महंगाई खा गई छोटे मेलों को!

अफ़ाक उल्लाह:

कई दिनों से बाराबंकी के अलग-अलग क्षेत्रों में बुनकर (हथकरघा) समुदाय के लोगों के साथ मिल-जुल रहे हैं। घूमते-घूमते हम मुश्कबाद गाँव में पहुँच गए। यहाँ एक मेला सैंकड़ों सालों से लगता आ रहा है। इसका नाम धनुष यज्ञ है। मेले में लगभग 30 से 35 छोटी-छोटी दुकानें लगी थीं। बच्चों के खिलौनों से लेकर, महिलाओं के रूपसज्जा, किताबें, स्टिकर पोस्टर (हिन्दू/ मुसलमान) और कुछ चाट, चाउमीन, बर्गर की दुकानें थीं। मन हुआ आज दुकानदारों से मेले से जुड़ी उनकी ज़िंदगी और रोजगार पर बात की जाए। साथ ही मेलों और उनकी उपयोगिता को जाना-समझा जाये। एक-एक करके कई दूकानदारों से बातचीत की।

बेचन लाल हड़हा, टिकैतनगर, दरियाबाद के रहने वाले हैं। बेचन लाल के शब्द हैं – “1983 से यहका करत थाई। यही के साथ खेती किसानी भी होई जात हे। मुला अब ई काम मा मज़ा नही ना, पहिले के बात आउर रही। माद्दा सस्ता रहा, आमदनी ठीक रही। बाज़ार में शौक से लोग आवत रहे, अब बाज़ार ठंडी राहत है।”

राम देवकी शाहपुर, ब्लॉक मसौली के रहने वाले हैं। बच्चों का खिलौना बेचते हैं। इनका कहना है – ” जाउन चश्मा दो-तीन रुपया के मिलत रहा, अब पाँच-छह मा मिलत आहे। तब्बो 10 के बिकत रहा, अभइ भी 10 के बिक़त आहे। एक बात आहे कि ई मेला ठेला मा थोड़ पइसा मा दुकान लग जात, बिका तो बिका, नाही तो समान समेटो आपने घरे पहुँचों। हियां तो बाज़ार मा दुकान लगावे के बाद खाना मेला कमेटी के तरफ से दिया जात। तो ख़र्चा कुछु नाहिना।” अपान दुकान मालिक जईसा रूआब।”

तेज नारायण मिश्रा, बुढ़वा, सिरौली गौसपुर के रहने वाले हैं। यह मेले में पोस्टर, किताब, घड़ी के साथ महिलाओं के रूप सज्जा का सामान बेचते हैं। इनके पिता जी के पिता जी, स्वर्गीय बनवारी लाल जी भी यही काम करते थे। इन्होंने कहा कि “इमा आज़ादी आउर मज़ा दुनो बाय। मर्ज़ी आहे तो दुकान सजाओ, मेला मा जाओ, बाज़ार हाट मा दुकान लगाओ। अब तू हमसे बात करात आहो, तो ई बखत हमार फायदा होए, जाउन ख़रीदबो ओमा दुई पइसा बचे। अब ठउर ठउर पा मार्किट बन गई, अब मेला और बाज़ार मा पहिले जैसा मज़ा नाही, पहिले लोगे तैयारी करात राहे, मेला मा जाइके का का लेक आहे। अब तो बस लोग बाग चले आवत हे। ई तरह के बाज़ारन मा बहुत कम पैसा मा अपान दुकान लगाइके मालिक बन सका जात, लेकिन अब बहुत गिरावट आहे।”

