सामाजिक परिवर्तन शाला के व्हाट्सऐप ग्रुप पर, कर्नाटक में हिजाब के विवाद पर हुई चर्चा के दौरान साथियों ने अपने विचार रखे, जिन्हें यहाँ संकलित किया गया है।

शिवजी: राजनीति और शिक्षा क्षेत्र में अंतर होता हैl भारत में विभिन्न धर्म और जाति के लोग रहते हैं। सभी की धार्मिक भावनाओं में भी अन्तर होता हैl यदि शिक्षा में धर्म को महत्व दिया जाएगा तो सभी धर्म और जाति के लोग अपनी-अपनी मांगे रखेंगे, अपने-अपने धर्म के अनुसार ड्रेस पहनेंगे, तो सभी के मन में धार्मिक कट्टरता होगी। बाद में यही धार्मिक कट्टर बीज बड़ा होकर गृह युद्ध जैसे हालत कर देगा। भारत में सभी को धार्मिक स्वतंत्रता दी गई है। उसका सही उपयोग ही करे। धार्मिक जगह पर उसका उपयोग करे पर शिक्षा के क्षेत्र में नहीं। गुरुकुल और मदरसे धार्मिक संस्थान हैं, तो वहां धार्मिक वस्त्र धारण किए जा सकते है। किसी पर कोई रोक-टोक भी नहीं होगी।

सौरभ: चूंकि एक अच्छी बहस हो सकती है तो मैं भी कूद रहा हूँ, कुछ बातों के साथ। आशा है समझ बढ़ेगी। धर्म को शिक्षा प्राप्त करने की जगह (या सामुदायिक स्थलों की बात करें) पर तो नहीं प्रैक्टिस करना चाहिए। पर ये ज़िम्मेदारी नागरिकों से कहीं ज़्यादा राज्य के लिए है – तो पुलिस थाने में, कोर्ट में, सरकारी ऑफिस में, वग़ैरह स्थानों पर राज्य पंथ निर्पेक्षता का पालन करने के लिए मजबूर है। वहाँ लाउडस्पीकर लगा कर कोई भी भगवान की पूजा, या धार्मिक भाषण देना, ये सब ठीक नहीं, यह संविधान की भावना से विपरीत है। इन जगहों पर सरकारी नुमाइंदे क्या धर्म आधारित कपड़े, टीका, जेनेउ वगैरह नहीं धारण करते? निश्चित ही करते रहे हैं। 

मुसलमान और अल्पसंख्यक, और अन्य शोषित समुदायों के कुछ मूल अधिकार खास हैं, क्योंकि हमारे इतिहास में कई रीति-रिवाज़ों का स्थान है, और हमने अपने लोगों के अधिकारों को महत्व दिया है। जब देश के गठन में कई धर्म और राज्य की स्थिति की बातें हुई – तो बड़ा स्थान राज्य के रवैये पर दिया गया है। नागरिक पूरी तरह से अपने हिसाब से अपने धर्म को प्रैक्टिस/पालन कर सकते हैं। चूंकि हमारी ज़्यादातर जनता धार्मिक है, तो उसे मनाना (या सबका त्योहार मनाना) जैसी बातें चलन में आई हैं। 

हिजाब अच्छा है या बुरा, छात्राओं को कॉलेज में पहनना चाहिए या नहीं ये मुद्दा नहीं है। ज़्यादा फोकस में मुसलमान महिलाओं को सरकारी तंत्र द्वारा ये कहना है कि वो चाहें तो भी उन्हें इसे मानने की, पहनने की आज़ादी नहीं है। वहीं जनेऊ धारण करके पंडित जी प्रोफेसर बन गए, अपने जैसे लोगों को भर लिया, और स्टाफरूम में बैठ कर सबको हँसते हुए कहते रहे – “धर्म और जाति बहुत बुरी है। ये लोग तो ऐसे ही होते हैं।”

देवेंद्र भाई: और यदि हिन्दू लड़कियाँ कहें कि हम भी घूंघट पहन कर कॉलेज जाएंगी तो हमारा क्या कहना होगा? मेरा विचार है कि घूंघट हो या हिजाब इसका विरोध होना चाहिये। पर ज़बरदस्ती करने की जगह महिलाओं पर छोड़ देना चाहिये और उन्हे तार्किक/प्रगतिशील शैक्षिक माहौल मिले, यह तय करना चाहिये। ज़बरदस्ती वहाँ की जानी चाहिये जहाँ किसी की जान पर बनी हो या किसी बड़े सामाजिक ख़तरे का अंदेशा हो। जैसे कोई महिला अभी भी सती होना चाहे या पुरुष उसे सती करने पर आमादा हों तो उसे ज़बरदस्ती रोकना ही होगा। एकदम से धार्मिक रिवाज़ों को रोकना हमारे देश में सम्भव नहीं है और सबसे ज़्यादा जिन धार्मिक रिवाज़ों को पाला-पोसा जाता है, वो हिन्दू रिवाज़ हैं।

