बजट 2022 – पैसा आए कहाँ से, पैसा जाये कहाँ रे?

राहुल:

अक्सर यह कहा जाता है कि हमारे देश में केवल अमीरों द्वारा ही टैक्स भरा जाता है। किसान, मज़दूर व अन्य गरीब वर्ग कुछ टैक्स नहीं भरते। इसके बावजूद इन्हे सरकार सबसिडी और मुफ्त का भोजन, बिजली देती रहती है। टैक्स न भरने के कारण, असल में गरीबों को सरकार से कुछ भी मदद की उम्मीद करने का अधिकार नहीं है। लेकिन यदि हम इस साल के केंद्रीय बजट का विश्लेषण करें तो मामला कुछ उल्टा ही है। चलिए इसे समझते हैं। 

सरकार के पास खर्च करने के लिए राजस्व (धन) कहाँ से आता है? 

सरकार के पास राजस्व मुख्यतः दो प्रकार से आता है। एक तो तरह तरह के करों (टैक्स) से आता है और दूसरा कुछ गैर-कर राजस्व होता है। सरकार, यह टैक्स या तो लोगों की व्यक्तिगत आय पर लगाती है या फिर व्यवसाय करने पर हुए मुनाफे पर या वस्तुओं और सेवाओं का विक्रय मूल्य पर। वस्तुओं और सेवाओं पर लगाए गए कर को अप्रत्यक्ष कर कहा जाता है क्योंकि यह लोगों द्वारा किया गया व्यय पर लगता है इसलिए यह सीधे सीधे दिखता नहीं है जैसे कि आए पर लगाए गए कर जिन्हें प्रत्यक्ष कर कहा जाता है।

गैर-कर राजस्व आय वह होती है जो सरकार को अपनी सेवाएँ प्रदान करके मिलती हैं, जैसे डाक सेवा, स्वास्थ्य, शिक्षा, बिजली या व्यवसायियों को सरकारी सुविधा के इस्तेमाल आदि से होने वाली आय। इसमें विभिन्न प्रकार की लाइसेंस फीस भी शामिल है। साथ ही सार्वजनिक इकाइयों को बेच कर होने वाली आय भी गैर कर राजस्व में शामिल है। 

इन सब से एकत्रित की गई धन राशि का कुछ हिस्सा राज्यों को दिया जाता है और कुछ केंद्र सरकार रखती है। 2022-23 के इस बजट के अनुसार राज्यों का हिस्सा निकालकर, केंद्र सरकार के हिस्से में 25,17,456.48 (पच्चीस लाख सत्रह हज़ार चार सौ छप्पन पॉइंट चार आठ) करोड़ रुपये आने का अनुमान है। इसमें से केवल 4,76,198 करोड़ रुपये व्यक्तिगत आयकर से एकत्रित होना है, जो कि कुल राजस्व का केवल 19% है। 

बाकी 81% राजस्व, व्यवसाय के मुनाफे, वस्तुओं और सेवाओं के विक्रय मूल्य पर लगाए गए अप्रत्यक्ष कर(38%) व व्यावसायिक निगमों के मुनाफे पर लगाए गए कर(20%) और गैर कर राजस्व आय(23%) से प्राप्त हुआ है। यह याद रखना होगा कि व्यावसायिक गतिविधि के मुनाफे पर लगा कर, प्रत्यक्ष होने पर भी अंततः उन सब लोगों द्वारा भरा जा रहा है जो इनके द्वारा बेचा जा रहा सामान और सेवाओं को खरीदते हैं और इसलिए यह वस्तु और सेवाओं के विक्रय मूल्य पर लगे कर के जैसे ही सभी लोगों द्वारा अदा किया जाता है।  तो आप और हम जब भी कोई सामान या सेवा खरीदते हैं तो उसकी कीमत में कुछ हिस्सा उस पर लगे अप्रत्यक्ष कर और व्यावसायिक निगमों के मुनाफे पर लगे प्रत्यक्ष कर के रूप में सरकार को अदा करते है। 

