सिद्धार्थ:

अमृता प्रीतम भारतीय साहित्य के कुछ उन चुनिन्दा नामों में से एक है जिन्होंने अपनी लिखावट को किसी एक खास फ़र्मे में बांधकर नहीं रचा। बेबाक शब्द उनकी लिखावट की एक खास पहचान रहे और इंसानी भावनाओं की संवेदनशीलता, जैसे एक ज़रूरी तत्व। 1919 में गुजरांवाला (वर्तमान में पाकिस्तान) में जन्मी अमृता ने अपने जीवनकाल में हिन्दी और पंजाबी भाषा में तकरीबन 100 किताबें लिखी, जिनका देश-विदेश की कई भाषाओं में अनुवाद भी किया गया।

अमृता की लिखावट से मेरा पहला परिचय आज से तकरीबन 7-8 साल पहले हुआ था, जब एक दोस्त ने उनकी लिखी कुछ पंक्तियाँ सुनाई थी।

“देखो यह आखरी टुकड़ा है, उंगलियों में से छोड़ दो; कही मेरे इश्कुए की आँच, तुम्हारी उंगली ना छू ले;
ज़िंदगी का अब गम नहीं, इस आग को संभाल ले; तेरे हाथ की ख़ैर मांगती हूँ, अब और सिगरेट जला ले!”

पहली बार में ही ये कुछ पंक्तियाँ सीधे मन में उतर गई थी। मेरी दोस्त ने उस शाम बताया कि अमृता ने यह कविता अपने प्रेमी साहिर के लिए लिखी थी, उसने एक निडर कवियत्री के रूप में अमृता से मेरा पहला परिचय कराया था। उस दिन से आज तक अमृता की कोई एक रचना पूरी तरह से पढ़ने का मन था, आज सुबह जब ‘धरती सागर और सीपियाँ’ का आखिरी अध्याय पढ़ा तो वो इच्छा पूरी हो गयी। पिछले 3-4 दिनों से इस उपन्यास के पात्रों के बारे में मन में रह-रह कर खयाल आ-जा रहे थे। कुछ पंक्तियाँ बस ऐसे ही दिमाग में आती तो लगता जैसे एक ख़राश भरी अनुभवी आवाज़ उन्हें पढ़ के सुना रही हो।

“चेतना चुप रही। छींट की ‘कुड़ती’ और लट्ठे की ‘सलवार’ को उसने ऊपर उठाकर आँखों से छुआ लिया। अम्माँ की आँखों में ये कपड़े कफ़न थे, दुनिया की आँख में ये कपड़े नापाक थे, पर चेतना की आँखों में ये कपड़े कुंआरे के कुंआरे थे।”

अमृता कितनी महान लेखिका थी इस पर काफी कुछ पढ़ा जा सकता है, वो सब आसानी से इंटरनेट पर मिल भी जाएगा। मैं तो बस ये लिखना चाहता हूँ कि वो कितने आसान शब्दों में अपनी बात कह जाती हैं। उनकी किताबों के किरदार इतने आम हैं कि ना तो वो भव्य दिखते हैं और ना नज़रअंदाज़ ही किए जाते हैं। ये किरदार अमृता की रचनाओं के किराएदार नहीं बल्कि मालिक नज़र आते हैं। ‘धरती सागर और सीपियाँ’ भले ही ‘चेतना’ के इर्द-गिर्द बुनी लगती हो लेकिन चम्पा, मिन्नी, इक़बाल, या सुमेर के किरदार भी अपनी मौजूदगी के लिए संघर्ष नहीं करते। इस रचना के पुरुष किरदारों की संवेदनशीलता उन्हें महिलाओं जितनी मज़बूती भी देती है तो उनके नर्म मन के भीतर के अंदरूनी कलह और पितृसत्ता की कटुता को भी सामने लाती है।

उनका लिखा यह उपन्यास किसी फिल्म की तरह नहीं, बल्कि जीवन की तरह आगे बढ़ता है। किसी एक किरदार की कहानी का अगला हिस्सा जब आता है तो उससे मिलने का भाव वही रहता है जैसे किसी पुराने परिचित से कुछ समय के बाद मिलने पर रहता है। पाठक की उत्सुकता को इन किरदारों की वापसी का उतना ही इंतज़ार रहता है जितना कि आने वाले दिन का, कभी कम या कभी ज़्यादा।

मेरे हिसाब से तो इंसानी भावनाओं को वास्तविकता के साथ उकेरना जो संतुलन इस किताब को देता है, वह इसकी सबसे बड़ी खासियत है। कितनी ही पंक्तियाँ हैं जो मन पर छाप छोड़ जाती हैं। अगर अमृता प्रीतम को पढ़ना शुरू करना चाहते हैं, तो यह किताब एक अच्छा विकल्प है। ऑनलाइन आप इसे आसानी से खरीद सकते हैं, प्रयास करेंगे तो हिन्द पॉकेट बुक्स के प्रकाशन की यह किताब किसी पुरानी किताब की दुकान में भी मिल जाएगी। हिन्दी सिनेमा के कुछ मंझे हुए कलाकारों ने भी अमृता की कुछ कविताएं पढ़ी हैं, नीचे कुछ यू ट्यूब के लिंक हैं जिन पर जाकर आप उन्हें अमृता की कविताएं पढ़ते देख और सुन सकते हैं।                        

Author

  • सिद्धार्थ, सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़े हैं और दिल्ली की संस्था श्रुति के साथ काम कर रहे हैं। 

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