चार कहानियाँ बाराबंकी के बुनकर समुदाय की साहसी महिलाओं की

आमिर जलाल: 

केस स्टडी 1: 

बाराबंकी जिले में रहने वाली शकीला बानो अपने घर की एकलौती कमाने वाली महिला है। इनकी बहू का नाम शहनाज बानो है। कोरोना के समय में जब इनके काम नहीं था तब इनके बेटे की शादी हुई। शादी होने के 1 महीने के अंदर ही इनकी बहू गर्भवती हो गई। दोनों पति पत्नी बच्चा रखना नहीं चाहते थे। घर के बड़े बच्चा रखना नहीं चाहते थे। स्वास्थ्य सुविधाएं ना मिलने के कारण बच्चा ठहर गया। 3 महीने बीत जाने के बाद इनकी बहू को स्वास्थ्य संबंधित परेशानी आने लगी।अपने मोहल्ले की आशा को शकीला बानो ने बुलाया। अपनी बहू का इलाज करवाने में उनकी पूरी सहायता ली। आशा, हिंदू मोहल्ले में रहती थी जिसके कारण वह शकीला बानो के घर आने से घबरा रही थी। शकीला ने उसकी हिम्मत बनाते हुए अपने घर बुलाया।

शकीला बानो, शहनाज़ बानो और स्थानीय आशा कर्मी

आशा ने शहनाज की हालत देखते हुए तुरंत ही उसको अस्पताल में भर्ती करवाया और उसका इलाज करवाया। समय पर इलाज मिल जाने के कारण शहनाज और उसका बच्चा सुरक्षित बच गए। आशा ने बदोसराय अस्पताल में और 5 महीने बाद शहनाज बानो का प्रसव करवाया। आशा और शकीला बानो की काफी अच्छी दोस्ती हो गई। जिसके कारण अब आशा मुस्लिम मोहल्ले में भी बिना झिझक के आने लगी थी। गर्भवती महिलाओं की जांच व अस्पताल ले जाने का काम करने लगी थी।

शकीला बानो खुद पढ़ी नहीं है। इसलिए सरकारी लाभ जो सरकारी अस्पताल में प्रसव के दौरान मिलते हैं, नहीं जानती थी। अगर आशा ना होती तो वह यह लाभ ले भी ना पाती। आशा ने उनके साथ लगकर उनको सभी सरकारी मुनाफे दिलवाए। आज भी उनके घर आकर चाय पीके जाती हैं। शकीला बानो और आशा अच्छी दोस्त बन रही है। भारत एक विविधताओं का देश है। विविधता में ऐसी बंधुता महिलाओं के नेतृत्व में बने ऐसे माहौल कम ही होते हैं, मगर जहां होते हैं बहुत खूबसूरत होते हैं।

केस स्टडी 2:

बाराबंकी में एक गांव है जिसका नाम है बड़ा गांव। इस गांव में आज से 5 साल पहले 200 के करीब हथकरघा चलते थे। आज यहां महज 10-12 घरों में बुनाई का काम होता है। इसी गांव की एक महिला जिनका नाम मनसर जहाँ है, उनकी बिटिया शुमैला बानो की कहानी भी उस समय की है जब यहां कई करघे चलते थे। मनसर जहाँ, अभी 63 वर्ष की हैं। शुमैला बानो इनकी बड़ी बेटी हैं। शुमैला बानो 28 वर्ष की हैं।

मानसर जहाँ और शुमैला बानो

इनका बड़ा बेटा मोहम्मद जाहिद 12 साल पहले एक कार एक्सीडेंट में खत्म हो गया। घर की स्थिति ठीक ना होने के कारण वह किराए पर गाड़ी चलाकर अपना घर चलाने का काम करता था। जब मनसर जहाँ का बड़ा बेटा खत्म हुआ तब उसकी बहू अपने मायके वापस चली गई, और वहीं रहने लगी। शुमैला बानो ने अपनी मम्मी की तबीयत देखते हुए खुद शादी नहीं की और इनके साथ ही इनके घर पर रहने लगी। मनसर जहाँ करोना के वक्त 25 दिन कोमा में थी। इस समय शुमैला बानो ने ही अपनी मम्मी का खयाल रखा। अपनी बचत से इनका इलाज करवाया। इलाज करवाने में ₹300000 खर्च हुए। जिनमें से शुमैला ने 70000 अपने पास से लगाए और बाकी पैसे हथकरघा सोसाइटी और सरकारी स्कीम को खंगाल कर सरकार से लिए। इस ₹70000 की कीमत शुमैला बानो को अपने खेत और अपनी स्कूटी बेचकर चुकानी पड़ी। 

