अमित:

दोस्तों, जब हमें कोई थप्पड़ लगाता है तो हमें बुरा लगता है, जब कोई हमें प्यार करता है तो अच्छा लगता है। कभी हम खुश होते हैं, और कभी हम दुखी होते हैं। जानवर भी इसी तरह कभी खुश होते हैं, कभी लड़ते हैं। पर क्या तुम्हे मालूम है कि पौधे में भी इसी तरह की संवेदना होती है। उनको जब काटो या उन्हे पानी न मिले तो उनके अंदर भी कुछ होता है। यह बात दुनिया में सबसे पहले पता लगाने वाले वैज्ञानिक का नाम था जगदीष चन्द्र बोस।

जगदीष चन्द्र बोस का जन्म 30 नवम्बर सन् 1858 में पश्चिम बंगाल के मेमनसिंह ज़िले में हुआ। यह जगह अब बांग्लादेश में है। बचपन से ही उन्हें अपने आसपास की हर चीज़ के बारे में जानने की इच्छा रहती थी। उनकी स्कूली पढ़ाई मछुआरों और किसानों के बच्चों के साथ हुई। उन बच्चों से वह खेती बाड़ी, पानी, जंगल, मछली की कहानियां किस्से सुनते रहते थे। तभी से उन्हें प्रकृति से लगाव उत्पन्न हो गया। आगे जाकर उन्होनें कलकत्ता के सेंट जे़वियर स्कूल में प्रवेश लिया। वहां सब अंग्रेज़ और शहरी बच्चे थे। ये सब बोस के साथ अच्छा व्यवहार नहीं करते थे। गांव से आने के कारण उनके साथ छेड़ छाड़ करते थे। जगदीश बाबू बहुत स्वाभिमानी थे। एक दिन एक मुक्केबाज़ लड़के नें उन्हें मारा। बोस भी उससे भिड़ गये। जैसे-वैसे बोस नें उस मुक्केबाज़ को हरा दिया। तब से बोस की स्कूल में इज्ज़्त होने लगी। उनको लड़कों नें छेड़ना बंद कर दिया। छात्रावास में पढ़ाई करते समय उन्होनें एक कोने में एक छोटा सा बगीचा तैयार किया। वहां पर जगदीश बाबू वनस्पतियों पर प्रयोग करते रहते थे।

स्कूल के बाद कलकत्ता विश्वविद्यालय में उन्हाने पढ़ाई की और वहॉं से इंगलैण्ड के कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय पढ़ने गये। वापिस आकर उन्होने कॉलेज में पढ़ाया और पौधों पर अपने प्रयोग ज़ारी रखे। उन्होने वनस्पतियों पर सैंकड़ों प्रयोग किये।

अपने प्रयोगों से बोस नें पाया कि पौधों में भी जीवन है। उनमें भी संवेदना होती है। उन्होने बताया कि जैसे मानव किसी नशीली चीज़ से बेहोश हो जाता है वैसे ही पौधे भी बेहोश हो जाते हैं। और ज़हर पीने से वे भी मर जाते हैं। पहली बार जब यह बात बोस नें कही तो विश्व के किसी वैज्ञानिक नें उनकी बात नहीं मानी। लेकिन बोस नें हार नहीं मानी।

बोस नें बचपन में गांव में सुतारी भी सीखी थी। यह विद्या उनके काम आई। उन्होने ऐसे यंत्र बनाये जिससे पौधों के अंदर के कंपन को नापा जा सकता था। इस यंत्र को लेकर वे इंगलैण्ड में वैज्ञानिकों की गोष्ठी में गये। 10 मई 1901 के दिन लंदन शहर में रॉयल सोसायटी का हॉल पूरा भरा हुआ था। पूरे विश्व के वैज्ञानिक वहाँ इकठ्रठे हुए थे। सभी आतुर थे देखने के लिये कि बोस कैसे दिखायेंगे कि पौधों में जीवन होता है। वहां एक पौधे से अपने यंत्र को जोड़कर उन्होने रखा। पौधे का कंपन यंत्र नें नापा और एक पर्दे पर उसको दिखाया। पर्दे पर एक प्रकाश का गोला सा दीख रहा था। फिर बोस नें इस पौधे को एक ज़हरीले ब्रोमाइड घोल से भरे बर्तन में रख दिया। थोड़ी देर में वह गोला हिलने लगा। फिर तेज़ी से हिलने लगा। और अंत में रुक गया। पौधा मर गया। ऐसा दिख रहा था जैसे कोई चूहा तड़प कर मर रहा हो।

इस तरह के प्रयोग दिखा कर बोस नें अपनी बातें सिद्ध करीं। बोस के काम के बाद ही लोग पौधों को भी मानव और जानवरों की तरह जीव के रूप में देखने लगे। दूसरे देशों के वैज्ञानिकों नें भी पौधों के जीवन के बारे में शोध करना प्रारंभ किया।

बोस पर लोग हंसते थे। उनके काम को मानते नहीं थे। परन्तु उनकी लगन और मेहनत के बाद दुनिया को उनकी बात सुननी पड़ी। 78 वर्ष की उम्र में 23 नवम्बर 1937 को जगदीश चन्द्र बोस का देहांत हो गया। अंग्रेज़ों के शासन काल में ही बोस नें भारत का नाम विश्व में प्रसिद्व कर दिया।

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  • अमित, सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़े हैं और मध्य प्रदेश के बड़वानी ज़िले में एक वैकल्पिक शिक्षा के प्रयोग पर शुरू हुआ स्थानीय स्कूल – आधारशिला शिक्षण केन्द्र चलाते हैं।

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