एलीन: मैं इसको इस तरह से भी देख रही हूं, यह सत्ता और संसाधनों को बचाये रखने की लड़ाई है, न कि पंथनिरपेक्ष होने या न होने की। क्योंकि जो सत्ता और संसाधनों पर काबिज़ लोग हैं और जिनके द्वारा राज्य भी चलता है, यह लोग भयंकर असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। क्योंकि उन्हें पता है कि हमेशा से यह शोषित वर्ग अब उनके सुरक्षा के कवच को तोड़ने की शक्ति रखता है। यह शक्ति संविधान प्रदत भी है। संविधान से उनको डर लगता है। धर्म की राजनीति, शोषण और भेदभाव को बढ़ावा देकर सत्ता और संसाधनों पर कब्ज़ा बनाये रखने का ज़रिया है। इसलिये विरोध करना ज़रूरी है। 

महिपाल: धर्म नागरिकों की स्वतंत्रता का विषय है। हर किसी को इसकी आज़ादी है, लेकिन सवाल यह है कि क्या सभी सरकारी संस्थानों में इस पर रोक लगना ज़रूरी है या नहीं? आज कर्नाटक में जिस तरह एक मुस्लिम लड़की, जो बुरखा पहनकर स्कूल में आती दिख रही और जॉम्बीज़ की तरह, सैकड़ों लड़के गले में भगवा गमछा डाले जय श्री राम के नारे लगाते उसकी ओर भाग रहे हैं…!! वह लड़की अल्लाह हू अकबर कह रही है। ये तो बात सही है संसाधनों पर काबिज़ लोग इसे बढ़ावा देते आए हैं, ताकि संसाधनों पर उनका वर्चस्व बना रहे, लेकिन ये अब केवल वही नहीं रह गया है। आज ये एक दूसरे को नीचा दिखाने और अपने को सर्वश्रेष्ठ दिखाने की बात भी बन चुकी है।

एलिन: सही कह रहे हैं, खुद को श्रेष्ठ समझना और दूसरे को नीचा दिखाने की एक सोच बन रही है, हमारे समाज में भी यह बनते हुए दिख रही है। इस सोच को तोड़ना ही है। देवेंद्र भाई से सहमत हूँ कि एक तार्किक/प्रगतिशील शैक्षिक माहौल तैयार करना ज़रूरी है।

रासमनी: अगर सभी स्टूडेंट अपने-अपने धार्मिक वस्त्र पहनने लगेंगे तो हमरे संविधान, कानून,एकता, धर्मनिरपेक्षता और अनुशासन का क्या महत्व रहेगा? अगर ऐसे ही रहा तो कोई भी, कहीं भी और कभी भी अपनी मनमानी करेगा। इसलिए हम सभी को भारत के संविधान पर निर्भर रहना चाहिए। जय हिन्द। 

वीरेंद्र भाई: हिन्दू-मुस्लिम-सिख-ईसाई, आपस में है भाई-भाई  इस आधार पर स्कूल में हिजाब पहनकर जाना कोई विवाद का विषय नहीं होना चाहिए।

छोटू सिंह रावत: एक प्रदेश का मुख्यमंत्री अपने धार्मिक कपड़े पहनकर जा रहा है। इससे 5 साल में पूरे देश में धर्म के प्रति कट्टरता बढ़ी है और इस तरह अगर स्कूल में एक विशेष धर्म के बच्चे बुरखा या टोपी पहनकर जायेंगे या फिर अन्य धर्म के बच्चे धार्मिक वस्त्र पहनेंगे तो इससे धर्मों के प्रति कट्टरता बढ़ेगी। अलग-अलग धर्म के बच्चों के बीच में आपसी दोस्तियां, प्रेम बिल्कुल भी नहीं होगा। इसलिए इस तरह से बिल्कुल भी नहीं होना चाहिए।

जयमंती: अगर सभी धर्मों के बच्चे इस तरह धार्मिक वस्त्र धारण कर स्कूली शिक्षा ग्रहण करने जाने लगे तो धर्मों के प्रति कट्टरता तो बढ़ेगी, राजनीति स्तर पर जाति विवाद होते ही हैं। तब फिर सबसे ज़्यादा स्कूलों में जाति विवाद बढ़ेंगे, ख़ासकर दलित और आदिवासी समुदाय शिक्षा से फिर से वंचित हो जाएंगे, क्योंकि स्कूलों में बहुत ही कम दलित और आदिवासी समाज के लोग शिक्षक हैं, इसलिए बुरा असर इन्हीं समुदायों पर पड़ सकता है।