इस प्रकार, केंद्र सरकार के राजस्व का 81% हिस्सा देश के सभी नागरिकों (उपभोक्ताओं) द्वारा दिया जाता है, जिसमें गरीब मज़दूर, किसान, एकल महिलाएं, वृद्ध आदि भी शामिल हैं, क्योंकि वे भी सामान और सेवाएं खरीदते हैं। वास्तव में, चूंकि गरीब अपनी लगभग सारी आय बिना किसी बचत के खर्च कर देते हैं और उनमें से कई कर्ज में डूबे होते हैं, वे अंत में अमीरों की तुलना में अपनी आय का और बड़ा हिस्सा अप्रत्यक्ष करों के रूप में चुकाते हैं।

अगली बार जब आप सुनें कि किसान और मज़दूर टैक्स नहीं भरते तो यह बात ज़रूर याद रखिएगा। 

पैसा जाये कहाँ रे? 

अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि राजस्व और ऋण के रूप में एकत्र किए गए इस धन को सरकार कैसे खर्च करती है। केंद्र सरकार का कुल राजस्व व्यय 35,08,291.8 करोड़ रुपये है। एक दिलचस्प तथ्य यह है कि इस कर संग्रह की लागत एकत्रित करों का 2% है। आप देखेंगे कि यह प्रस्तावित खर्च, आय से लगभग 10,00,000 करोड़ अधिक है यानि यह राजस्व घाटा कुल राजस्व आए का लगभग 39% है ! इसे पूरा करने के लिए सरकार कर्ज़ लेती है और नोट छापती है। नोट छापने से अर्थव्यवस्था में नोटों की संख्या बढ़ जाती है, महंगाई और बढ़ जाती है। नोट छापने के बारे में कहा यह जाता है कि अर्थव्यवस्था में और तेजी आने के कारण इस बढ़ी हुई नोटों की संख्या अधिक उत्पादन में खप जाएगी पर ऐसा नहीं होता। जैसे कि आगे देखेंगे कि राजस्व खर्च सही ढंग से न होने के कारण अर्थव्यवस्था कमजोर रहती है और इसलिए महंगाई बढ़ती है जिसकी मार भी अधिक गरीबों पर अधिक पड़ती है। 

सरकार यह कर्ज़ कहाँ से लेती है? सरकार बैंकों से लेती है जिसमें करोड़ों लोगों के छोटे बचत खातों का पैसा होता है, कर्मचारियों के प्रोविडेंट फ़ंड से भी लेती है, भारतीय रिज़र्व बैंक से भी लेती है और विदेशी संस्थानों से भी लेती है। हालांकि आजकल इस विदेशी कर्ज़ का हिस्सा कुल खर्च का केवल 1% ही है। 

सरकार के खर्चों का सबसे बड़ा हिस्सा, सरकार द्वारा लिए गए ऋण पर चुकाया जाने वाला ब्याज है जो कुल राजस्व व्यय का 27.2% है। यदि सरकारी खर्च गरीबों के लाभ के लिए होता तो इस भारी कर्ज के बोझ को जायज ठहराया जा सकता था। हालाँकि, जैसा कि हम नीचे देखेंगे, ऐसा नहीं है।

कृषि और संबद्ध सेवाएं जिनमें वानिकी भी शामिल है, कुल राजस्व व्यय का 10.6% है। हालाँकि, इसमें वानिकी और वृक्षारोपण का हिस्सा, जिसे जलवायु परिवर्तन शमन की आवश्यकता को देखते हुए अधिक महत्व दिया जाना चाहिए, कुल राजस्व व्यय का केवल 0.02% है।

