सहदोय डायरीज़: सहदोय में रहने का अनुभव

सहोदय के बच्चों ने अपने शब्दों और तरीके में अपने अनुभव, भावना, समझ, काम और यहाँ के माहौल के बारे में लिखे। स्कूल में टीचर बच्चों के रिपोर्ट और फीडबैक लिखते हैं। सहोदय, स्कूल नहीं है। यहाँ कोई निश्चित टिचर भी नहीं है। कोई शिक्षण का निश्चित वर्ग, समय या स्थल नहीं है। बच्चे हर किसी से, एक दूसरे से, और अपने अनुभवों से सीख रहे हैं। बच्चे मिलते है और सोचते है क्या किया, कैसे किया और आगे क्या करना है। सहोदय के बारे में ज्यादा विस्तृत बात, आपको उनके लिखे इस रिपोर्ट में मिल जाएगा। इनके नाम शुरुआत में लिखे हैं। हर्ष को छोड़कर, सारे बच्चे महादलित-शोषित समुदाय से हैं, जिनको ज़्यादातर लोग, निम्न और सम्मानहीन दृष्टि से अभी भी अंदर से देखते हैं। संस्थाओं में काम करने वाले भी नकारात्मक अनुभव बताते है। अपने सुझाव साझा ज़रूर करें ।

संतोष कुमार, उम्र – 11 वर्ष,
माता – सरेखा देवी, पिता – गनौरी मंडल
स्थान: सहदोय, कोहबरी, थाना बाराचट्टी, जिला गया (बिहार)

सहदोय में हम सभी मिलकर रहते हैं, सभी एक साथ पढ़ाई व खेती करते हैं। गाय की देखभाल भी करते हैं। हम सभी एक परिवार की तरह रहते, यदि किसी की तबीयत खराब हो जाती तो सभी मिलकर उसकी देख-भाल करते हैं।  हम बाल सभा करते हैं जिसमें सभी कामों पर अपने-अपने विचार रखते हैं। जो किसी को तंग करता है उसे सभी मिलकर सजा देते हैं।

सभी मिलकर गाँव में घूमने जाते, वहां गाँव के लोगों से बातचीत कर फसलों के बारे में जानकारी लेते हैं। हम उनसे खेती का काम सीखते हैं और उन्हें पढ़ना-लिखना सिखाते हैं।

हम अपने काम स्वयं करते हैं, जैसे कपड़े धोना, कपड़े सीना, थाली धोना, खाना बनाना। हम स्थानीय मिट्टी व बांस से खिलौने बनाते हैं। हम किसी जीव-जंतु को नहीं मारते, हम प्लास्टिक का इस्तेमाल भी नहीं करते। अपने खेतों में रासायनिक खाद का भी इस्तेमाल नहीं करते।

हम जैविक खेती करते हैं और देसी बीज बोते हैं। सहोदय में रहकर ही हम खेती करना, बांस से खिलौने बनाना, एक साथ मिलकर रहना और साथ में काम करना सीखे। शुरू में हमें सहोदय में रहने का मन नहीं करता था, न ही काम करना अच्छा लगाता था। फिर धीरे-धीरे मन लगने लगा तो हम सभी मिलकर रहने लगे। शुरू में हमें कुछ भी लिखना-पढ़ना नहीं आता था, लेकिन मेहनत की तो अब मैं चौथी कक्षा की किताब पढ़ सकता हूँ।


सुनील कुमार, उम्र – 10 वर्ष
माता – सुमित्रा देवी, पिता – रामबली मंडल
स्थान: सहदोय, कोहबरी, थाना बाराचट्टी, जिला गया (बिहार)

सहोदय एक ट्रस्ट है, यह ट्रस्ट गया जिला के बारचट्री थाना की कहुदाग पंचायत के गोहबरी गांव में है। हम सब सहोदय में मिलकर पढ़ाई करते हैं। आपस में हम सब एक दूसरे को पढ़ाते हैं। साथ-साथ हम सब मिलकर अपना भोजन बनाते हैं और खाना बनाना सीखते हैं। मिलकर खेती करते हैं और सीखते हैं और उसमें हम सब कम पानी से खेती करने की कोशिश करते हैं।

बाहर का रासायनिक खाद नहीं डालते हैं, घर पर ही गाय के गोबर और पत्तियों से खाद बनाते हैं। बाहर से कीटनाशक नहीं डालते हैं, घर पर ही पत्तियों गोबर या गोमूत्र से कीटनाशक बनाते हैं। खेत में देसी बीज उपयोग करते हैं। फसल को जानवर से बचाने केलिए रात भर जागते हैं। प्लास्टिक का उपयोग नहीं करते हैं, उससे मिट्टी खराब होता है। मिट्टी-पत्ती और लकड़ी से खिलौना बनाते हैं और सीखते हैं। पेड़-पौधा लगाते हैं और उनकी सेवा करते हैं। शाम को सभी बच्चे साथ साथ खेलते हैं, बातचीत करते हैं कि क्या करेंगे। कोई तंग करता है, तो उसके बारे में बोलते हैं और सजा सब मिलकर तय करते हैं। सजा में मारते नहीं है, खेलना मना या गोल चक्कर में बंद होना ही सजा मिलता है। यहाँ हमें नाटक और गाना भी सिखाते हैं।

