महंगाई के रास्ते पर अटकी ऊबर ड्राइवर की ज़िंदगी

अमित:

रविन्दर कुमार दिल्ली में छः सालों से उबर चला रहे हैं। हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा ज़िले के रहने वाले हैं। महंगाई का इनकी ज़िन्दगी में क्या असर पड़ रहा है, इसके बारे में उनसे हुई बातचीत- 

कुछ दिन पहले मेरी बेटी ने मुझसे अंग्रेज़ी के एक शब्द का अर्थ पूछा। मुझे तो मालूम नहीं था। मैं सोचने लगा कि एक समय मुझे काफ़ी अच्छी अंग्रेज़ी आती थी। बारहवीं में मुझे इंग्लिश में अच्छे नम्बर मिले थे। गणित में भी मैं बहुत फ़ास्ट था। काफ़ी मेहनत करके मुझे बारहवीं में गणित में अस्सी नम्बर आ गये थे। कुछ 76 प्रतिशत बना था मेरा। 

यह याद करके रविन्दर की आवाज़ में उमंग सुनाई दे रही थी।

वाह! इतना अच्छा प्रतिशत बना तो फिर कॉलेज के बारे में क्यों नहीं सोचा? 

बस क्या बताऊँ, उसी साल मेरे पिता जी की आँख में कील घुस गई। वे मिस्त्री का काम करते हैं। कन्सट्रक्शन साइट पर फट्टे में कील ठोंकते समय फट्टा उड़ गया और कील आँख में लगी। उनकी एक आँख की रोशनी चली गई। तब मेरे पास एक ही ऑप्शन बचा कि कुछ काम कर के पैसे कमाऊँ। पिताजी तो घर बैठ गए। पूरा साल उन्हे लेकर एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल के चक्कर लगाते रहे। आँख ठीक नहीं हो पाई। मैं मज़दूरी करने लगा। ट्रैक्टर-ट्राॅली भरने जाता था। एक ट्राॅली के पच्चीस रुपये मिलते थे। दिन भर में तीन-चार ट्राॅली भर देते थे हम चार लड़के मिल कर। ऐसे करके साल निकल गया।

दिल्ली में कितने दिनों से हो? 

सात-आठ साल हो गये। पहले ट्र्रैवेल एजेन्सी में गाड़ी चलाता था। बाद में ऊबर चलाने लगा। लाॅकडाउन में सब बंद हो गया। पहले अच्छी कमाई हो जाती थी। अभी तो कुछ हो ही नहीं रहा। आपको दिखाता हूँ, आज का मेरा अभी तक 1745 रुपये बना है – (मोबाइल में दिखाता है मुझे।) आपकी राइड मिलाकर दो हज़ार हो जायेंगे आज के। सवेरे आठ बजे से निकला हूॅं। ग्यारह घण्टे तो हो चुके हैं। और एक घंटा चलाऊँगा। इसमें से एक हज़ार की तो गैस भरवानी पड़ती है। महंगी हो गई है बहुत और ट्रैफ़िक के कारण गैस भी ज़्यादा लगती है। अब आपका घर पाॅंच किलामीटर है, लेकिन पन्द्रह मिनट दिखा रहा है। फिर गर्मी है तो एसी चलाना ही पड़ता है। कस्टमर को तो नहीं कह सकते कि गैस महंगी है, एसी नहीं चलेगा। तो एक हज़ार गैस में गया। सात सौ रुपये प्रतिदिन गाड़ी की किश्त भरनी पड़ती है। डेढ़-दो सौ मेरा भी दिन का खर्च होता है खाने में। रात को तो घर जाकर खाना बनाता हॅूं, लेकिन दिन में तो बाहर ही खाना पड़ता है। कुछ नहीं बचता। 

बच्चों के लिये कुछ लेना, घर भेजना कुछ हो नहीं पाता। यह तो ठीक है कि उनके घर का खर्च वो लोग ही चला लेते हैं। पिताजी मिस्त्रीगिरी का काम करते हैं तो साड़े छः सौ-सात सौ रुपये दिहाड़ी मिल जाती है। पापा कहते हैं जबसे तूने गाड़ी ली है एक पैसा भी घर नहीं भेजा। यह सही है। उलटा दो बार किश्त फंस गई तो घरवालों से ही 25 हज़ार और एक बार तीस हज़ार लिया था।

तो घर कैसे चलाते हो जब रोज़ का भी खर्च नहीं निकलता? 

