कोर्दुला कुजूर:
कहा जाता है कि किसी भी समाज की भाषा-संस्कृति और वहाँ की परम्परा उस समाज का आईना होते हैं। हम मानते हैं और इतिहास गवाह है कि जिस समाज की भाषा-संस्कृति खत्म हुई, उस समाज का नामो-निशान मिट गया। अतः हम बेशक कह सकते हैं कि आदिवासी समाज की भाषा, संस्कृति और परंपराएं बहुत समृद्ध हैं। पर कई परम्पराएं ऐसी भी हैं जिन्हें हम रूढ़िवादी परम्परा मानते हैं। यह आज भी समाज के विकास में बाधक हैं, कई ऐसी परम्पराएं और मान्यताएं है, जो समाज में गैर-बराबरी लाती हैं। ये असमानताएं लिंग आधारित भी हैं और धर्म के नाम पर भी ऊंच-नीच जैसी भावनाएँ पैदा की जा रही हैं, जो आदिवासी समाज के लिए एक बड़ी खतरे की घंटी है। समाज के ठेकेदार, धर्म के ठेकेदार और तथाकथित समाज सुधारक इसमें बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं। आदिवासी समाज में कई काम ऐसे हैं, जिन्हें लिंग के आधार पर बांटा गया है। जैसे महिलाएं और लड़कियाँ हल के जुबाट को छू नहीं सकती, हल चला नहीं सकती, हल चलाने में प्रयोग होने वाले कोई भी समान को नहीं छू सकती तथा कप्पा (खपरैल) नहीं चढ़ा सकती है और न ही बना सकती हैं।
आज की जागरूक और शिक्षित महिलाएँ इन पाबन्दियों पर सवाल करना शुरू कर दी हैं। महिलाओं का मानना है कि दुनिया तेज़ी से बदल रही है, हम टेक्नोलॉजी (वैज्ञानिक) युग में जी रहे हैं, अत: हमें दुनिया के साथ चलने दिया जाए। हम महिलाएँ वो हर काम कर सकती हैं जो पुरुष करता है। अभी की महिलाओं का मानना है कि ज़िंदगी अपनी है, तो हम अपने हिसाब से जिन्दगी क्यों नहीं जी सकते?
इसी का ताज़ा उदाहरण है कि सामाजिक रूढ़िगत परम्पराओं को तोड़ते हुए, झारखण्ड के दो ज़िले – गुमला और रांची की दो बहनों ने अपने-अपने खेतों को ट्रैक्टर से जोतकर खेती की और बीज बोया। ये बात समाज के ठेकेदारों को रास नहीं आई। उन लोगों ने गुमला ज़िले के सिराई प्रखण्ड स्थित डटोली गाँव की मंजू उरांव के खिलाफ तुगलकी फ़रमान जारी करते हुए, उन्हें और उनके परिवार को समाज से बहिष्कृत करने की बात उठाई। गाँव में सामाजिक बैठक हुई और बैठक में उन्हें भला-बुरा कहा गया, उनके साथ मानसिक और शारीरिक प्रताड़नाएं की गई और सामाजिक बहिष्कार के साथ-साथ उनसे अर्थ दंड भी भरवाया गया।
मंजु उरांव के बारे मे बता दूँ कि वह एक पढ़ी-लिखी और नयी सोच रखने वाली आधुनिक युवति है जो समाज में बदलाव लाना चाहती है और दुनिया की गति के साथ कदम मिलाना चाहती है। वर्तमान में मंजु कार्तिक उरांव, महाविद्यालय में बी.ए. प्रथम वर्ष की छात्रा हैं। उनका कहना है कि लड़कियाँ आसमान छू सकती हैं, तो मैं ट्रैक्टर क्यों नहीं चला सकती? बचपन से खेती-किसानी में रुचि रखने वाली मंजू उरांव ने अपनी मेहनत से की कृषि उपज से जो मुनाफा कमाया, उसी से सेकेण्ड हैंड ट्रैक्टर खरीदा और खेती कर रही हैं। मंजू का कहना है कि समाज चाहे कुछ भी सज़ा दे, पर मैं पीछे नहीं हट सकती। मंजु के गाँव वालों का कहना था कि हमारे समाज में यह नियम नहीं है। लड़कियों के हल दूने और जोतने से सूखा और अकाल पड़ता है। और तो और गाँव-समाज में कई तरह की महामारियाँ फैलती हैं।
दूसरी घटना राँची जिला के बेड़ों पुरषातु की है, जहाँ सुमित्रा कुजूर ने सभी सामाजिक बंधनों को तोड़ते हुए ट्रैक्टर से हल जोतकर अपने खेतों में बीजों की बुवाई और रोपाई की। सुमित्रा कुजूर पहले से तेज़-तर्रार और आन्दोलनकारी महिला है। समाज से लड़ने के लिए पहले से तैयार थी, उसके साथ ऐसा कुछ नहीं हुआ लेकिन उन्होंने भी अपने साहस का परिचय दिया जो काबिले तारिफ है। आज समाज में दो तरह के लोग हैं, कुछ लोग समाज को आगे बढ़ाना चाहते हैं और कुछ लोग रूढ़िवादी परम्परा को ढोकर समाज को और पीछे ले जाना चाहते हैं।
आज मंजू और सुमित्रा कुजूर ने ट्रैक्टर से हल जोतकर उस रूढ़िवादी परंपरा और अंधविश्वास को तोड़ने का काम किया है, जो वर्षों से चले आ रहे थे। मंजु और सुमित्रा ने अपने-अपने खेतों में ट्रैक्टर से हल जोतकर महिला सशक्तिकरण की मिसाल पेश की है। अत: उनके साहसिक काम के लिए इन दोनों महिलाओं को विश्व आदिवासी दिवस के दिन अलग-अलग जगहों पर सम्मानित किया गया।
आज हम सभी महिलाएँ समाज से ये पूछना चाहती हैं कि आखिर कब तक महिलाएँ दो तरफा ज़िंदगी जिएंगी? समाज के प्रबुद्ध जनों को मिल-बैठकर विचार करने की ज़रूरत है। समाज की उन रूढ़िवादी परंपराओं को, जो समाज के विकास में बाधक हैं, और गैर बराबरी लाती हैं, साथ ही समाज को बाँटने का काम करती हैं, ऐसी परम्पराओं को हमेशा-हमेशा के लिए खत्म किया जाना चाहिए।

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