महिपाल: मैं वैसे तो इसका विरोध करता हूं, किसी भी संस्थान में धार्मिक कार्य, पूजा-पाठ, नमाज़, आदि नहीं होने चाहिए। लेकिन मुस्लिम समुदाय की बात करें तो भारत में कई परिवार ऐसे हैं जो महिलाओं को आज भी बिना हिजाब के घर से बाहर जाने की इजाज़त नहीं देते। अब सवाल ये भी है कि क्या इसके कारण उनको शिक्षा से दूर कर दिया जाये? इन परिवाओं से आज कई लड़कियाँ, इसी शर्त पर बाहर निकाल पा रही हैं और पढ़ पा रही है कि वह हिजाब लगाएंगी, तब ही बाहर निकल पाएँगी। अब अगर हिजाब पर पाबंदी लगा देंगे तो उनका क्या होगा?

छोटू सिंह रावत: मेरे हिसाब से मदरसों को बन्द कर देना चाहिए, इस पर मैं गलत भी हो सकता हूं लेकिन मुझे लगता है इस तरह मदरसों की वजह से लड़के और लड़कियों को जो समान शिक्षा मिलनी चाहिए, इससे यह लोग वंचित हैं। मदरसों में धार्मिक वस्त्र पहनकर जाना, नमाज़ पढ़ना, इससे इनमें कट्टरता बढ़ती है, और लड़कियों के पहनावे, बाहर निकलने, प्रेम, दोस्ती, रिश्ते बनाने और स्वतन्त्र रूप से रहने पर पाबंदी लगती है। यह मेरे निजी विचार हैं, शायद मैं गलत भी हो सकता हूं। मेरा मतलब किसी धार्मिक भावना को ठेस पंहुचाने का नहीं है।

महिपाल: मैं नहीं जानता कि मदरसों में क्या पढ़ाया जाता है, जो साथी जानते हैं, वह इस पर प्रकाश ज़रूर डालें, लेकिन ये तो देखा ही है कि आज भी देश भर में लगभग सभी स्कूलों में सरस्वती पूजा की जाती है। क्या उस पर भी सवाल नहीं होना चाहिए? लगभग हर बैंक, पुलिस स्टेशन अन्य कई सरकारी संस्थानों में भी ना केवल पूजा-पाठ किया जाता है बल्कि देवी-देवताओं के फ़ोटो भी लगाए जाते हैं, तो क्या वह सही है? स्कूलों में सरस्वती वंदना भी की जाती है, और गुरुकुलों में क्या पढ़ाया जाता वह भी जानना होगा। 

शिवजी: मैंने एक विडियो देखा जिसमें कुछ लड़के गले में भगवा गमछा डाल कर जय श्रीराम के नारे लगा रहे हैं और एक लड़की उनके सामने हिजाब पहनकर अल्ला हू अकबर के नारे लगा रही हैl इसमें राम और अल्ला नहीं हैं, यह उनका निजी मामला है फिर भी अल्ला और राम को बीच में ला रहे हैंl

यह वही बच्चें हैं जो स्कूल-कॉलेज में साथ में पढ़ते हैं। पर आज अपने-अपने धार्मिक कट्टरता के कारण एक-दूसरे का विरोध कर रहे हैंl इसका प्रभाव राजनीतिक, समाजिक और विश्व स्तर पर भी पड़ रहा है कि भारत एक धार्मिक स्वतंत्रता वाला नहीं बल्कि धार्मिक कट्टरता वाला देश बन रहा है। पहले राजनीतिक क्षेत्र में धार्मिक कट्टरता होती थी, अब शिक्षण संस्थानों में भी धार्मिक कट्टरता बढ़ रही हैं। अब तो वस्त्र को पहनने को लेकर विवाद हो रहा है। बाद में शिक्षक को लेकर भी विवाद हो सकता है कि हमे हमारे जाति, धर्म का शिक्षक चाहिए्। ऐसे में तो भारत फिर से जातिवादी और धर्म आधारित शिक्षा व्यवस्था में आ जाएगा। अगर बच्चे स्कूल-कॉलेज में ही कट्टर हो जाएंगे, तो बड़े हो कर कितने कट्टर बनेंगे यह सोचने वाली बात है।

भारत में सभी धर्म का सम्मान होना चाहिए। परन्तु शिक्षण संस्थान में सभी बच्चों को समान शिक्षा मिले तो उसके लिए शिक्षण संस्थानों को धार्मिक पहनावे से दूर रहना चाहिए। केवल स्कूल-कॉलेज यूनिफॉर्म होनी चाहिए। जिससे सभी समान दिखेंगे और उनके मन में धार्मिक कट्टरता भी उत्पन्न नहीं होंगी।

