भयभीत मन मेधावी नहीं हो सकता

अरविंद अंजुम:

आपकी सोच – समझ में प्रज्ञा क्या है? क्या यह बड़ा ही जटिल प्रश्न नहीं है? प्रज्ञा क्या है इसे कुछ शब्दों में बता पाना बहुत मुश्किल है। आइए, यह पता लगाना आरंभ करें कि प्रज्ञा क्या है। वह व्यक्ति जो लोगों के मत से भयभीत हैं, शिक्षक से भयभीत है, नौकरी न छूटे इससे भयभीत है, परीक्षा में पास न होने से भयभीत है, वह बुद्धिमान नहीं है। भयभीत मन मेधावी नहीं होता।

आपका क्या कहना है? क्या यह बहुत कठिन बात है? यदि मैं अपने माता-पिता से भयभीत हूं कि वह मुझे डांटेगे, कि वे मुझे ऐसा – वैसा कहेंगे, तब क्या मैं मेधावी हूं? मैं उनकी इच्छा से व्यवहार करता हूं, कार्य करता हूं, सोचता हूं, क्योंकि मैं स्वतंत्रता पूर्वक विचार करने से डरता हूं, खुले मन से विचार करने और काम करने से डरता हूं। अतः मैं जो कुछ हूं वैसा होने से भय मुझे रोकता है। मैं हमेशा नकल करता रहता हूं, मैं सदैव अनुकरण करता रहता हूं। मैं सदैव उन चीजों को करने का प्रयत्न करता हूं जो दूसरे लोग मुझसे करवाना चाहते हैं, मैं भयभीत हूँ। इसलिए जो मन डर के कारण अनुकरण करता है, दूसरों की नकल करता है, मेधावी नहीं होता।

– जे कृष्णमूर्ति,
शिक्षा क्या है – पुस्तक से

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Author

  • श्रुति से जुड़े झारखण्ड के संगठन विस्थापित मुक्ति वाहिनी को बनाने में प्रमुख भूमिका निभाने वाले अरविन्द भाई, अभी जनमुक्ति संघर्ष वाहिनी के अंशकालिक कार्यकर्ता हैं। अध्ययन, अनुवाद, प्रशिक्षण जैसी वैचारिक गतिविधियों में विशेष सक्रियता के साथ-साथ स्थानीय और राष्ट्रिए स्तर के राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक सवालों पर विशेष रुचि और समय-समय पर लेखन का काम करते हैं।

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