अनिल वर्मा:

(अनिल वर्मा की पुस्तक ‘बटुकेश्वर दत्त-भगत सिंह के सहयोगी’ से उद्धृत; नेशनल बुक ट्रस्ट)

पिछले कुछ सालों से जब फेसबुक पर भगत सिंह की शहादत को याद करने की रस्म अदायगी देखता हूं, तो बटुकेश्वर दत्त याद आ जाते हैं। वही बटुकेश्वर दत्त जिन्होने 1929 में अपने साथी भगत सिंह के साथ मिलकर अंग्रेजी सेंट्रल लेजिस्लेटिव एसेम्बली में बम फेंक कर इंकलाब ज़िंदाबाद के नारों के साथ जिंदगी भर को काला-पानी तस्लीम किया था और वही बटुकेश्वर दत्त जिन्हे इस मृत्युपूजक और मूर्तिपूजक देश ने सिर्फ इसलिए भुला दिया क्योंकि वे आज़ादी के बाद भी ज़िंदा बचे रहे थे।

भगत सिंह की माँ विद्यावती दिल्ली के अस्पताल में बटुकेश्वर दत्त को दुलारते हुए।

शायद ये देश अपने नायकों के ज़िंदा रहते उनकी कद्र करना नहीं जानता। तभी बटुकेश्वर जैसे क्रांतिकारी को आज़ादी के बाद जिंदगी की गाड़ी खीचने के लिए कभी एक सिगरेट कंपनी का एजेंट बनकर पटना की गुटखा-तंबाकू की दुकानों के इर्द-गिर्द भटकना पड़ता है तो कभी बिस्कुट और डबलरोटी बनाने का काम करना पड़ता है। जिस आदमी के ऐतिहासिक किस्से भारत के बच्चे-बच्चे की ज़ुबान पर होने चाहिए थे, उसे खुद एक मामूली टूरिस्ट गाइड बनकर गुजर-बसर करनी पड़ती है।

पटना में अपनी बस शुरू करने के विचार से जब वे बस का परमिट लेने की खातिर पटना के कमिश्नर से मिलते हैं तो कमिश्नर उनसे उनके बटुकेश्वर दत्त होने का प्रमाण मांगता है। ये अलग बात है कि जब ये बात देश के राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद को पता चलती है तो वे व्यक्तिगत रूप से इस पर खेद जताते हैं और कमिश्नर साहब भी माफी मांग लेते हैं। भला हो उनकी पत्नी की नौकरी का जिसकी वजह से गाड़ी का कम से कम एक पहिया तो घूमता ही रहा।

1964 में बटुकेश्वर दत्त के बीमार होने पर उन्हे पटना के सरकारी अस्पताल ले जाया जाता है, जहां उन्हे बिस्तर तक नहीं नसीब होता। इस पर उनके मित्र और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी चमनलाल आज़ाद एक अखबार के लिए गुस्से भरा लेख लिखते हैं कि हिन्दुस्तान इस काबिल ही नहीं है कि यहां कोई क्रांतिकारी जन्म ले। परमात्मा ने बटुकेश्वर दत्त जैसे वीर को भारत में पैदा करके बड़ी भूल की है। जिस आज़ाद भारत के लिए उसने अपनी पूरी ज़िंदगी लगा दी उसी आजाद भारत में उसे ज़िंदा रहने के लिए इतनी जद्दो-जहद करनी पड़ रही है।

इसके बाद पंजाब सरकार ने अपनी तरफ से दत्त के इलाज के लिए एक हज़ार रूपए दिए और दिल्ली या चंडीगढ़ में उनका इलाज करवाने की पेशकश भी की। लेकिन बिहार सरकार ने तब तक उन्हे दिल्ली नहीं जाने दिया जब तक कि मौत उनके एकदम करीब नहीं पहुंच गयी। अंतत: हालत बिगड़ने पर 22 नवंबर 1964 को उन्हे दिल्ली सफदरजंग हास्पिटल लाया गया। यहां दत्त ने पत्रकारों से कहा कि मैंने सपने में ही नहीं सोचा था कि जिस दिल्ली में मैने बम फेंक कर इंकलाब ज़िंदाबाद की हुंकार भरी थी, वहीं मै अपाहिज की तरह लाया जाऊंगा।

दिसंबर में उन्हे एम्स में भर्ती करा दिया गया जहां उन्हे कैंसर होने की बात पता चली। यहीं जब पंजाब के मुख्यमंत्री बटुकेश्वर दत्त से मिलने पहुंचे और उनसे मदद की पेशकश की तो दत्त ने सिर्फ इतना कहा कि हो सके तो मेरा दाह संस्कार वहीं करवा देना जहां मेरे दोस्त भगत सिंह का हुआ था। 20 जुलाई 1965 को बटुकेश्वर दत्त ने अपनी आखिरी सांसें लीं। उनकी आखिरी इच्छा के अनुसार उनका अंतिम संस्कार भारत-पाक सीमा पर हुसैनीवाला में भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरू के अंतिम स्थल के पास ही किया गया।

शकील बंदायूनी का एक शेर है-
“अब तो आंखों में गम-ए-हस्ती के पर्दे पड़ गए
अब कोई हुस्ने मुजस्सिम बेनकाब आया तो क्या”

सवाल यही है कि क्यों हम अपने नायकों के प्रति अपने दायित्व की इतिश्री सिर्फ मरने के बाद दो-चार शब्द कह कर मान लेते हैं।

Author

  • बटुकेश्वर दत्त भगत सिंह के सहयोगी के लेखक अनिल वर्मा, एक लेखक, व समीक्षक हैं। अनिल वर्मा एक दास्तानगो भी हैं, साथ ही लखनऊ के सांस्कृतिक विरासत के जानकार हैं, लंबे समय से क्रांतिकारियों के जीवन, संघर्षों, और बलिदानों पर लिख रहे हैं।

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