आज मनसर जहाँ स्वस्थ है और अपनी बिटिया के साहस पर गर्व करती हैं। मनसर जहाँ का मानना है कि अगर वह अपनी बिटिया को पढ़ा देती तो आज वह एक खुशहाल जीवन जी रही होती। हर मां-बाप के लिए मनसर जहाँ जी का यही सुझाव है कि अपनी बेटियों को पढ़ने-लिखने में लगाएं और अपने फर्ज को पूरा करें।

केस स्टडी 3:

अमीरुन्निसा, अमीरुन्निसा और रुखसार यह तीन बहने एक 65 वर्ष एक 60 वर्ष और एक 58 वर्ष की है। यह तीनों ही बाराबंकी के एक छोटे से कस्बे में रहती है। घर में 3 करघों पर काम करती हैं। एक करघा 48 इंची, दूसरा करघा 52 इंची और तीसरा करघा 55 इंची है। यह तीनों बहने अलग-अलग काम करती हैं। एक बहन पोछा रुमाल बनाती है, दूसरी बहन स्टॉल व गमछा बनाती है, और तीसरी बहन खादी के कपड़े का काम करती है। तीनो बहने पूरे दिन काम करने के बाद 200 से 300 कमाती हैं।

अमीरुन्निसा, अमीरुन्निसा और रुखसार

माता-पिता जब जिंदा थे तब इन तीनों की शादी की बात चलती थी। मगर इनके किसी दोस्त ने तीनों बहनों को बस में बैठा कर कहीं दूर छोड़ दिया था। अड्डे पर काम करते-करते इनकी दूसरे आदमियों से दोस्ती हुई। कुछ साल दोस्ती रहने के बाद उन आदमियों ने इनको छोड़ दिया। वो आदमी सारे पैसे भी अपने साथ ले गए। अमीरुन्निसा का कहना है समाज में ऐसी महिलाओं की इज्जत नहीं होती जिनको कोई मर्द छोड़ दें। हम तीनों बहनों को तो इस फलसफे से गुजरना पड़ा था। जब अपने घर वापस आए तो बूढ़े मां-बाप के साथ ही रह गए। दोबारा शादी करने की हिम्मत भी नहीं हुई। अपने ही घर में करघा लगाया और काम करना शुरू किया। उस समय गांव वाले बात नहीं करते थे, मगर आज उन्होंने कुछ हद तक हमें अपनाया है। 

महिलाओं का जीवन कितना मुश्किल होता है। सामाजिक ताना-बाना, कितनी चोटियों से उनको गुजरना है, यह बात अमीरुन्निसा और उनकी बहनों की कहानी से हम समझ सकते हैं और इनके जज्बे को सलाम करते हैं कि इतनी समस्याओं के बाद भी उन्होंने अपना घर नहीं छोड़ा। आज खुद कमा कर अपना घर चलाती हैं। 

केस स्टडी 4: 

अनीशा बानो

आमीना बानो, अनीशा बानो की मम्मी हैं। आमीना बानो की उम्र 72 साल है और अनीशा बानो अभी 35 साल की हैं। आमीना पिछले 57 सालों से बाराबंकी में बुनाई का काम करके अपना घर चला रही हैं। अनीशा बानो की शादी हो गई थी। शादी के कुछ साल बाद ही उनके शौहर का इंतकाल हो गया। शौहर के इंतकाल के बाद अनीशा बानो को उनके ससुराल वालों ने अपने घर भेज दिया। अपने घर आकर अपनी अम्मी के साथ इन्होंने दो हथकरघा के ऊपर काम करना शुरू किया। खादी ग्राम उद्योग के पेशेवर कामगारों में शामिल हुई। बीते हुए कुछ सालों में इनका काम खत्म हो गया। अब दोनों अम्मी और बिटिया पोछा रुमाल बनाने का काम करती हैं। कोरोना में आमीना बानो के दो ऑपरेशन हुए हैं। जिसमें से एक में 8500 रुपये और दूसरे में 12500 रुपये खर्च हुए हैं। दोनों महिलाएं अपने जीवन में काफी कठिन समय देखी हैं। अभी भी जूझ रही हैं। हथकरघा का काम खत्म होने के कारण इनको काफी समस्या झेलनी पड़ रही है।

अनीशा बानो और आमीना बानो दोनों का ही मानना है कि हथकरघा पर बुनाई का काम 80% महिलाएं करती हैं। यह एकलौता ऐसा काम है जो महिलाओं को खुद मेहनत करने पर पैसा दिलवाता है। आमीना बानो का मानना है की आंख का ऑपरेशन होने के बाद उनको अब दिखाई नहीं देता, लेकिन खड्डी पर ही चरखा जरुर चलाएंगे। क्योंकि इसी चरखे ने हमारे देश को आज़ाद किया था।

Author

  • आमिर, पेशे से बुनकर, उत्तर प्रदेश के अम्बेडकर नगर ज़िले से हैं और सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़े हैं। वह झारखंड के गुमला ज़िले में निर्माण संस्था से जुड़ कर काम कर रहे हैं।

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