सुबह में हम सब जंगल और गांव घूमने जाते हैं, दूसरों की मदद करते हैं। जिसकी तबीयत खराब होती है उसकी देखभाल करते हैं। बाहर भी घूमने जाते हैं, बिहार के कई गांव में तथा देश के कई राज्यों में घूमने जाते हैं। सुबह में योग करते हैं, अपना काम खुद करते हैं जैसे अपना बर्तन धोना, कपड़ा सीना आदि। कोई बीमार पड़ता हो तो उसके लिए घर पर ही दवाई बना कर देते हैं। यहां सब मिलकर रहते हैं, हम टॉयलेट करने बाहर जाते हैं और उसे मिट्टी से ढक देते हैं। हम गाय का खयाल रखते हैं।

हम सहोदय में 3 साल पहले आए, पहले मन नहीं लगता था। अब सहोदय में अच्छा लगता है। यहां हम बहुत कुछ सीख रहे हैं, यहां आए तो हिंदी, अंग्रेजी, गणित सीखे हैं। अभी हम कक्षा छ: की हिंदी, पांचवी की गणित और तीसरी कक्षा की अंग्रेजी पढ़ रहे हैं।


अनिल कुमार, उम्र – 12 वर्ष
माता – सुमित्रा देवी, पिता – रजबलि  मंडल
स्थान: सहदोय, कोहबरी, थाना बाराचट्टी, जिला गया (बिहार)

सहोदय में सब लोग मिलकर रहते हैं, खेती करते हैं, पढाई करते हैं, सिलाई करना सीखते हैं। पेड़ पौधे लगाते हैं, उनका खयाल रखते हैं, लड़की-लड़का सब मिलकर खाना खाते हैं और मिलकर खेलते हैं। जैविक फसल उगाते हैं। साथ में रहना सीखते है एक दूसरे के साथ रहकर काम करना सीखते हैं, गाय को चारा देते हैं। मधुमक्खी पालन करते हैं, मिट्टी बचाने के लिए पाॅलिथीन उपयोग नहीं करते हैं, सहोदय मे बाहर के ज्यादा समान का उपयोग नहीं करते और पानी ज्यादा बर्बाद नहीं करते हैं, हम लोग पर्यावरण से जुड़े हुए हैं। नाटक करना सीखते हैं, बांस और मिट्टी के खिलौने बनाते हैं। गाँव में जंगल में भी घूमने जाते हैं, जंगल में अलग-अलग पक्षी देखते हैं, शाम के समय हम लोग आज और कल के बारे में बाल सभा रखते हैं। हम लोग में से कोई गलती करता है तो हम उसके लिए मिलकर सजा तय करतें है। जैसे गोल घेरे में बंद होना, उठक-बैठक करना।

सहोदय में हम स्थानीय पेड़-पौधों को लगाने के अलावा उनकी अच्छे से देखभाल भी करते हैं। पेड़ पौधों के पत्ते का और उनसे आयुर्वेदिक दवा बनाकर उपयोग करना भी जानते हैं। हम, भुला और सकता दादा से खेती करना भी सीखते हैं, कुछ खेती करना भी जानते हैं। जैविक कम्पोस्ट बनाना जानते हैं, स्थानीय चिड़िया के नाम जानते हैं, कुछ चित्र बनाते हैं, योग करते हैं, खाना बनाना जानते हैं और अपनी भाषा मे कहानी लिखते हैं।

हम यहाँ ढाई साल पहले आए थे, हमे थोड़ी-थोड़ी हिंदी आती है अभी छठी की हिंदी, पाँचवीं की गणित और तीसरी की गणित पढ़ते हैं।


प्रदीप, उम्र – 11वर्ष
माता – सरोज देव, पिता – विजय मंडल
स्थान: सहदोय, कोहबरी, थाना बाराचट्टी, जिला गया (बिहार)

