शुभम पांडे:

त्यौहार घरों में नई खुशियां लाने का एक ज़रिया होते हैं, फिर अगर दिवाली की बात हो तो सभी इसकी चमक दमक से मोहित होते हैं। जो मोहित नहीं होते वे भी मुस्कुरा देते हैं, जब छोटे बच्चों को फुलझड़ी घुमाते देखते हैं। मेरा छोटा भाई त्यौहार से पहले अम्मा की सभी बातें ऐसे मानता है जैसे रानी चींटी की बात लड़ाके चींटे मानते हैं। 

लेकिन माँ सब समझती है और कहती है, “मुझे इतना भाव देके तुम क्या चाहते हो? भाव देने वालों का कुछ अपना मतलब होता है। दिवाली पर फूटने वाले पटाखों का सब मज़ा लेते हैं, पर उनसे होने वाले प्रदूषण पर ध्यान तक नहीं जाता। बस यही कारण है तुम्हारा मेरी बातों को मानने का। तुम मुझे मनाते हो पटाखे पाने के लिए, जब तुम्हारी जरूरत पूरी होगी फिर तुम बाहुबली बनने लगोगे।”

मेरी माँ कुछ उदास सी थी इस दिवाली से और नहर के पास रहने वाली माई भी कुछ खास खुश नहीं दिखती थी। वह कुछ दिनों से नहर के पास अक्सर आती और मछलियों को बचा हुआ खाना खिलाते हुए बड़बड़ाती थी।   

हाल ही में मैनें माई से पूछा कि तुम पहले तो यहाँ नहीं आतीं थीं लेकिन आज कल यहाँ बहुत दिखती हो? उसने कोई जवाब न दिया तो मैंने एक और सवाल पूछ लिया कि माई तुम दिवाली क्यों मनाती हो..? 

तो वो बोल उठी कि – वे कहत है की राम वापस आवा रहे आजे के दीन्हा पर । हंका तो दुखे लागत है कि फिर कौनों सीट का वनवास झेले का पड़े और अग्नि मा आपन सम्मान बचावे कूदेक पड़े। 

हमार बिटवा वापस नाय आय पाइस, कहत है बहुत काम बा माई अगले महिना आउब। हमार दिवाली तो वैसे सूनी राहत है, हम कौन चीज के खुशी मनाई। हर गेदाहरा आज के जग मा लव कुश की नाय नौकरी करए घर छोड़ जावत है। ना माई के प्यार मिलत है ना कौनों सम्मान। हम कौनों दिन मरिजाब तबबों उ ना आय पाय।  

उनको देख कर मुझे मेरी दादी की याद आई। वो भी पापा को ऐसे ही याद करती थी क्योंकि पापा फ़ौजी थे और अक्सर त्योहार तब मनाया जाता था जब उनका फ़ोन आ जाए। दादी भी मुझे गोद में लिए लोरी सुनती थी कि मैं पटाखे की जिद न करूँ। 

टूटी फूटी तस्वीरों में यह भी याद आता है कि मेरी दादी पीपल के पेड़ से इतना प्यार करती थी कि दिवाली वाले दिन उसके आसपास द्वीप जला कर जगमग कर देती थी..। कितने ही ऐसे पेड़ इंतज़ार करते होंगे की लोग उनके सामने द्वीप जलाएं। 

मेरे दादा दिवाली के दिन बैलों और पहाड़ों की पूजा करते थे, ये बोल कर कि जबसे हिमालय का जन्म  हुआ है तबसे हमें बारिश मिली है। अगर हिमालय जन्म न लेता तो बारिश भी न होती। 

दिवाली का मतलब ही है बारिश का उत्सव। बारिश के बाद आती है दिवाली। जब ज़मीन से कीड़े उठ कर घर में घुसने लगते हैं, तब दीप जलाए जाते थे जिससे कीड़े दीप की ओर आकर ख़त्म हो जाएं और फिर घर को साफ़ किया जाता था। गाँव में पटाखे तो तब फोड़े जाते थे जब जानवरों को डराना होता था, अब तो पटाखों की आवाज़ से मैं ही डर जाता हूँ। मेरी दिवाली तो प्रकृति के साथ होती थी जिससे मैं प्यार करता था, जिसे मैं निहारता था। 

मेरी दिवाली आज भी अधूरी ही है और वो पेड़ भी अधूरा है जो मेरे दिए जलाने का इंतेज़ार कर रहा है।

Author

  • शुभम, उत्तर प्रदेश से हैं और सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़े हैं। वह अवध पीपुल्स फोरम के साथ जुड़कर युवाओं के साथ उनके हक़-अधिकारों, आकांक्षाओ, और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दों पर काम करते हैं।

    View all posts

Leave a Reply

Designed with WordPress

Discover more from युवानिया ~ YUVANIYA

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading