बचपन के दिन और गाँव के मेले की खट्टी-मीठी यादें

शिवांशु:

मेला, हाट, बाज़ार हमारी संस्कृति का अहम हिस्सा रहे हैं। हम कहीं भी लगने वालों मेलों के ज़रिये वहाँ की संस्कृति, रीति-रिवाज़, सभी चीज़ों को समझ सकते हैं। ऐसे ही अनेक मेले देश के हर गाँव-बाज़ार, कस्बों में अलग-अलग अवसर पर लगते हैं।

बात बहुत दिन पहले की है। मेरी उम्र कुछ 14-15 साल की रही होगी। हमारे कस्बे में भी ऐसे ही एक मेला लगता था ‘गोड़वा घाट का मेला।’ मेला दीपावली के बाद नवम्बर महीने में होता था। मेले को लेकर हम बच्चों में बहुत उत्सुकता होती थी। मेले के 10 दिन पहले से ही हम लोग प्लान बनाते थे कि कैसे जाएंगे और क्या-क्या करेंगे? लेकिन इसमें सबसे बड़ी अड़चन होती थी कि किसके साथ जाएंगे? इसके लिए हम मेले के 10 दिन पहले से ही घर के बड़ों की आज्ञा मानने लगते थे। कभी बाबा को राज़ी करना, तो कभी चाचा को तैयार करना कि हम सब लोगों को लेकर चलें। बाबा तो बाकायदा मेला ले चलने के एवज में, हम सब से खेतों पर काम कराते थे। 

उस समय धान की फसल कट रही होती थी, मकई की फसल घर आ रही होती थी। हम बच्चा पार्टी पूरे उत्साह से मेले के लालच में काम करते थे और फिर इतनी सब मेहनत मान-मुरव्वत के बाद हम सभी भाई-बहनों को बाबा की तरफ से मेला जवाई (मेला जाने के लिए पैसे) मिलती थी। बाबा सबको लाइन में खड़ा करके 10-10 रुपये देते थे। कुछ हमारी अपनी बचत के पैसे होते थे और कुछ इधर-उधर का जुगाड़ और फिर हम मेला जाते थे। मेला ले जाने वाले की बड़ी इज्ज़त होती थी। मेले वाले दिन सुबह से बच्चा पार्टी उस व्यक्ति की सेवा में रहती थी। मेला वाले दिन के आस-पास बच्चे सभी का कहना मानते थे, क्योंकि अगर कोई गुस्सा हो गया तो मेला जाना कैंसिल हो सकता था। खैर इन सब में जैसे-जैसे हम बड़े हो रहे थे, कई समस्या थी। एक तो जिसके साथ मेला जाओ वो घूमने नहीं देता था ऊपर से मेले में समान भी अपने मन का नहीं लेने देता था। यह एक विकट समस्या थी।

मुझे याद है कुछ 15 साल का रहा हूंगा और मेरा छोटा भाई 13 का। हम दोनों ने सोचा कि इस बार मेला अकेले जाएंगे, अरे हम लोग बड़े हो गए हैं। बात तो हो गई अब बारी थी सबको राज़ी करना। हम दोनों भाइयों ने मेले वाले दिन सुबह से कड़ी मेहनत की। धान की पिटाई से लेकर, मकई की कटाई तक। और फिर बाबा के सामने प्रस्ताव रखा गया। मैं बड़ा था तो बड़े होने के नाते मैंने आते हुए कहा , “बाबा अबकी हमहुँ अतुल (छोटा भाई) अकेले मेला देखय जाबाय” इतना कह के मैं पीछे खड़ा हो गया। बाबा ने गंभीर मुद्रा बनाई कि जैसे हमने अलग देश की मांग कर दी हो, छोटी बुआ ने सपोर्ट किया तो बात बन गई और तय हुआ कि दोपहर में जल्दी जाएंगे और शाम से पहले लौटेंगे।