मन बहुत दुःखी हो गया है, जो मन में सोचा था वही विडियो में देखा कि भविष्य में स्कूल-कॉलेज में तिरंगे की जगह पर अपने धर्म का झंडा फहराया गया।  ये तो मेरे सोचने से पहले ही हो गया है, कर्नाटक में स्कूल के बच्चों ने अपना धार्मिक झंड़ा फेहरा दिया है। इस से बड़ी भारत के लिए दुर्भाग्य की बात क्या हो सकती हैl देश बहुत बढ़िया तरक्की की रहा पर चल दिया है! शिक्षण संस्थान में अंदोलन हो रहे हैं, पर शिक्षा के लिए नहीं धार्मिक स्वतंत्रता के लिएl अब हमारे नेताओं को अलग हिंदू-मुस्लिम करने के लिए भड़ाकाऊ भाषण देने की आवश्यकता नहीं है l यह अब स्कूल-कॉलेज में ही सीख लेंगेl

दशरथ भाऊ: हिजाब पहनना या ना पहनना हर एक का सांवैधानिक अधिकार है। हर व्यक्ति स्वतंत्र है। हमें क्या खाना है, क्या पहनना है, क्या बोलना है, क्या लिखना है, कौन से धर्म का आचरण करना है;  इन सभी बातों की स्वतन्त्रता, भारतीय संविधान ने हमें प्रदान की है। इस पर कोई भी रोक नही लगा सकता, सरकार भी नहीं। कर्नाटक की लड़कियां सही हैं। गुंडागर्दी करके उनका हक नहीं छीना जा सकता। हमें उनके साथ खड़े होने की ज़रूरत है।

लाल प्रकाश राही: हम महिला की आज़ादी के पक्षधर हैं। आज़ादी का मतलब है हर प्रकार की गुलामी से मुक्ति, यहां तक कि धार्मिक मानसिक गुलामी से भी मुक्ति। हिजाब, पितृसत्ता के द्वारा हज़ारों साल पहले महिलाओं पर थोपी गई एक व्यवस्था है, कमोबेश ऐसी व्यवस्थाएं सभी धर्मों में मुझे साफ दिखाई देती हैं। अभी जो कर्नाटक में हो रहा है वह सही नहीं है, हमें उस धर्म के मानने वालों पर इसे छोड़ देना चाहिए।  किसी दूसरे धर्म की मान्यताओं, रूढ़ियों के विरुद्ध किसी दूसरे धर्म के मानने वाले आरोप-प्रत्यारोप करें, मुझे नहीं लगता कि यह सही है। पेरियार रामा नयाकार स्वामी ने बाबा साहेब डॉ. भीम राव अंबेडकर से कहा था कि हिंदू धर्म छोड़ने के बाद आप हिंदू धर्म की आलोचना नही कर सकते। आप तभी तक उसकी आलोचना कर सकते हैं, जब तक आप उस धर्म के अंदर रहते हो या फिर उससे आप सीधे तौर पर प्राभावित होते हो। 

एक कहावत प्रचलित है कि पहले अपने घर की बुराई खत्म करो, फिर दुसरे के घर में झांको। अपना दामन खुद दागदार हो और दूसरे के दामन का दाग मिटाने जाए, क्या यह सही है? हिंदू धर्म के अंदर खुद हजारों बुराइयां, कुरीतियां है, और हम दुसरे की बुराई, (गंदगी) साफ करने चले है तो यह बिल्कुल गलत तरीका है। दरअसल यह सब पांच राज्यों के विधान सभा चुनाओें के मद्देनजर हो रहा है। कर्नाटक में हिजाब विवाद का मकसद पांच राज्यों में हिंदू-मुस्लिम वोटों का पोलोराईज़ेशन यानि कि ध्रुवीकरण करना है। मतलब साफ़ है कि यह केवल हिंदू – मुस्लिम वोट को दो ध्रुवों में बाँटने की कुत्सित राजनीति है, इस बात को भी हमें समझना पड़ेगा। 

मेरा यह मानना है कि हिजाब के विरुद्ध, मुस्लिम महिलाओं के बीच से ही आवाज़ उठनी चाहिए थी न कि हिंदू पुरुषों के बीच से। यदि हिजाब के खिलाफ मुस्लिम महिलाएं विरोध करती तो सभी इस आंदोलन का समर्थन करते। कुछ वैसे ही जैसे हिंदू धर्म के अंदर जाति आधारित विवाह। कमोबेश भारत के सभी राज्यों में हिंदू समाज के अंदर घूंघट की प्रथा आज भी मौजूद है, जैसे राजस्थान में घूंघट प्रथा बहुत प्रबल है, राजस्थान के पुरुष उसके विरोध में क्यों नहीं बोलता? हिंदुओं को बोलना चाहिए।

फीचर्ड फोटो आभार: द इंडियन एक्सप्रेस

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