सहोदय में हम सब पढ़ते और पढ़ाते हैं, साथ मिलकर रहते हैं, खेलते हैं और खाते हैं। गांव और जंगल घूमने जाते हैं। सब साथ खेती करते और एक दूसरे को खेती में मदद करते हैं, कोई बीमार पड़े तो काढ़ा बनाकर देते हैं। सब मिलकर खेती में मंडुआ ,धान, आलू ,मूली ,टमाटर ,बैंगन, भिंडी, गाजर,ओल, मेथी, पालक, मिर्च, हल्दी, मटर, अदरक, सुधनी, चना, बींस इत्यादि उगाते हैं। मिट्टी के दिया, कठपुतली और बांस के खिलौने बनाना सीखते हैं, जब मन चाहे तब पकवान बनाकर खाते हैं और अपना कपड़ा खुद धोते हैं। सब मिलकर खाना बनाते हैं, पेड़ लगाते हैं।

सहोदय में हम झगड़ा नहीं करते हैं, करते भी हैं तो उसे मीटिंग में सब मिलकर सजा देते हैं। जैसे गोलघर में बैठेने को कहते हैं आधा घंटा, उठा-बैठी करते हैं, नहीं तो खेलना-बोलना बंद कराते हैं। सब मिलकर पेंटिंग करना सीखते हैं, लड़का-लड़की सब साथ मिलकर साइकिल चलाना सीखते हैं। बाज़ार जाते हैं और सामान का हिसाब करना जानते हैं। शाम को सब मिलकर मीटिंग करते हैं और अपनी बात रखते हैं। सांप-बिच्छू मिलता है तो उसे पकड़ कर जंगल में छोड़ आते हैं। हर दिन सब तीन ग्रुप में बंटकर रहते हैं और काम करते हैं, जो है- गाय वाला ग्रुप, पौधे वाला ग्रुप और खाना बनाने वाला ग्रुप। पौधा वाला ग्रुप रात में जगता है और नीलगाय भगाते हैं, हम डेढ़ साल पहले आए थे। थोड़ा हिंदी जानते थे, अब छठी की हिंदी, तीसरी की अंग्रेजी और पाँचवीं की गणित पढ़ रहे हैं।


काजल कुमारी
माता – सहोदरी देवी, पिता – कुलेशर मंडल,
स्थान: सहदोय, कोहबरी, थाना बाराचट्टी, जिला गया (बिहार)

हम सहोदय में एक साल पहले आए थे, हमको पढ़ना-लिखना नहीं आता थाl अभी हम तीसरी कक्षा (वर्ग) की हिन्दी और गणित की किताब पढ़ रहे हैंl हम जब यहाँ आए तो हमारा मन नहीं लगता थाl हम को यहाँ का खाना अच्छा नहीं लगता थाl हम को काम करने में मन नहीं लगता थाl हम को पढ़ाई करने में भी मन नहीं लगता था, पर अब धीरे-धीरे मन लगने लगा हैl हम भी दूसरे के साथ झाड़ू लगाने लगे और फर्श लीपते हैं l लड़के-लड़कियां सब मिलकर खाना बनाते हैं l पेड़ पौधा वाला ग्रुप, बर्तन धोता है, जीव जंतु को नहीं मारते हैंl किसी को तंग नहीं करते हैंl जिसकी तबियत खराब होती है, तो सब मिलकर उसकी सेवा करते हैंl गाय के ग्रुप वाले को सानी चलाते हैं, गाय के घर (बाड़े) की साफ़ सफाई करते हैं l गाय के गोबर को इकठ्ठा करते हैं l गोबर के गोइठा ठोकते हैंl गाय का ध्यान रखते हैं, देखभाल करते हैं l सब लोग पढ़ाई करते हैं और खेत में सब लोग काम करते हैंl हुलास बाबा से खेती का काम भी सीखते हैं l


पिन्टु कुमार
माता – प्यारी देवी, पिता – जेलर मंडल
स्थान: सहदोय, कोहबरी, थाना बाराचट्टी, जिला गया (बिहार)

सहोदय में हम लोग मिलकर रहते हैं, एक परिवार के जैसे रहते हैं, सब मिलकर काम करते हैं। योग करते हैं, गाय की देख-भाल करते है, खाना बनाते है, पेड़-पौधों की देख-रेख करते हैं, बाल सभा करते हैं। बाल सभा में सब अपनी-अपनी बात रखते हैं, काम की बात करते हैं, हम अलग-अलग जगहों में घूमने जाते हैं। वहाँ हम लोग कुछ सीखते हैं और गाँव में घूमने जाते हैं तो खेती करना सीखते हैं। खेत में बाहर से रासायनिक खाद या कीटनाशक नही डालते हैं और जैविक खेती करते हैं।