इतना सुनते ही हमें वही खुशी हुई जो शायद पहली बार देश आज़ाद होने पर सबको हुई होगी। अब शुरू हुआ प्लानिंग का दौर, क्या-क्या खरीदना है, क्या देखना है। मम्मी की चेतावनी का दौर, “कोही के दिया खाएव न, लकड सुंघा (तत्कालीन बच्चा पकड़ने वाले गैंग) घुमत हैं…अकेले कोही के साथे न जायेव पकड़ लाई जैहनय।” हम लोग उत्साह में हमेशा की तरह सभी बातों को एक कान से सुन, दूसरे कान से निकाल रहे थे। पहली बार अकेले मेला जाने को सोच-सोच के पेट में गुदगुदी हो रही थी, भाई तो सुबह से ख़रीदने के सामान की लिस्ट रट रहा था, “एक चुटकुला, शायरी किताब लेब, जलेबी, सिंघाड़ा और छोटकी बहिनी खातिर ग्वालिन (मिट्टी का खिलौना) लेबय। तू का ख़रीदबो?”, उसने मुझसे पूछा, मैंने बड़े होने के नाते गंभीर होकर कहा, “हुआँ जा के सोच जाएगा।”

खैर हम लोग दोपहर बाद मेला के लिए निकल लिए, मैंने दीपावली में लिया अपना चश्मा लगाया, छोटे भाई ने मामा के यहाँ से लाई दुपदाय वाली घड़ी (डिजिटल घड़ी) पहनी। बालों में तेल लगाया, चुरा के छोटी बुआ का महाकुवा वाला पाउडर लगाया गया, सब लेप लेने के बाद हम विजय भावना से मेले के लिए निकल लिए। ऐसा लग रहा था जैसे किसी जंग पे जा रहे हैं। बाबा ने हमेशा की तरह 10 रुपये दिए थे, मम्मी ने भी इस बार 10 रुपये दिए कि अकेले मेला जा रहे हैं, कुल मिला के हम दोनों के पास 20-20 रुपये और ख़रीददारी की लिस्ट थी। कुछ पैसे मैंने ऊपर से भी बचा के रखे थे। अब जैसे-जैसे हम मेले की तरफ बढ़ रहे थे, भीड़ बढ़ रही थी लोग। झुंड के झुंड मेला देखने जा रहे थे। कोई साईकल से, कोई पैदल तो कोई ट्राली से। हम लोग पूरे इतराते हुए जल्दी-जल्दी मेले की ओर बढ़े, कुछ ही देर में लाउडस्पीकर की आवाज़ आने लगी। हमें लग गया मेला आ रहा है, जैसे-जैसे आवाज़ तेज़ होती, हम पैर तेज़ बढ़ाने लगे। हम दोनों ने मेले के पहले ही एक-दूसरे का हाथ कस के पकड़ लिया, मेले के बाहर ही तय हुआ अगर साथ छुटा तो रब्बन के साईकल स्टैंड पर मुलाकात होगी। 

तेज़ धड़कनों के साथ हम मेले में घुसने लगे। मेले में बहुत भीड़ थी, एक तरफ मूंगफली, सिंघाड़ा, कद्दू की दुकान तो दूसरे तरफ टिक्की, समोसा, बर्फी की दुकान हमें अपनी तरफ खींच रही थी और हम सख़्त लड़कों की तरह आगे बढ़ते रहे। हमने तय किया था कि पहले पूरा मेला घूमा जाएगा फिर ख़रीदारी होगी। छोटा भाई बार-बार जलेबियों के रंग-मिठास पर चर्चाएं कर रहा था। हम आगे बढ़े, टिकुली, बूंदा, श्रृंगार की दुकान थी, दुकानदार चिल्ला-चिल्ला के सबको बुला रहे थे। हम थोड़ा तेज़ पैर चलाते हुए आगे बढ़े, मिट्टी के खिलौनों की दुकान, बूढ़ा-बुढ़िया सिर हिला रहे थे, ग्वालिन भी थी, मिट्टी का बर्तन भी था। हमने भाव-ताव किया और आगे बढ़े। 

