हिमाचल की तरह झारखंड भी क्या पर्यटन और जैविक खेती की बदौलत आगे नहीं बढ़ सकता?

दीपक रंजीत: 

हिमाचल की तरफ आये हैं तो सोचे कि क्यों नहीं यहाँ के बारे में कुछ लिखा-पढ़ा जाए, जाना-समझा जाए। हिमाचल प्रदेश की अर्थव्यवस्था मुख्यत पर्यटन पर टिकी हुई है। यहाँ पहाड़ हैं, लेकिन माइनिंग नहीं है। थोड़ा बहुत जड़ी बूटियों के कारोबार के अलावा, ग्रामीणों ने अपने घरों के पास की खाली जगहों पर ही होटल बना रखे हैं, उसे ही रेंट में लगाकर वह अच्छा पैसा कमा रहे हैं। जिनके पास सँभालने के लिए लोग नहीं हैं, उन्होंने अपनी ज़मीनों को किराये पर लगा रखा है। ध्यान दे कि ज़मीनों को बस किराये पर ही लगा रखा है, हम लोगों की तरफ जैसा अग्रिममेंट बनाकर खरीद-बिक्री का खेल नहीं हो रहा है। 

हिमाचल में पहाड़ियों की ज़मीन, कोई गैर हिमाचली खरीद नहीं सकता है। जैसे हम लोगों के यहाँ सीएनटी/एसपीटी जैसे ज़मीन रक्षा कानून हैं, ठीक उसी तरह से टेनेंसी एक्ट के सेक्शन 118 के तहत कोई भी गैर हिमाचली व्यक्ति, यानि जिसकी नागरिकता हिमाचल प्रदेश से बाहर की हो, वह इस राज्य में ज़मीन नहीं खरीद सकता। लेकिन इसका मलाल न तो यहाँ के पहाड़ियों को है और न ही हिमाचल में अपना होटल बिजनेस कर रहे दिल्ली, बिहार, बंगाल, यूपी और अन्य जगहों के व्यापारियों को है।

हम लोगों की तरफ तो फ्री में लोगों को सलाह देते हुए जमीन तो बिक ही रही है, लेकिन सीएनटी एक्ट लागू होने से झारखंडियों को उनकी ज़मीनों के सही दाम नहीं मिल रहे हैं। यही बोल-बोल के दो लाख की जगह एक लाख में ज़मीन को रजिस्ट्री के जगह अग्रीमेंट में ही खरीदा जा रहा है। वहीं हिमाचल में पहाड़ी लोग, अपनी ज़मीनों को भाड़े पर लगाकर महीने में लाखों कमा रहे हैं।

हम लोग कुल्लू जिले के पास एक गाँव में रुके हैं। यहाँ एक पहाड़ी, लकड़ी काटने समेत अन्य काम करने के लिए 10 किमी नीचे से आता है। बातचीत के दौरान उसने बताया कि उसके दो जगह पर घर हैं। एक जगह एक बीघा ज़मीन में 10 कमरे बने हुए हैं, जो भाड़े में लगे हैं और वो जहाँ पर रहता है, उस तीन मंजिले घर की फोटो भी उसने दिखाई। उसने बताया कि पिछले साल गाँव के पास ही एक बीघा ज़मीन 20 लाख में ख़रीदी है। यह सब वह लकड़ी काटते हुए बड़ी ही सहजता से बता रहा था।

तो अब सवाल उठता है कि जब पर्यटन केंद्रित अर्थव्यवस्था बनाकर हिमाचल जैसे क्षेत्र के पहाड़ी संपन्न हो रहे हैं, तो झारखंड अपने प्राकृतिक सौंदर्यता की बदौलत और जैविक (आर्गेनिक) खेती और पर्यटन केंद्रित अर्थव्यवस्था की बदौलत क्यों नहीं आगे बढ़ सकता है?

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