इससे भी अधिक चौंकाने वाली बात यह है कि देश की खाद्य और जल सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए मिट्टी और जल संरक्षण पर होने वाला व्यय, कुल व्यय का केवल 0.001% है। यह दुखद है क्योंकि वनीकरण और मिट्टी और जल संरक्षण पर खर्च से ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले करोड़ों लोगों के लिए रोज़गार का सृजन हो सकता है और इस तरह वहां व्याप्त आजीविका की समस्या को कुछ हद तक हल किया जा सकता है।

हालांकि मनरेगा के लिए प्रावधान किया गया है, पर यह कुल खर्च का केवल 2.1% है और ग्रामीण क्षेत्रों में भारी बेरोज़गारी को देखते हुए यह बेहद अपर्याप्त है। वास्तव में शहरी क्षेत्रों में बेरोज़गारी के उच्च स्तर को देखते हुए एक शहरी रोज़गार कार्यक्रम का प्रावधान भी होना चाहिए।

इसी प्रकार, वृहद और मध्यम सिंचाई पर व्यय, कुल व्यय का 0.24% है जो पूर्ण रूप से अपर्याप्त है। इससे भी अधिक हास्यास्पद है लघु सिंचाई के लिए प्रावधान जो कि बड़ी और मध्यम सिंचाई की तुलना में कई गुणा अधिक कुशल और न्यायसंगत है जो कि कुल खर्च के केवल 0.01% है।

कृषि और संबद्ध सेवाओं में सबसे बड़ा व्यय, रासायनिक उर्वरकों और खाद्य खरीद व भंडारण के लिए दिए जाने वले अनुदान हैं, जो कुल राजस्व व्यय का 9.2% है। हालांकि यह अनुदान उर्वरक बनाने वाली/भंडारण करने वाली कंपनियों को दिया जाता है, फिर भी ये किसानों और गरीब लोगों को कुछ राहत प्रदान करता है। लेकिन किसान को अपने उत्पादों के लिए मिल रही अलाभकारी कीमतों और पारिस्थितिक अस्थिरता से उत्पन्न कृषि के संकट को हल करने में, यह कदम सक्षम नहीं हैं।

शिक्षा पर व्यय कुल राजस्व व्यय का केवल 1.5 प्रतिशत है तथा श्रम एवं कौशल विकास पर व्यय 0.5 प्रतिशत है। स्वास्थ्य पर व्यय कुल राजस्व व्यय का 1.2% है। यह अत्यंत निंदनीय है। विज्ञान, प्रौद्योगिकी और पर्यावरण पर व्यय भी निराशाजनक होकर कुल राजस्व व्यय का केवल 0.9% है। इस प्रकार राष्ट्र की ज्ञान सुरक्षा के महत्वपूर्ण क्षेत्र को कुल राजस्व व्यय का केवल 2.9% हिस्सा दिया गया है। प्रशासन, पुलिस, न्याय, रक्षा और अन्य सेवाएं और पेंशन पर व्यय, जो व्यापक रूप से राज्य प्रणाली और इसे अपने हित के लिए चलाने वाले अमीर वर्ग की सुरक्षा से संबंधित हैं, कुल राजस्व व्यय का 19% है। बाकी राजस्व व्यय औद्योगिक विकास, संचार, ऊर्जा, यातायात – जिसमें रेल भी शामिल है, कुछ विशेष क्षेत्रीय विकास आदि पर किया जाता है। इस राजस्य व्यय से अगर लोगों की उत्पादकता बढ़ती है तो सरकार को करों से होने वाली आय भी बढ़ेगी और भविष्य में लोगों और सरकार की आर्थिक स्थिति में प्रगति होगी। पर क्योंकि कृषि, भोजन सुरक्षा, आजीविका सुरक्षा, ज्ञान सुरक्षा और स्वास्थ्य सुरक्षा में पर्याप्त व्यय नहीं हो रहा है इसलिए उत्पादकता में वृद्धि आशानुरूप न होकर सरकार और लोगों की माली हालत दिन ब दिन और बदतर होते जा रही है। फलस्वरूप सरकार का कर्ज और ब्याज अदायगी का बोझ, जिसे वित्तीय घाटा कहा जाता है, बढ़ते जा रहा है और इसलिए वास्तविक खर्च का हिस्सा कम हो रहा है।