धीरे-धीरे हम थकने लगे हमने सोचा कहीं रुक के आराम करते हैं। तभी छोटे भाई ने कहा उधर खेल हो रहा है, वहीं देखते हुए आराम करते हैं। हम खेल के पास पहुंचे, हमने सोचा चलो खेल देखते हैं। खेल कमाल का था। एक चरखी थी जिस पर नंबर लिखे थे, नीचे कागज़ पर नंबर लिखे थे। आप जिस नम्बर पर जितने रुपये रखो अगर वो चरखी घुमाने पर आ गया तो उसके दुगना रुपये मिलते थे। हम ध्यान से देखने लगे कुछ लोगों ने रुपये लगाए, चरखी घूमी और फिर रुकी अरे, ये क्या हमारे बगल के एक आदमी ने 50 रुपये लगाए थे उसे 100 रुपये मिले। 

हम दोनों हैरान थे, यह तरीका नया था हमारे लिए साथ ही आसान और मज़ेदार भी। हम देख रहे थे फिर चरखी वाले ने ज़ोर से आवाज़ लगाई “एक का दो करो, एक का दो, लूट लो लूट लो” दोनों भाईयों ने एक दूसरे को देखा, छोटे भाई ने सुझाव दिया भैया 5-5 रुपये दोनों लोग खेल के देखते हैं अगर मिल गया तो अच्छा वरना बाकी पैसे हैं चल चलेंगे। मैं तैयार नहीं था, लेकिन छोटे भाई ने ज़िद की तो मैंने शर्त रखी कि सिर्फ एक बार खेलेंगे चाहे जीते, चाहे हारें। भाई मान गया हम दोनों ने 5-5 रुपये 7 नम्बर पर रखा, चरखी घूमने लगी और मेरा दिल बैठने लगा। मैंने डर के मारे आंख बंद कर ली और तब खोली जब भाई चिल्लाने लगा। मैंने आंख खोली, अरे ये क्या हम दोनों 10 -10 रुपये जीत चुके थे। जोश दुगना आ गया था। 

मैंने कहे अनुसार चलने को बोला लेकिन तब तक चरखी वाले ने आवाज़ लगाई, “लूट लो, लूट लो एक का दो, बच्चों ने लूट लिया” हम रुक गए, चरखी वाले ने प्रेम से समझाते हुए कहा, “लल्ला तोहार किसमत ज़ोर पै है, अउर खेलो।” मेरे छोटे भाई को ये बात समझ में आ गई। इस बार हमने 20-20 रुपये नम्बर 7 पर लगाए, भगवान का नाम लिया गया। बरम बाबा को मन ही मन प्रसाद भी मान दिया गया। चरखी घूमी मैने फिर आंख बंद कर ली, इस बार पूरे महीने की कमाई दांव पर थी। मैं भाई के चिल्लाने का इंतज़ार करने लगा, लेकिन इस बार चरखी वाले की हंसी से आंख खुली, मैंने चरखी में देखा 8 नम्बर आया है। मैं रूआंसा हो उठा 20-20 रुपये जा चुके थे।

अभी हमारे पास 10 -10 रुपये और बचे थे। छोटा भाई गुस्से में नम्बर गिन रहा था बोला ,“एक नम्बर से चूक गएन नाहीं तव 80 रुपया होई जात”, मैंने गुस्से में उसे देखा और चिल्ला के चलने को कहा। वो वहीं खड़ा रहा और कहा, “भैया एक चक्कर अउर खेला जाए जोन हारा गा है निकाल लीन जाय फीर पक्का चल देब, एक नम्बर से चुके हैं अबकी न चुकब।”  मैंने कुछ देर सोचा और फिर उसकी ज़िद के सामने टूट गया। बड़ी मुश्किल से आखिर के 10 रुपये उसे दे दिए। इस बार प्लान बदला अबकी बार दांव नम्बर 9 पर रखा गया, आखिर के 10 -10 रुपये दांव पर लग गये थे। चरखी घूमी ,चरखी के साथ दिमाग घूमा इस बार मैंने आंखें खुली रखीं और देखने लगा। चरखी रुकने वाली थी, धड़कन बढ़ने लगी। मैंने भाई के पकड़े हुए हाथ को ज़ोर से दबा दिया। रुका-रुका अरे-अरे ओऊह..!! और इस बार नम्बर 10 पर रूखी चरखी। चरखी वाले ने बिना देर करे हमारे पैसे उठा लिए। हम रोआंसे होके देखते रह गए। छोटा भाई गुस्से में बोला ,”भैया भगवान नाहीं साथ देते चलो” मैंने उसे हल्के से एक चमाट मारी और आगे बढ़ने लगा।