कर्ज़ा करके। गाड़ी लेने के लिये कर्ज़ा लिया. हमारे उधर गूजर हैं वो देते हैं। पच्चीस हज़ार लिया था, जिसमें एक हज़ार तो उन्होने फ़ाइल के लिये काट कर चैबीस कर दिया। पता नहीं किस बात की फ़ाइल का है। पन्द्रह हज़ार रुपये महीना उन्हे देना होता है। इनका नहीं दे पाऊँगा तो और तीसरे से लेना पड़ेगा। गाड़ी की किश्त मिस होने पर फ़ाइनेंस वाले ने भी पच्चीस हज़ार बढ़ा दिये। अब कह रहा है मिलना आकर तो कुछ कम कर देंगे।

बहुत से उबर वालों से हम बात करते हैं, वो तो कहते हैं कि कमा लेते हैं। कहते हैं घर चलाने जितना बन जाता है। 

भाई वो कमा लेते हैं जिनकी गाड़ियाॅं लाॅकडाउन से पहले फ्री हो गई थी, उनका चल जाता है। लेकिन आजकल मुश्किल से ही चलता है सबका। ऐसे तो कभी-कभी मेरे भी ढाई-तीन हज़ार बन जाते हैं दिन के। लेकिन मुश्किल से चलता है। मैंने दिखाया न आपको आज का हिसाब।

तुम्हारी गाॅंव में खेती नहीं है क्या? हिमाचल में तो टूरिस्म भी बहुत कर रहे हैं लोग होम स्टे बनाकर। 

थी हमारी ज़मीन। खेती होती तो यहाॅं कभी आता ही नहीं। पोंग डैम में चली गई थी सारी खेती। सन् बहत्तर में। तीन सौ से भी ज़्यादा गाँव डूब गए थे। उसके बदले राजस्थान में कहीं ज़मीन दी थी। वहाॅं हमारे गाॅंव वाले गये नहीं। एक अफ़वाह फैल गई थी कि जो भी वहाॅं जाता है उसे वहाॅं के लोग काट कर कपास की बोरियों में भर के भेज देते हैं। बाद में इन्हे कहीं रेगिस्तान में ज़मीन दे दी। वहाॅं भी कोई नहीं गया। अब कोर्ट में केस चल रहा है। कुछ लोगों को पहले अच्छी ज़मीनें मिल गई थी। उन्होने तो बहुत महंगे दामों में बेचकर अपने इलाके में ले लीं।

यहाॅं कहाॅं रहते हो? 

गुड़गाॅंव के आगे। एक और है जो मेरे साथ रहता है, दो-दो हज़ार रुपये किराया देना पड़ता है कमरे का। मेरे रूम पार्टनर के अलावा और एक लड़का भी है हमारे उधर का। दोनो दो महीनों से काम ढूंढ रहे हैं ड्राइवरी का। मिल ही नहीं रहा। रोज़ जाते हैं, कुछ नहीं मिल रहा। 

फ़ैमिली यहाॅं नहीं रहती? 

ना जी! ये गंदी जगह में क्या करने लायेंगे उनको। मेरा ही नहीं पूरा पड़ता, वो क्या करेंगे? अब तो मैं ही नहीं रहना चाहता यहाॅं। मैं तीन-चार महीनों में एक बार घर चला जाता हूॅं, जब कभी चण्डीगढ़ की सवारी मिल जाती है। सवारी नहीं मिलती और बजट नहीं होता तो बस से जाता हूॅं।

अब क्या सोच रहे हो? 

अब क्या है, किसी तरह यह कर्ज़ छूट जाये तो वापिस गाॅंव जाकर वहीं कुछ देखूॅंगा। यहाॅं कभी वापिस नहीं आऊँगा। दो महीनों में उम्मीद है सारी देनदारी ख़त्म हो जायेगी।

फीचर्ड फोटो प्रतीकात्मक है, फोटो आभार: The News Minute

Author

  • अमित, सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़े हैं और मध्य प्रदेश के बड़वानी ज़िले में एक वैकल्पिक शिक्षा के प्रयोग पर शुरू हुआ स्थानीय स्कूल - आधारशिला शिक्षण केन्द्र चलाते हैं।

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