राजस्व खर्च के अलावा सरकार बुनियादी ढांचे को मजबूत करने के लिए भी खर्च करती है जिसे पूंजीगत खर्च कहा जाता है। जैसे हाइवे, रेल, बिजली, संचार आदि। आइये समझते हैं कि इसमें कितना खर्च होता है। 

बुनियादी ढांचे में जो पूंजी लगाई जाती है वह अधिकतर ऋण द्वारा आती है न कि सरकारी अनुदान से क्योंकि सरकार कर राजस्व से अपना राजस्व खर्च ही नहीं पूरा कर पाती है। यह बिलकुल न्यायोचित नहीं है क्योंकि इस ऋण का बोझ गरीबों को भी उठाना होता है(जैसा पहले समझाया जा चुका है)। इस बजेट में पूंजीगत व्यय 7857068 करोड़ रुपए अनुमानित हैं। इसमें से 90% ऋण वापसी में खर्च होगा। जी हाँ 90% वापिस चला जाएगा। और 2.2% सुरक्षा, पुलिस और गवर्नेंस पर खर्च होगा। केवल 7.8% ही बचता है बुनियादी ढांचे में निवेश के लिए जो केंद्र सरकार के खुद के द्वारा और राज्यों और केंद्र शासित क्षेत्रों को दिए गए ऋणों के द्वारा संपादित होता है। 

इस प्रकार, राज्य और उसके शासकों की सुरक्षा की तुलना में देश के लोगों के भोजन, ज्ञान, आजीविका और पारिस्थितिकी सुरक्षा की घोर उपेक्षा इस बजट में की जा रही है। इसी के चलते यह हाल है कि देश में केवल 1 करोड़ लोग ही ऐसे हैं जिनकी प्रति वर्ष आय 5 लाख रुपयों से अधिक है और ये ही सरकार को व्यक्तिगत आय कर देते हैं। देश कि कुल आय का 60% हिस्सा इन्ही 1 करोड़ लोगों के पास है। सबसे अमीर 1% लोगों की कुल संपत्ति देश के निचले 50% लोगों की कुल संपत्ति की 96 गुणा है!! 

यह कोई नई बात नहीं है क्योंकि आजादी के बाद से लगातार इसी प्रकार के बजट पेश किए गए हैं, बल्कि समय के साथ गरीबों के हित में किया जानेवाला व्यय और कम होते गया है। यह ही कारण है कि आज भी हमारा देश शिक्षा, स्वास्थ्य और आय के सूचकांकों की विश्व सूची में निचले पायदान पर है। देश में बढ़ती भुखमरी, आर्थिक विषमता, और फुटकर मजदूरों की संख्या, बच्चों और महिलाओं का कुपोषण, बेरोजगारी, शिक्षा और स्वास्थ्य का अभाव  – इस बजेट से तो नहीं लगता कि इन पर कुछ भी असर होने वाला है।

Author

  • राहुल बैनर्जी पिछले चार दशकों से विभिन्न जन संगठनों के साथ जुड़कर पश्चिमी मध्य प्रदेश के आदिवासी समुदायों के बीच उनके अधिकार और विकास सुनिश्चित करने के लिए प्रयासरत है। वे शोध एवं जमीनी कार्यक्रमों के क्रियान्वयन द्वारा प्राकृतिक संसाधनों को सुरक्षित रख कर किया जाने वाला निरंतर विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य एवं सामाजिक, आर्थिक व लैंगिक न्याय के क्षेत्र में कार्य करते है। webpage: https://www.rahulbanerjeeactivist.in/ blog: http://anar-kali.blogspot.com

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