अब दोनों लोगों के पास एक पैसा नहीं था, शाम भी होने को थी, घर लौटना था और इस हाल में तो बस मम्मी याद आ रही थी, घर याद आ रहा था। भूख भी ज़ोरों से लग रही थी। अब जलेबी और चाशनीदार, मीठी लग रही थी। हम दोनों खाली हाथ थे और बेमन से मेले से बाहर आने लगे। हमने बहुत देर एक दूसरे से बात नहीं की, बस ज़ोर-ज़ोर एक दूसरे का हाथ कसके पकड़े पैदल चलते रहे।

भूख में गुस्सा और तेज़ लगता है ये मुझे उस दिन पता चल रहा था। हम मेले से बाहर निकले, मेरा गला सुख रहा था, गुस्से से, रोने से, प्यास से, मुझे पता नहीं बस सूख रहा था। सामने एक दुकान दिखी एक छोटा होटल था जहाँ जलेबियाँ छन रहीं थीं। वहाँ नल था मैंने कहा, “चलो पानी पिया जाए” और नीचे उतर के नल के पास आ गया। छोटा भाई नल चलाने लगा। मैंने जी भर के पानी पीया तो जाकर कुछ भूख शांत हुई। अब भाई के पानी पीने की बारी थी। मैं उसके लिए एक हाथ से पानी चलाने लगा, दूसरा हाथ मैं जेब में डाल कर रुमाल खोजने की कोशिश करने लगा। अरे अचानक मेरे चेहरे पर चमक आ गई। मैंने पानी चलाना बंद कर दिया। भाई चिल्लाने लगा मैंने उसे अनसुना करके जेब से हाथ निकाला तो मेरे हाथ में 5 रुपये का एक सिक्का और 2 रुपये का एक सिक्का..कुल मिलाकर पूरे 7 रुपये थे। भाई चौंक गया अरे ये कहाँ से आये उसने पूछा, तब मुझे याद आया अरे ये तो वो पैसे हैं जो मैं अपने बचा के चुपके से घर से लाया था। जिसे मैं भूल गया था। हम दोनों की आँखों में चमक थी। मैंने झट से 7 रुपये की जलेबी खरीदी और दुकान से बाहर जलेबी मेज पर रखी और खाने के लिए उठाया। जलेबी में आज दुगनी मिठास लग रही थी। हमने एक दूसरे को देखा और आँखों ही आँखों में एक दूसरे से वादा किया कि अब कभी दांव नहीं खेलेंगे।

फीचर्ड फोटो आभार: दैनिक भास्करटाइम्स ऑफ़ इंडिया

Author

  • शिवांशु, उत्तर प्रदेश के गोंडा ज़िले के रहने वाले हैं। शिवांशु अलग-अलग सामाजिक संस्थाओं के साथ पिछले 6 वर्षों से बच्चों की शिक्षा और पुस्तकालय विकास पर काम कर रहे हैं। हाशिए के समुदायों के युवाओं और बच्चों तक शिक्षा पहुँच सके इस बात को सुनिश्चित करने के लिए लाइब्रेरी एजुकेशन, पियर एजुकेशन आदि शैक्षणिक करिकुलम बनाने का काम करते हैं। शिवांशु अवध यूथ कलेक्टिव के साथी हैं और गोंडा में सरयू फाउंडेशन के डायरेक्टर हैं।

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