मो सईद, मुस्काबाद के रहने वाले हैं। उम्र लगभग 70 साल है। 55 साल से यह काम कर रहे हैं। इन्होंने कहा “दिहाती मेला मा बहुत दुकान लगाए हान। साइकिल से फेरी करात हान। तमाम तो दुकानदार होई गई, ठेउरे पा तो सामान मिल जाते हैं। धंधा मंदा हैं। 25 रुपिया में पूरी दुकान लाग जात रही। ओतने मा 75, 100 रुपिया का कमाई होई जात रही। अब तो 1000 रूपिया मा दुकान जान नाही पड़ते। खरीदार तो पहिले वाले रेट में माल चाहत ही, अब ओत्ती कमाई नाही ना। शाहपुर, रसौली के पास लकड़ी के सामान बनत रहा। अब ऊ बंद होइगा। रबड़ की गुड़िया मिलत रही, हम और नंद किशोर साथ जात रहिन आइयागंज से लावत रहिन। नंद किशोर छल्ला, अंगूठी बेचत रहे। हम फेरी के साथ गलीचा बिनत रहिन, चादर बिछवे वाली। अब उम्र होई गई, ना गलीचा बीने के काम और फेली अब ई उम्र मा ना होई पाई।”

मो शेहेब, जकरिया, बेहटा, बाराबंकी के रहने वाले हैं। 12 साल से यह काम कर रहे हैं। “अब माल महँगा मिलता, तो गाहक नहीं लेते हैं। जो फ्रिई पैन 90 का मिलता था, उसको 150 तक बेच देते थे। अब 160 का तौल में मिलता है। 170-180 में बिकता है। ई बख़्त महंगाई है। अब 10 – 20 बच जाए, यही बहुत हैं। माल महँगा और ले वाले तो जाउन रेट मा लेहे, उहे मा लेब चाहत ही।”

पप्पू शर्मा, समस्तीपुर, बिहार के रहने वाले हैं। धनुष यज्ञ मेले में बिहार से अपनी नाट्य मंडली के साथ इस मेले में 3 रात नाटक खेला जाता है। इनकी मंडली में लगभग 25 लोग हैं। जिनके नाटक में काम करने का कलाकार के हिसाब से 5 सौ से 7 सौ रूपये तक मिलते हैं। यह एक ही नाटक में कई भूमिका अदा करने में माहिर हैं। साल के 10 महीने इसी काम में उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार में मेलों में नाटक का मंचन करने से इनकी मंडली का गुज़रबसर होती है। मेले से ही इनका काम चलता है। फोन और सोशल मिडिया के दौर में इनके हुनर के कदरदानों में कमी हुई हैं।

इस जैसे मेलों में आस-पास के गाँव में रहने वाले सभी जाति, धर्म के लोग आते हैं। खासकर जिन लड़कियों की शादी किसी और गाँव में हो गई हैं, वे इन मेलों के बहाने से अपने घर आती हैं। गाँव में रौनक और पुराने लोगों से मिलना होता है। गाँव की पहचान बनती है। धनुष यज्ञ और नावगज़ी मज़ार का मेला मुश्काबाद ग्राम सभा की पहचान हैं। जिसको सभी लोग मिलकर मानते हैं।

लेकिन सभी दुकानदारों को लग रहा है कि महंगाई के कारण मुनाफा कम होता जा रहा है जिससे इनकी भी रुचि कम हो रही है और लोग भी सोश्ल मीडिया के कारण अब कम आते हैं। जगह-जगह दुकानें होने से और चमक-धमक वाले बाज़ार होने से इन छोटे मेलों में अब रौनक कम हो गई है। महंगाई बढ़ने से अब इन छोटे दूकानदारों को दुकान सजाने में दिक्कत हो रही है। एक समय में रौनक और चहल-पहल वाले छोटे-छोटे कस्बों के ये मेले अब सूने पड़ते जा रहे हैं। पप्पू शर्मा कहते हैं, “बड़े बाज़ार और महंगाई ने इन छोटे मेलों को खा लिया।”

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  • अफ़ाक, फैज़ाबाद उत्तर प्रदेश से हैं और सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़े हैं। वह अवध पीपुल्स फोरम के साथ जुड़कर युवाओं के साथ उनके हक़-अधिकारों, आकांक्षाओ, और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दों पर काम करते हैं।

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