने आज़ादी से पहले और आज़ादी के बाद, अपना घर, अपना गाँव, अपना सब कुछ इस देश के विकास के नाम पर समर्पित किया है। यह वह लोग हैं जो देश के भीतर अपने-अपने गाँव के जंगलों में रहा करते थे। देश के विकास के नाम पर जहाँ-जहाँ पर भी बड़े-बड़े निर्माण हुए, उनमें इन लोगों ने अपनी ज़िंदगी से जुड़ी हुई सारी संपत्तियों को इस देश के विकास के नाम पर कुर्बान किया। और जब उन्होने जीवन चलाने के सवाल को उठाया तो सरकारों और पूंजीपतियों द्वारा इन लोगों को इनके हाल पे ही छोड़ दिया गया।

आज के हालातों में यह लोग अब कहाँ जाएं? कैसे अपना जीवन यापन करें? कैसे अपने बच्चों का पेट भरें? जो लोग पूरी कायनात मालिक थे, आज उन्हें दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर कर दिया है हुक्मरानो ने। यह वह लोग हैं जिन्होंने भाखड़ा नांगल डैम से लेकर के, टिहरी हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट तक का सफर किया है। यह तो सिर्फ एक नजीर है कि इस तरह के विकास कार्यों में इन सभी लोगों के गाँव-कस्बे, इन लोगों की जिंदगियों से जुड़ी तमाम सामाजिक व्यवस्थाएं, इन विकास कार्यों की भेंट चढ़ गई। आज जब हम इन लोगों को देखते हैं तो हम उनकी इस हालत के लिए जिम्मेदार अनैतिक राजनीतिक-सामाजिक-आर्थिक कृत्यों को भी सही ठहराते हैं। हमें यह सवाल ज़रूर करना चाहिए कि आखिर यह लोग आए कहाँ से? क्या इनका इस देश में कोई हिस्सा नहीं है?

Author

  • गोपाल उत्तराखंड के नैनीताल ज़िले से हैं और सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़े हैं। वह अपने क्षेत्र में वन पंचायत संघर्ष मोर्चा से जुड़कर स्थानीय समुदायों के हक़-अधिकारों के मुद्दों पर काम कर रहे हैं।

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