किसी बच्चा को खांसी या बुखार हो तो उसका बुखार ठीक करने के लिए काढ़ा बनाते हैं। मिट्टी या बांस के खिलौने बनाते हैं। हम लोग मिलकर पढ़ाई करते हैं, एक-दूसरे को भी पढ़ाते हैं। नहीं समझ आए तो अंकल-आंटी से पूछते हैं। अपना काम खुद से करते हैं, जैसे कपड़ा धोना, थाली धोना, और कपड़ा सीना। मिट्टी को बचाते हैं, मिट्टी बचाने के लिए हमलोग प्लास्टिक का उपयोग नहीं करते हैं और हर्बल सर्फ उपयोग करते हैं और यहां सब लोग मिलकर पेड़ों को लगाते है। हम सब जंगल में घूमने जाते हैं, अलग-अलग पेड़-पौधों को देखते हैं और उनको जानते हैं। हम लोग तीन ग्रुप में बटे हैं, खाना बनाने वाले ग्रुप / गाय की देख-भाल करने वाले ग्रुप / पेड़-पौधों की देखभाल करने वाले ग्रुप। इसमें से पेड़-पौधा वाले ग्रुप नीलगाय से खेत की फसल को बचाने के लिए रात में जगते हैं। सहोदय में खेती करना सीखे, गाय की देख भाल करना सीखे, पेड़-पौधा की सेवा करना सीखे और बांस और मिट्टी के खिलौना बनाना सीखे। पहले हमको अंग्रेजी नहीं आती ठी या हिन्दी में थोड़ा आता था। हम 6 महीना पहले आए थे, छठी की हिन्दी और गणित, तीसरी वर्ग की अंग्रेजी पढ़ते हैं ।


सहोदय में मेरा अनुभव

हर्ष कुमार, उम्र – 9 साल
माता – रेखा कुमारी, पिता – अनिल कुमार
स्थान: सहदोय, कोहबरी, थाना बाराचट्टी, जिला गया (बिहार)

सहोदय में सब मिलकर रहते हैं। अलग-अलग जगह घूमने जाते हैं। मिलजुल कर खेती करते हैं। यहां रासायनिक खाद का उपयोग नहीं करते हैं , गोबर का खाद डालते हैं। सफाई करते हैं, साथ में खेलते हैं, साथ में पढ़ते हैं। एक-दूसरे को समझाते हैं और एक दूसरे की मदद करते हैं। शाम को बालसभा करते हैं और बाल सभा में आज और कल की बातचीत करते हैं। सुबह 5:00 बजे उठ जाते हैं और सुबह कभी-कभी घूमने जाते हैं। सुबह आधा घंटा खेत में काम करते हैं। सब मिलकर खाना पकाते हैं और मिल बांट कर खाते हैं।


आदित्या कुमार, उम्र – 11 वर्ष
माता – मुनिया देवी, पिता- विजेय मण्डल
स्थान: सहदोय, कोहबरी, थाना बाराचट्टी, जिला गया (बिहार)

सहदोय में हम लोग मिलकर योग करते हैं, खाना बनाते हैं। जानवर की देख भाल करते हैं, पढ़ाई करते हैं। खेती करते हैं, और हम लोग मिलकर बालसभा करते है। दिन भर के कामो के बारे में बात करते हैं। हम लोग घूमने जाते हैं, तो एक दूसरे से सीखते हैं। हम लोग मिटटी, बांस के कई चीज से खिलौने बनाते हैं। हम लोग जैविक खेती करते हैं और कीटनाशक नहीं डालते हैं। हम लोग प्लास्टिक का उपयोग नहीं करते हैं और हम लोग मिटटी, हवा, पानी, पेड़-पौधों को बचाते हैं।

हम लोग एक दूसरे की मदद करते हैं- जैसे कपड़ा धोने में, पढ़ाने में, काम करने में, खेती करने में, बर्तन धोने में, पौधे लगाने में, खाना बनाने में। कोई बीमार पड़ता है तो हम लोग उसका ख्याल रखते हैं। हम लोग फसल बचाने के लिए रात को जगते हैं और पेड़ पौधों की ध्यान से देखभाल करते हैं। सहोदय में हम लोग एक परिवार की तरह रहते हैं।

हम कोई जीव-जंतु को नहीं मारते हैं। हम मिटटी, जल, पेड़-पौधे के साथ मिलकर रहते हैं। सहोदय में हम खेती करना, मिलकर रहना, दूसरों का ध्यान रखना, और काम करना सीखते हैं। हमें खेती करना और कोई काम मेहनत से करना, बांस के, मिटटी के, कोई चीज के खिलौने बनाना अच्छा लगता है। शुरू में हमें काम करना अच्छा नहीं लगता था और पढ़ना लिखना भी नहीं आता था। हमें पढ़ाई में अंकल-आँटी, बिना छड़ी और बिना डर से पढ़ाते हैं। हम धीरे-धीरे पढ़ते रहे औए अब 6 क्लास की किताब पढ़ने लगे। हमें मिलकर गाँव, जिला, राज्य घूमना अच्छा लगता है।

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