आलोक मौर्य:

प्राचीन जंगल में शासकों ने स्वयं के कल्याण हेतु तथा आम जनता का शोषण करने के लिए विभिन्न प्रकार की विधियों का निर्माण किया। जबकि सन्त महात्मा एवं पादरियों ने समय-2 पर धर्म की ओट (पर्दा) में ऐसी विधियों का निर्माण किया या ऐसी परम्पराओं का सृजन किया, जिसमें पारलौकिक भय के कारण व्यक्ति उन समस्त कार्यों को करने के लिए विवश हो गया जो न स्वयं उसके हित के, वरन् समाज के साथ आम लोगों के कल्याण के भी विपरीत थे।

ये परम्पराएँ व विधियाँ कुछ व्यक्तियों के शारीरिक एवं मानसिक शोषण का षडयंत्र बन गये जिनका मनुष्य चाहकर भी विरोध नहीं कर सकता था। जैसे-

1- बहुपत्नीत्व विवाह
2- बहुपतित्व विवाह
3- दहेज प्रथा
4- सती प्रथा
5- देह व्यापार प्रथा
6- देवदासी प्रथा

शोषण का ऐसा ही एक अनुपम और अद्वितीय उदाहरण है कि विधवाओं को न तो पुनः विवाह की अनुमति थी और न ही सामाजिक समारोहों मे सम्मिलित होने की स्वतंत्रता थी। ऐसी परम्पराएँ मानवता के नाम पर कलंक थी, जिन्होंने पोषण के बजाय शोषण को बढ़ावा दिया है, लोककल्याणकारी के बजाय व सामंतवादी विचारधारा का समर्थन किया है।

अथक परिश्रम व लाखों बलिदान के उपरान्त 15 अगस्त 1947 को हमारा देश स्वतन्त्र हुआ और 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू किया गया। संविधान के मुख्य उद्देश्य बिना किसी भेदभाव के सभी लोगों, सभी प्राणियों तथा सभी संस्थाओं पर समान रूप से विधि को लागू करना है। कोई भी व्यक्ति चाहे राजा हो या रंक, आयुक्त हो में अनुचर, स्त्री हो या पुरुष संविधान किसी के प्रति कोई भेदभाव नहीं करता है। साथ ही साथ वह प्रत्येक व्यक्ति को ऐसी स्वतन्त्रता प्रदान करता है, जिससे उस व्यक्ति का सर्वांगीण विकास हो सके, जबकि परम्पराएँ व प्रथाएं कभी भी समान रूप से लागू नहीं होती हैं। इसलिए यह कहना सर्वथा उचित प्रतीत है कि संविधान का होना आवश्यक होता है, प्रथाओं का नहीं, क्योंकि संविधान लोक कल्याणकारी भावना को जन्म देता है तथा परम्परा व प्रथाएं शोषण का उदय करती हैं।

फीचर्ड फोटो आभार:

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One response to “शोषण और असमानता से भरे हमारे समाज में संविधान जरूरी है क्या ?”

  1. Shivani Maurya Avatar
    Shivani Maurya

    Right… 👌

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